फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   everyones earth: whether there is a big country or a big person, nature punished everyone

सबकी पृथ्वी, सबसे पृथ्वी : चाहे कोई बड़ा देश और या बड़ा व्यक्ति हो, प्रकृति ने सबको दंड दिया

Dr. Anil Prakash Joshi डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Updated Sun, 05 Jun 2022 05:51 AM IST
विज्ञापन
सार
हवा, पानी, मिट्टी को कौन अपनी जगह रोक पाया। ये प्रकृति के सबसे बड़े उत्पाद हैं। यह समझ बनानी होगी कि कम से कम प्रकृति और पर्यावरण के दृष्टिकोण से समभागीदारी होनी चाहिए।
loader
everyones earth: whether there is a big country or a big person, nature punished everyone
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस बार सारी दुनिया में पर्यावरण दिवस 'पृथ्वी एक है' के संदर्भ में मनाया जाना है। यह संदर्भ बहुत महत्वपूर्ण है। खासतौर से तब, जब पूरी पृथ्वी कहीं विचलित व विक्षिप्तता की ओर बढ़ रही हो। प्रकृति व पर्यावरण कई तरह के संदेश हमें दे ही रहे कि अब एक साथ ही मिल-जुलकर ही कुछ सोचना होगा। प्रकृति को लेकर अपना देश तो दुनिया में सबसे आगे ही था। यही कारण था कि एक पृथ्वी का संयुक्त राष्ट्र के नारे से पहले हमने वसुधैव कुटुंबकम कहा और उसका मतलब ही यही है कि इस पूरी पृथ्वी में रहने वाले जीव एक कुटुंब की तरह हैं।



वे चाहे राज्य हों, गांव हों या देश वे एक कुटुंब की ही तरह हैं। उस कुटुंब को पृथ्वी ही पालती है। प्रकृति ही उनकी सबसे बड़ी सहायक है। और शायद यही सबसे बड़ा कारण था कि अपने देश में पृथ्वी को पूजा गया, प्रकृति को प्रणाम किया गया, नदी-जंगल-वायु सबको देव तुल्य मारा गया। लोगों से पृथ्वी व इसके संसाधनों का सम्मानपूर्वक जुड़ाव बनाने के पीछे इनके देवतुल्य महत्व को दर्शाना था। तब अन्य जीवों को भी देवों के साथ जोड़ दिया गया। शेर दुर्गा का वाहन रहा, तो हाथी गणेश के साथ जोड़ दिए गए। 


कोई भी अन्य जीव या पशु-पक्षी या फिर, वृक्ष, नदी, पर्वत सबको कहीं न कहीं धर्म के साथ जोड़ दिया गया। कितनी अजीब-सी बात है कि आज उसी धर्म को हमने कई अन्य तरीके से पलट दिया। आपस में बंटने-बांटने वाला आज का धर्म पृथ्वी के प्रति धर्म कर्म से दूर हो गया। पृथ्वी, प्रकृति और पर्यावरण ही सबसे बड़ा धर्म है। जिसने बिना बंटवारा किए सबके जीवन के लिए समान अधिकार तय किए।

मोटी-सी बात जो हमारे शास्त्रों में कही गई कि माता भूमि पुत्रोह्म पृथिव्याम। अब ये किसी धर्म व वर्ग विशेष के लिए नहीं कही गई, बल्कि समस्त मानव व अन्य वन्य जातियों के लिए थी। पर हम पृथ्वी के एक स्वभाव व समान व्यवहार के मतलबों को नहीं समझे। न कोई नदी, वन वृक्ष और न कोई हवा किसी विशेष वर्ग को समर्पित है, बल्कि सबको समान रूप से उपलब्ध है। और इसलिए एक पृथ्वी का अबके पर्यावरण दिवस का नारा इसी भावना से प्रेरित है। अतः सबसे बड़ा धर्म सीखने और सिखाने के लिए और साधने के लिए प्रकृति को ही मान लेना चाहिए। शायद दुनिया में यह संदेश कुछ काम आ पाए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यही बहस हो कि पृथ्वी और प्रकृति ही सबसे बड़े पालक हैं और इन्हें ही मानव धर्म समझ जाए। इसका आज सबसे बड़ा उदाहरण हमारे पास है। जब कोविड-19 की महामारी ने सब कुछ बंद कर दिया था और जब मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों ने भी प्रार्थना सुनने से इनकार कर दिया था, तब भी प्रकृति प्रभु ने मुंह नहीं मोड़ा था। पानी, हवा, भोजन प्रकृति के सब तरह के प्रसादों ने हमें तर रखा।

