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राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की परीक्षा

Sun, 23 Apr 2017 08:11 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Sun, 23 Apr 2017 08:11 PM IST
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Examination of opposition in presidential election
नीरजा चौधरी

भारतीय गणराज्य के अगले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अचानक गतिविधियां बढ़ गई हैं, क्योंकि आगामी जुलाई में मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं और बजट सत्र में जीएसटी भी पारित हो चुका है। सत्ता पक्ष के अलावा विपक्ष ने भी खुद को सक्रिय किया है। नीतीश कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की और उन्हें संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार की संभावना तलाशने में कांग्रेस के नेतृत्व के महत्व से अवगत कराया। उधर ममता बनर्जी ने भी नवीन पटनायक से भेंट की। सोनिया गांधी ने विपक्ष के अन्य नेताओं, शरद पवार, माकपा नेता सीताराम येचुरी और डी राजा को भी बुलाया है। संयुक्त उम्मीदवार 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में विपक्षी एकता की पहली परीक्षा होगा।

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पिछले हफ्ते माकपा नेताओं ने राकांपा नेता डीपी त्रिपाठी से मुलाकात कर यह जानने की कोशिश की कि क्या शरद पवार संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार बनने के लिए राजी होंगे। अपने व्यापक अनुभवों के अलावा पवार गैरकांग्रेसी दलों में किसी भी कांग्रेसी नेता के मुकाबले ज्यादा स्वीकार्य होंगे और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से उनके ज्यादा संपर्क हैं। लेकिन पवार ने अनिच्छा जताई है। राजग को राष्ट्रपति चुनाव में बहुमत के लिए पंद्रह हजार से भी कम मतों की कमी है, इसलिए शरद पवार को लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी आसानी से जुटा सकती है। अपने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं हारने वाले शरद पवार इसलिए हार का जोखिम नहीं उठाना चाहते।
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पवार के इन्कार करने के बाद अन्य नामों की तलाश की जा रही है, जिन पर विपक्षी दलों के बीच व्यापक सहमति हो। पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल गांधी का नाम पिछली बार भी सामने आया था और उन्हें ममता बनर्जी का समर्थन मिला था। गोपाल गांधी महात्मा गांधी और सी राजगोपालाचारी, दोनों के पारिवारिक सदस्य हैं, जो उत्तर (तकनीकी रूप से पश्चिम) और दक्षिण, दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने हाल ही में नीतीश कुमार द्वारा आयोजित चंपारण सत्याग्रह के सौ वर्ष के समारोह में हिस्सा लिया था। बिहार के मुख्यमंत्री मद्यनिषेध के मुद्दे पर गांधी को साथ लेकर भाजपा-संघ के मुकाबले एक वैकल्पिक राजनीति की कथा तैयार करने में जुटे हैं। अभी यह मालूम नहीं कि राष्ट्रपति पद के लिए गोपाल गांधी को लेकर वाम दलों का क्या रुख होगा, क्योंकि राज्यपाल के रूप में उन्होंने नंदीग्राम में हिंसा का विरोध किया था। या इस पर कांग्रेस का क्या रुख होगा, जिसने गांधी-नेहरू परिवार पर ध्यान केंद्रित किया है और महात्मा गांधी के परिवार पर उतना जोर नहीं दिया है।
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संभावित विपक्षी उम्मीदवार के रूप में शरद यादव का नाम भी चर्चा में है। पिछले वर्ष तक वह जद(यू) अध्यक्ष थे। 1974 में जनता पार्टी का गठन होने से पहले वह मूल जनता परिवार के प्रत्याशी थे और तब ताकतवर कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी एकता का प्रतिनिधित्व किया था। विभिन्न दलों के के बीच उनका भी व्यापक संपर्क है।

इंदिरा गांधी के शासन काल में अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इसका निर्धारण महीनों पहले हो जाता था, क्योंकि वह बहुमत वाली सरकारों की मुखिया थीं। पर 1989 से 2014 के बीच गठबंधन सरकारों के दौर में चीजें बदल गईं, जब गठबंधन में शामिल दलों द्वारा अपरिहार्य रूप से अंतिम क्षणों में राष्ट्रपति का निर्धारण होने लगा। जैसे, एपीजे अब्दुल कलाम का चुनाव अचानक ही हुआ, जब दौड़ में रहे कृष्णकांत का नाम किनारे कर दिया गया। वर्ष 2007 में प्रतिभा पाटिल के नाम का चयन भी अंतिम समय में हुआ था।

अभी लोकसभा में भाजपा को बहुमत है और पंद्रह राज्यों में राजग की सरकार है, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जहां के प्रत्येक विधायक के वोट का मूल्य सर्वाधिक (208 पॉइंट) है, जबकि सिक्किम के एक विधायक के वोट का मूल्य मात्र सात पॉइंट है। राजग को वास्तव में मात्र 14, 236 वोटों की कमी थी, हाल के उपचुनाव के बाद यह संख्या और भी घट गई है। इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इतना वोट जुटाना कोई बड़ी बात नहीं है। वह गैर-राजग दलों के सांसदों और विधायकों को मतदान से अनुपस्थित रहने या भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के लिए मना सकती है।

सैद्धांतिक रूप से यदि सभी गैर-राजग दल एकजुट हो जाएं, तो राष्ट्रपति चुनाव में करीबी टक्कर देखने को मिल सकता है। प्रधानमंत्री भाजपा उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वह यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि राजग में बिखराव न हो। उन्होंने भाजपा के सहयोगी दलों की बैठक बुलाई है, ताकि सबको अपने पाले में रखा जाए। इससे पहले उन्होंने शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे को रात्रिभोज पर बुलाया, ताकि पिछले तीन महीनों से चल रहे तनाव को कम किया सके। शिवसेना अलग रुख अख्तियार कर सकती है। पिछले दो चुनावों में उसने संप्रग के प्रत्याशियों को वोट दिया था। प्रधानमंत्री कथित तटस्थ समूहों तक भी पहुंच बनाना चाहते हैं। तमिलनाडु के हालिया घटनाक्रम में नई दिल्ली का हाथ बताया जाता है, ताकि राष्ट्रपति चुनाव में आंकड़ा दुरुस्त रहे। पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम प्रधानमंत्री के करीबी माने जाते हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम विधायकों का समर्थन है, ज्यादातर विधायक मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी के साथ हैं। इसलिए उन्होंने पार्टी में विलय की पहल की है। अगर वह इसमें सफल हो जाते हैं, तो अन्नाद्रमुक विधायकों का समर्थन भाजपा प्रत्याशी को मिल सकता है।


यदि गैर-राजग पार्टियां एक संयुक्त उम्मीदवार उतारे, जिसका विभिन्न दलों से अच्छा संपर्क हो और जो राजग में फूट डाल सके, तो यह खुला खेल हो सकता है। हालांकि विपक्ष के लिए ऐसा करना मुश्किल है, क्योंकि राजग की एकजुटता और पर्याप्त बहुमत जुटाने के लिए प्रधानमंत्री हर संभव कोशिश कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रधानमंत्री की पसंद का होगा और राष्ट्रपति चुनाव प्रधानमंत्री की भावी योजनाओं में सबसे महत्वपूर्ण है।

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