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पल-पल बदल जाती है चप्पल!

Thu, 22 May 2014 06:13 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 22 May 2014 06:13 PM IST
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every moment slippers converted

जूते और चप्पल में यही भेद है। जूता मारने वाला हीरो हो जाता है, जबकि चप्पल खाने वाला। चप्पल खाने के बाद अब गुस्सा नहीं आना चाहिए, बल्कि मारने वाले के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि उसने कृपा कर चप्पल जड़ दी, वरना किसकी हिम्मत है कि मंत्री को चप्पल मार दे। शुभ मुहूर्त देखकर चप्पल हजम कर ली जाए, तो तरक्की के दरवाजे खुल जाते हैं। जब भी चप्पल पड़े, तो चौघड़िया जरूर देखना चाहिए। क्या पता, शुभ ग्रह में ही चप्पल पड़ी हो।

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याद ही होगा आपको कि एक बाबा होते थे, जो ऊंचे मचान पर एक पैर हवा में लटका कर बैठते थे। जो भी उनसे आशीर्वाद लेने जाता, यही संकल्प लेकर जाता था कि बाबा ने यदि लतिया दिया, तो चार गुरुवार निराहार रखूंगा। बाबा भी हर एक को नहीं लतियाते थे। लोग मचान के नीचे मिमियाती बकरी की तरह चक्कर लगाते, मगर उनके सिर पर लात ही नहीं पड़ती। लात का महत्व तो पता था, मगर अब चप्पल की भी चल निकली है।
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यहां यह डर भी है कि जिसे वाकई किसी की इज्जत की धज्जियां उड़ानी हो और उसकी तीव्र इच्छा चप्पल फटकारने की हो रही हो, तो वह भी अब सोच-समझकर ही चप्पल हाथ में लेगा। हो सकता है, पंचांग या कैलेंडर की राशि देखकर वह तय करे कि आज उसे चप्पलियाना है या नहीं, वरना कहीं ऐसा न हो कि विधायक को चप्पल फटकार दी और वह मंत्री बन बैठा। अपनी एक आंख गंवाने का मजा इसी शर्त पर है कि सामने वाले की दोनों चली जाएं। अब यहां यह डर है कि चप्पल भी गई हाथ से और चप्पल की मार सामने वाले को फल गई या यह भी कि वह इसी फिराक में था कि चप्पल पड़ जाए और उसकी ग्रहदशा बदल जाए।
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चप्पल ऐसा बूमरेंग है, जो दिशाशूल देखे बगैर फेंका जाएगा, तो हो सकता है, लौटकर आपको ही नुकसान पहुंचा जाए। तो भला क्यों चप्पल के लफड़े में पड़ा जाए! अपना तो जूता ही बढ़िया है। जिसे पड़ता है, उसका भला तो नहीं ही करता है। फिर जो बात जूते में है, वह चप्पल में कहां!

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