जिस देश में हम रहते हैं, वहां प्रकृति और पर्यावरण खूब समझे-बूझे थे, पर जबसे हमने पश्चिमी देशों की नकल भाषा, भोजन और वेशभूषा में उतारनी शुरू की, हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी भी मार दी और अपने पैरों के नीचे से जमीन को भी खिसका दिया। आप कल्पना कर लीजिए कि हवा, पानी, मिट्टी को कौन अपनी जगह रोक पाया। ये प्रकृति के सबसे बड़े उत्पाद हैं। आज हवा न हिंदुस्तान देखती है, न पाकिस्तान, न बांग्लादेश, न अमेरिका। 

सब जगह व्यापक है और अगर ऐसा न होता, तो गुस्से के तूफान हर जगह पहुंच गए। नदी कितने ही देशों की सीमाएं पार करते हुए सब को सहजता से उपलब्ध है। ऐसे ही मिट्टी जो नदी के साथ चलती है, यह हरित क्रांति, श्वेत क्रांति की जो वाहक है। इसने भी कभी यह नहीं देखा कि वह कहां से चली है और किसकी है। उसने कोई बंटवारे नहीं किए। ऐसे में अगर एक पृथ्वी का नारा संयुक्त राष्ट्र लगा रहा है, तो यह मात्र नारे तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे व्यवहार में आना चाहिए।

इसी से संदर्भित दूसरी बात यह है कि दुनिया में पहले यह प्रथा हर गांव की थी कि एक गांव के उत्पाद दूसरे गांव तक जाते थे। और आपस में विभिन्न उत्पादों का लेन-देन करते थे। और ये आज गांव में भी जिंदा है, तो विभिन्न देशों के परिप्रेक्ष्य में भी। अगर खाड़ी के लोग तेल पैदा करते हैं, तो हम दुनिया के सबसे बड़े चावलों के निर्यातकों में एक है। हमारे आम इस्केंडेनेविया में प्रसिद्ध हैं। इसी तरह विभिन्न देश एक दूसरे से उत्पादन से जुड़े हैं और एक दूसरे की आपूर्ति करते हैं। 

यही एक पृथ्वी के नारे में समझे जाने वाली बात है और इसके लिए यह समझ बनानी होगी कि कम से कम प्रकृति और पर्यावरण के दृष्टिकोण से सम भागीदारी होनी चाहिए। समानता के सारे सवाल इसी से जुड़े होने चाहिए। इसी बीच, अगर किसी ने दुनिया को एक साथ जोड़ा और तोड़ा तो वह था कोरोना। उसने एक किनारे से दूसरे किनारे तक किसी भी देश को नहीं छोड़ा और सबको परास्त कर दिखाया। यही है प्रकृति। 

चाहे कोई बड़ा देश और या बड़ा व्यक्ति हो, प्रकृति ने सबको दंड दिया। और फिर इसी कोविड-19 को लेकर दुनिया में एका भी दिखा। दुनिया में वैक्सीन और दवाइयां बनीं, सामूहिक रूप से बंटीं भी। यही बात आज समझ में आनी चाहिए कि पृथ्वी को एक सामूहिक सोच की आवश्यकता है और सामूहिक प्रार्थना और नमन की भी। इसलिए हमको एक साथ मिलकर पृथ्वी और प्रकृति को समझते हुए एक बड़े नारे के साथ पर्यावरण संरक्षण प्रकृति को बचाने की पहल करनी होगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed