गरीबी उन्मूलन का प्रयोगधर्मी नजरिया, गरीब कोई निरर्थक लोगों का समूह नहीं
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गरीबी पर शोध करने वाले स्वयं गरीबी को खत्म नहीं कर सकते। सबसे अच्छी नीतियों और सलाह का कोई मतलब नहीं है, अगर उसका कार्यान्वयन किसी भी कारण से घटिया तरीके से किया जाए। ऐसा कहते हुए, कई भारतीयों और दुनिया भर के अन्य लोगों की तरह मैं रोमांचित हूं कि भारतीय-अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी को एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर के साथ वैश्विक गरीबी उन्मूलन के लिए उनके प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल दिया गया है। सोशल मीडिया पर उनके काम के बारे में जीवंत चर्चा चल रही है। लेकिन बनर्जी और डुफ्लो के आलोचक और समर्थक एक बात पर सहमत हैं कि उन्होंने साबित कर दिया कि गरीब कोई निरर्थक हो चुके लोगों का समूह नहीं है, यानी उनकी कोई स्टिरियोटाइप छवि नहीं बनाई जा सकती।
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गरीबों के गरीब बने रहने के कारणों में भिन्नता है। यहां संदर्भ मायने रखता है। बनर्जी ने एक बार बताया था कि अत्यंत गरीबों की एक आम छवि यह है कि उनके पास वास्तव में बहुत कम विकल्प होते हैं। कुछ लोग निश्चित रूप से उतनी ही कठिन मेहनत करते हैं, जितना वे कर सकते हैं, जो विशेष रूप से कठिन नहीं हो सकती है, क्योंकि वे अल्पपोषित और कमजोर होते हैं और अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने करने के लिए मुश्किल से कमा पाते हैं, जिसे वे कम से कम खर्चीले तरीके से पूरा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन अपनी छवि के विपरीत, बेहद गरीबों के लिए यह जरूरी नहीं है कि वे ज्यादा कैलोरी ( आहार) खरीदने के लिए अपना सारा पैसा खर्च कर डालें, या हममें से कुछ लोग जिसके बारे में सोचते हैं कि यह उसकी शीर्ष प्राथमिकता में होना चाहिए। उदाहरण के लिए, त्योहारों पर पैसे खर्च करना कई अत्यंत गरीब परिवारों के लिए बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उदयपुर में शोधकर्ताओं ने पाया कि अत्यंत गरीब परिवारों के 99 फीसदी से ज्यादा लोगों ने शादी, अंतिम संस्कार या धार्मिक उत्सवों पर पैसा खर्च किया। संक्षेप में, नीति निर्माताओं को इस बारे में निश्चित धारणा नहीं बनानी चाहिए कि गरीब अपना पैसा कैसे खर्च करते हैं, जो वास्तव में वे दूर बैठकर करना चाहते हैं। सूक्ष्म अनुसंधान परियोजना के नतीजे उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि वे हमें जमीनी हकीकत की बारीक समझ देते हैं।
हममें से कई लोग, जो विकास के मुद्दे पर लिखते हैं, बनर्जी को उनकी सर्वाधिक बिकने वाली किताब पुअर इकोनोमिक्सः ए रेडिकल रिथिंकिंग ऑफ दे वे टू फाइट ग्लोबल पावर्टी (2011), जिसकी सह लेखिका मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की प्रोफेसर और साथ में नोबेल पाने वाली उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो हैं और अब्दुल लतीफ जमील पावर्टी ऐक्शन लैब (जे-पीएएल) की स्थापना के लिए जानते हैं। साथ ही इसलिए भी कि उन्होंने सार्वजनिक नीति में रैंडोमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल्स (आरसीटी) के उपयोग को लोकप्रिय बनाया। (आरसीटी यानी आकस्मिक तरीके या बिना किसी वरीयता से लोगों के बीच परीक्षण)।
मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं और सभी संदर्भों में वैधता या आरसीटी के बारे में बहस करने के योग्य नहीं हूं। व्यक्तिगत रूप से मैं इसे 'या तो यह या वह' के रूप में नहीं देखती। पर यह सच है कि अर्थव्यवस्था और समाज में संरचनात्मक बदलाव के बिना गरीबी खत्म नहीं की जा सकती। भारतीय संदर्भ में इसका मतलब यह जानना है कि जाति, लिंग, सामाजिक बहिष्करण के कारण होने वाली बाधाएं स्वतः या केवल कानून के जरिये खत्म नहीं होतीं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हम तब तक कुछ न करें, जब तक कि संरचनात्मक बदलाव नहीं होते। उनके काम के दो उदाहरण देखने लायक हैं। एक का संबंध भारत के स्कूलों में दाखिला बढ़ने के बावजूद सीखने के निराशाजनक परिणामों से है, और दूसरा यह कि गरीब समुदायों में प्रतिरक्षण दर कैसे बढ़ाई जाए।
पहला उदाहरण वर्ष 2013 से 2014 के बीच उत्तर प्रदेश के दो जिलों (सीतापुर और उन्नाव) में किए गए शोध से संबंधित है। इसमें 17,000 से ज्यादा छात्रों से साक्षात्कार किया गया। नीति एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। जब बच्चे एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जा रहे थे, तो कुछ ही छात्रों को अपेक्षा के अनुसार कक्षा स्तर की दक्षता हासिल थी। शोधकर्ता यह जानना चाहते थे कि क्या छात्रों के सीखने के स्तर को सबक लक्षित करने से जिन छात्रों में सीखने की क्षमता कम है, उसे बेहतर करने में मदद मिल सकती है या नहीं। इस दृष्टिकोण को 'टीचिंग ऑन द राइट लेवल' कहा जाता है और इसे गुजरात, महाराष्ट्र समेत अन्य भारतीय राज्यों में कई जगह प्रभावी पाया गया।
शोधकर्ताओं ने 'प्रथम' और उत्तर प्रदेश सरकार के साथ भागीदारी करके 'प्रथम' के नेतृत्व में उच्च तीव्रता वाले शिक्षण शिविरों के प्रभाव का मूल्यांकन किया। 'प्रथम' की पद्धति का उपयोग करके शिक्षण शिवरों में अध्ययन-अध्यापन गतिविधि में काफी तीव्रता लाई गई और इसे मुख्य रूप से 'प्रथम' के स्वयंसेवकों और स्कूल के कर्मचारियों द्वारा अंजाम दिया गया और नियमित कक्षाओं को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि हालांकि इससे सभी छात्रों को समान रूप से लाभ नहीं हुआ, लेकिन शिक्षण शिविर किसी पैराग्राफ या अनुच्छेद को पढ़ने की क्षमता विकसित करने में नियमित कक्षा से दोगुना प्रभावी रहा। स्कूलों में छात्रों के पढ़ने की क्षमता राज्य में पहले न्यूनतम स्तर के करीब थी, जो शिक्षण शिवरों के कारण बढ़कर देश में शीर्ष तीसरे स्थान पर पहुंच गई।
दूसरा अध्ययन बताता है कि भारत में टीकाकरण कैसे बढ़ाया जा सकता है। जे-पाल द्वारा उदयपुर में एक स्वयंसेवी संस्था सेवा मंदिर की मदद से किए गए अध्ययन ने दिखाया कि कैमरे के जरिये नर्सों की निगरानी करने और बच्चों के माता-पिता को हर टीके के बाद एक किलो दाल की पेशकश करने से कैसे पूर्ण टीकाकरण की दर में सुधार लाया जा सकता है। उन्होंने पाया कि विश्वसनीय टीकाकरण शिविरों के साथ इस तरह का छोटा प्रोत्साहन देकर पूर्ण बाल टीकाकरण को छह गुना बढ़ाया जा सकता है, हालांकि जिन परिवारों को प्रोत्साहन की पेशकश नहीं की गई, उनके बच्चों के टीकाकरण की दर में मात्र 2.7 गुना की वृद्धि की संभावना पाई गई।
भले ही आप बनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर के नुस्खे से सहमत हों या नहीं, उन्हें नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा ने आज की सबसे चुनौतीपूर्ण समस्या की ओर ध्यान खींचा है, कि गरीबों के सामने आने वाली चुनौतियों को कैसे हल किया जाए, जिनमें से लाखों लोग इस देश में रहते हैं।