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नए उपराष्ट्रपति: शालीनता और संगठनात्मक अनुभव संसदीय शुचिता का संबल बनें... सीपी राधाकृष्णन से यही उम्मीद कि...
Wed, 10 Sep 2025 07:37 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला
अमर उजाला
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 10 Sep 2025 07:37 AM IST
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सीपी राधाकृष्णन
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
राजनीति में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, जो केवल पदों की पूर्ति भर नहीं होते, अलबत्ता ये व्यापक राजनीतिक संकेतों और रणनीतियों के प्रतीक बन जाते हैं। सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति चुना जाना कुछ ऐसा ही है। जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने उन्हें अपना उम्मीदवार चुना, तो यह फैसला कइयों के लिए अप्रत्याशित था, क्योंकि चर्चा में तमाम वरिष्ठ नेताओं के नाम थे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेतृत्व ने उन्हें चुनकर राजनीति में सरप्राइज फैक्टर वाली अपनी रणनीतिक शैली का पुन: परिचय दिया।
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जिन हालात में पद छोड़ा, उसके बाद बनी जिन विशेष परिस्थितियों में यह चुनाव हुआ, उसमें राधाकृष्णन का जीतना महत्वपूर्ण है। हालांकि, उनका चुनाव जीतना बिल्कुल अप्रत्याशित नहीं है। खासकर, बीजू जनता दल (बीजद), भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और शिरोमणि अकाली दल जैसे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव से किनारा कर लेने से उनकी जीत तय मानी जा रही थी। लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे राधाकृष्णन तमिलनाडु में पार्टी अध्यक्ष रह चुके हैंं। ऐसे में उनका उपराष्ट्रपति चुना जाना भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को संदेश तो देता ही है, उनकी कर्तव्यनिष्ठ, सादगीपूर्ण और ईमानदार छवि अन्यथा भी उन्हें उच्च सांविधानिक पद के लिए उपयुक्त बनाती है।
दरअसल, वह एक ऐसे नेता हैं, जो सहमति निर्माण में विश्वास रखते हैं, जैसा कि उनके राज्यपाल काल में भी देखा जा सकता है। ऐसे में, उनके नेतृत्व में राज्यसभा की कार्यवाही अधिक समावेशी और उत्पादक हो सकती है, खासकर जब पक्ष और विपक्ष के बीच तकरार के चलते संसद के कामकाज ठप होने की एक निंदनीय परंपरा-सी बनती दिख रही हो। दूसरी तरफ, राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना, भाजपा की दक्षिण की राजनीति में बदलाव का संकेत बन सकता है। तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक द्रविड़ पार्टियों-द्रमुक और अन्नाद्रमुक के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जहां भाजपा अब भी सीमांत खिलाड़ी ही है। यह 1984 के बाद पहला अवसर है, जब तमिलनाडु से कोई उपराष्ट्रपति बना है। इससे भाजपा को यह दिखाने का अवसर मिलेगा कि तमिलनाडु या दक्षिण भारत की आवाज अब राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च मंचों पर सुनी जाएगी। लिहाजा राधाकृष्णन की जीत आसन्न चुनावों में भाजपा के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है। हालांकि, उपराष्ट्रपति केवल संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा के सभापति ही नहीं होते, वह सांविधानिक पद सोपान में दूसरे सबसे ऊंचे पद पर भी आसीन होते हैं। ऐसे में अपने पूर्ववर्ती से बिल्कुल उलट स्वभाव के नए उपराष्ट्रपति से यह उम्मीद की जा सकती है कि उनकी शालीनता और संगठनात्मक अनुभव संसदीय शुचिता के संबल बनेंगे।