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चीन के आगे झुक गया यूरोपीय संघ

Wed, 03 Jun 2020 07:34 AM IST
Ram Yadav राम यादव
Updated Wed, 03 Jun 2020 07:34 AM IST
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European Union bowed to China
सांकेतिक तस्वीर

चीन जिस नए सुरक्षा-कानून द्वारा हांगकांग की स्वायत्तता छीनने जा रहा है, यूरोपीय संघ उसके लिए चीन को दंडित नहीं करेगा। यूरोपीय संघ की बैठकों की अध्यक्षता करने की बारी, पहली जुलाई से, अगले छह महीनों के लिए जर्मनी की होगी। चांसलर अंजेला मर्केल, बुधवार 27 मई को, इसी संदर्भ में अपनी भावी विदेश नीति की रूपरेखा बता रही थीं।


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उन्होंने चीन का नाम सबसे पहले लेते हुए कहा कि सितंबर के मध्य में जर्मनी के ही लाइपजिक शहर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ यूरोपीय संघ की शिखर बैठक होगी। बैठक में वह चीन से अपने बाजार को यूरोपीय संघ के लिए और अधिक खोलने, जलवायु रक्षा और अफ्रीका की सहायता के लिए साझा रणनीति बनाने तथा महामारियों के मामले में और अधिक पारदर्शिता दिखाने का आग्रह करेंगी। मगर उन्होंने सर्वत्र चर्चित हांगकांग का नाम एक बार भी नहीं लिया। 

हांगकांग की स्वायत्तता को पलीता लगाने वाला एक नया कानून बनाने का प्रस्ताव, अगले ही दिन, चीन की संसद कहलाने वाली 'राष्ट्रीय जन-कांग्रेस' के समक्ष पेश किया गया। करीब शत-प्रतिशत बहुमत के साथ वह पारित भी हो गया। चीनी संसद की स्थायी समिति जल्द ही,  कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार की इच्छानुसार, एक ऐसा 'राष्ट्रीय सुरक्षा कानून' गढ़ेगी, जिसे हांगकांग के 'बेसिक लॉ' (संविधान) के साथ नत्थी कर दिया जाएगा, भले ही वहां की जनता ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती।

जानकारों का कहना है कि नए कानून में 'अलगाववाद', 'आतंकवाद', और 'राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे' जैसी चीजों को गंभीर अपराध बता कर हांगकांग में ऐसे प्रयासों के विरुद्ध कठोर कार्रवाइयों का प्रावधान होगा, जो चीन को पसंद नहीं होंगे। यह कानून चीन को अपनी पुलिस और सेना हांकांग में भेजने तथा मनचाहे समय तक वहां तैनात रखने का अधिकार देगा। इस समय ऐसा नहीं है। प्रस्ताव पारित होने से पहले उसके विरोध में हांगकांग की सड़कों पर उग्र प्रदर्शन हुए। लगभग 180 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

स्मरणीय है कि हांगकांग 1997 तक ब्रिटेन का उपनिवेश था। ब्रिटेन और चीन के बीच एक लिखित समझौता हुआ था कि चीन अगले 50 वर्षों तक 'एक देश, दो प्रणालियों' वाले सिद्धांत के अनुसार, हांगकांग पर अपनी कम्युनिस्ट शासन प्रणाली नहीं थोपेगा; उसकी स्वायत्तता का आदर करेगा। 74 लाख 51 हजार जनसंख्या वाले हांगकांग प्रायद्वीप की जनता का भारी बहुमत ब्रिटेन से विरासत में मिली अपनी राजनीतिक भिन्नता तथा धार्मिक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है।

जनसंख्या के लगभग एक-तिहाई के बराबर बौद्ध एवं ईसाई धर्मियों को डर है कि नास्तिकतावादी चीन में उनके साथ भेदभाव होगा। हांगकांग की जनता को जब भी ऐसा लगता है कि चीन की सरकार उसकी स्वायत्तता को छीनने जा रही है, तब वहां चीन-विरोधी भारी प्रदर्शन होने लगते हैं।

पिछले वर्ष कई-कई सप्ताहों तक अब तक के सबसे उग्र प्रदर्शन हुए थे। दस लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर गए थे। चीनी सरकार को तभी से यह भय सता रहा है कि हांगकांग से प्रेरित होकर चीन की मुख्य भूमि के अप्रसन्न नागरिक भी सरकार-विरोधी प्रदर्शन करने लग सकते हैं।

नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के बहाने से चीन हांगकांग में संभावित प्रदर्शनों आदि को आरंभ में ही इस प्रकार कुचल देना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पंगु बना देगा चाहेगा कि चीन की मुख्य भूमि के लोग उनसे कोई प्रेरणा न ले सकें। इसमें सफल होने पर चीन 2047 से पहले ही हांगकांग की स्वायत्तता का अंत कर उसके पूर्णतः चीन में विलय की भी सोच सकता है।

चीन का ऐसा सोचना निराधार भी नहीं है। इस बीच, यूरोप और अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया वैश्वीकरण की धुन में चीन पर इतनी निर्भर हो गई है कि अपना भी नुकसान किए बिना चीन का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले पश्चिमी जगत में अमेरिका के बाद 27 देशों का यूरोपीय संघ ही एक ऐसी आर्थिक-राजनीतिक शक्ति माना जाता है, जो चीन को कोई सबक सिखा सकता है।

पर उसने तो नए कानून के पक्ष में चीनी जन-कांग्रेस के निर्णय के दूसरे ही दिन दोनों हाथ उठा कर आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका और चीन के बीच टकराव में कागजी शेर यूरोपीय संघ पिसना नहीं चाहता। उसके पास चीन के आड़े आने का न तो साहस है और न संकल्प। (पत्रकार, बॉन)

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