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महंगा इलाज, सस्ती होती जान
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Mon, 16 Sep 2013 06:43 PM IST
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इस लोकतांत्रिक देश के हर वर्ग के लिए एक संविधान, समान कानून और विधान होते हुए भी सब कुछ असमान और भिन्न है। सामर्थ्यवानों के लिए कानून, प्रशासन और विधायिका जितने सुलभ और हितपोषक हैं, उतने ही आम आदमी के लिए दूभर और जलालत भरे!
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चाहे वह दोहरी शिक्षा व्यवस्था हो या बिना योग्य डॉक्टरों के सरकारी अस्पतालों का इलाज। जिसकी जेब में पैसा है, उसके लिए देश में पंचसितारा निजी अस्पताल मौजूद हैं, और जिनकी इतनी हैसियत नहीं, उनके लिए सरकारी अस्पताल। यानी जितनी औकात, वैसी सुविधा! आज डेंगू, इंसेफेलाइटिस, मलेरिया, टायफाइड आदि के मरीजों से सरकारी अस्पताल भरे पड़े हैं। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ही बिना योग्य डॉक्टर के और संविदा पर तैनात पैरा मेडिकल स्टाफ के सहारे एक हजार के लगभग इंसेफेलाइटिस मरीजों का इलाज हो रहा है। नतीजतन, अब तक यहां दो सौ से अधिक मरीज अपनी जान गंवा भी चुके हैं, लेकिन शासन मौन है।
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दरअसल, निजी अस्पतालों के महंगे इलाज का सामर्थ्य गरीबों में नहीं है। ऐसे में झाड़-फूंक, भभूत और ताबीज में ही वे अपने इलाज की राह खोजते हैं। नीतियां बनाने वाले कर्णधारों को भी लगने लगा है कि इस देश की चिकित्सा व्यवस्था पटरी पर नहीं लौट सकती। लिहाजा उन्होंने भी अपना इलाज विदेशों में करवाने की व्यवस्था कर ली है।
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दुखद है कि जिन नौकरशाही-नीतियों के चलते पूरे देश की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था लगवाग्रस्त हो गई है, उन नीतियों का पोषण करने वालों को दंडित करने के बजाय उपकृत किया जा रहा है। अगर ऐसा नहीं है, तो भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए विदेशी अस्पतालों में इलाज कराने की व्यवस्था कैसे कर दी गई?
इतना ही नहीं, आपातकालीन चिकित्सा के लिए हेलिकॉप्टर से राज्य के बाहर ले जाने की सुविधा भी उन्हें मुहैया कराई गई है। विषमता देखिए कि बाबू और लिपिक ही नहीं, दूसरे संवर्ग के अधिकारियों को भी ऐसी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई है। अब इससे बेहतर हमारे देश के समतावादी संविधान की और क्या 'विशेषता' हो सकती है!
चिकित्सा की 'बेहतर' नीति बनाने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने स्वतः मान लिया है कि देश में मेडिकल पढ़ाई का स्तर इतना गिर चुका है कि न तो योग्य और उच्च दक्षता वाले डॉक्टर पैदा हो रहे हैं और न हमारे चिकित्सालयों में बेहतर इलाज की सुविधा उपलब्ध हो रही है। ऐसे में वे इलाज के लिए विदेशों का रुख करने लगे हैं। लेकिन उन हजारों-करोड़ों आम लोगों का क्या, जिनकी हैसियत आज भी सरकारी अस्पतालों तक ही जाने की है। क्या देश के दूसरे लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा हासिल करने का हक नहीं है?
एक दृष्टांत देखिए। पूर्वांचल में 1976 से इंसेफेलाइटिस की महामारी फैली हुई है, जबकि इस देश के प्रशासनिक अधिकारियों ने 2006 में जाकर इस क्षेत्र में टीकाकरण के बारे में सोचा, लेकिन आज तक उस पर काम नहीं हो पाया है। यानी इंसेफेलाइटिस के प्रकोप से मरते मरीजों की 30 वर्ष बाद सुधि तो ली, लेकिन वह भी अधूरी। और जब बात खुद पर आती है, तो वे तुरंत इलाज कराने विदेश भाग जाते हैं। सवाल यह भी है कि यह ‘चिकित्सा पर्यटन’ की सुविधा ऐसे समय हासिल की गई है, जब डॉलर मजबूत हो रहा है, रुपये की क्रय शक्ति लगातार कमजोर होती जा रही है और हम पर विदेशी कर्ज पहाड़-सा बढ़ता जा रहा है।
बहरहाल, मौजूदा परिदृश्य देश में एकसमान विधान का एहसास नहीं कराता। क्या आम लोगों को बेहतर इलाज का अधिकार नहीं? देखा जाए, तो उदारीकरण की नीतियों पर तेजी से अमल करती सरकार की सारी की सारी नीतियां ही दोहरी व्यवस्था लागू कर रही हैं। गरीबों के लिए जहां 16 रुपये दैनिक मजदूरी में भरण-पोषण की बात की जाती है, वहीं अमीरों के लिए एक वक्त का भोजन सात हजार रुपये का होता है! ऐसे में समाज में कुंठा, आक्रोश या विघटन पनपना स्वाभाविक है। क्या हमारी सरकार और देश के नौकरशाह मौजूदा परिदृश्य पर मनन करेंगे?