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कर्ज तो यूरोप को अदा करना है

Sun, 05 Jul 2015 04:23 PM IST
उदय प्रकाश अरोड़ा
उदय प्रकाश अरोड़ा Updated Sun, 05 Jul 2015 04:23 PM IST
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Europe has to pay debt

“अत्याचारी और पीड़ित के बीच कोई समझौता हो सकता है? क्या दास और तानाशाह के बीच मेल हो सकता है? जिस प्रकार इन दोनों के बीच मेल नहीं हो सकता, वैसे ही ग्रीस और तिकड़ी (यूरोपीय आयोग, यूरोपीय सेंट्रल बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष) के बीच समझौते का प्रश्न ही नहीं उठता। ग्रीक श्रमिक यूरोप के किसी भी राष्ट्र से अधिक मेहनती हैं। यूरोपीय संघ के अन्य देशों में जहां काम करने के औसत घंटे 1,500 प्रतिवर्ष हैं, वहां ग्रीस में 2,100 हैं। फिर भी बेकारी बढ़ी। कामकाज और व्यापार ठप होने लगे। तमाम कटौतियों के बावजूद राष्ट्र स्वयं को दिवालिया होने से बचा नहीं सका। अब क्या गरीबी, आत्महत्या और बेकारी से समझौता कर तिकड़ी के आगे स्वयं को समर्पित कर दिया जाए? जो कुछ अब तक सहा गया है, वह सीमा से अधिक है। आखिर सजा बेकसूर जनता को क्यों? स्थिति प्राचीन दुःखांत नाटकों जैसी हो गई है। लालची देवताओं के रूप में कर्जा देने वाले यूरोपीय देश अपने बैंकों को बचाने के लिए ग्रीक सरकार से उसकी बेकसूर जनता की बलि मांग रहे हैं।”

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ये शब्द हैं, 95 वर्षीय ग्रीक क्रांतिकारी मानोलिस ग्लैजोस के, जिसने जीवन के 12 वर्ष जेल में काटे। दो बार इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, पर बच गए। वर्तमान वामपंथी सीरिजा पार्टी के पुनर्गठन का श्रेय उन्हें ही जाता है। इसी पार्टी से ग्लैजोस अभी पार्लियामेंट के सदस्य भी हैं। 1939 में ग्लैजोस जब हाई स्कूल के विद्यार्थी थे, उस समय मुसोलिनी की सेना ने ग्रीस के कुछ द्वीपों को हथिया लिया था। ग्लैजोस उस समय न केवल इटली के विरुद््ध खड़े हुए, बल्कि ग्रीस के तानाशाह शासक मेताक्सास से भी टक्कर ली। पर सबसे बड़ी हिम्मत का काम उन्होंने 1941 में हिटलर के विरुद्ध किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर की सेना ने ग्रीस पर अपना अधिकार कर लिया था, ग्लैजोस ने एथेंस के प्राचीन अक्रोपोलिस के ऊपर लहराते हुए नाजी झंडे को उतार फेंका था। ग्लैजोस को अपने साथी सन्तास सहित उनकी अनुपस्थिति में फांसी की सजा सुनाई गई। 1948 में जब ग्रीस में गृहयुद्ध छिड़ा, तब ग्लैजोस को ग्रीस की दक्षिणपंथी सरकार ने भी फांसी की सजा दी। पर अंतरराष्ट्रीय दबाव से उस समय उनकी फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई।
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1951 में जेल में रहते हुए उन्हें संसद का सदस्य चुना गया। शीतयुद्ध के दिनों में उन पर जासूसी का आरोप लगा। 1961 में वह पुनश्च संसद सदस्य चुने गए। द्वितीय विश्वयुद्ध, ग्रीक गृहयुद्ध और सैनिक तानाशाही शासन के काल में उन्हें कठोर यातनाएं दी गई थीं। सोवियत रूस ने ग्लैजोस पर डाक टिकट निकाला तथा लेनिन पुरस्कार से नवाजा। ग्लैजोस केवल क्रांतिकारी ही नहीं रहे हैं, बड़े विद्वानों में उनकी गिनती होती है। भाषाविज्ञान, पर्यावरण, सिविल इंजीनियरिंग तथा राजनीति पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। ग्रीस के लगभग सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों नें उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया है।
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यूरोपीय संघ के राष्ट्रों में ग्रीस पर सबसे अधिक दबाव जर्मनी ने बना रखा है। ग्लैजोस का कहना है कि यदि आज जर्मनी जिंदा है, तो ग्रीस की वजह से। 1940 में जब जर्मनी का ग्रीस पर आधिपत्य था, तब ग्रीसवासियों को अकाल जैसी स्थिति में रखा गया, ताकि जर्मन सैनिकों को पूरा भोजन मिल सके। ग्लैजोस तब रेडक्रास संस्था के लिए एथेंस में कार्य करते थे। उनके आंकड़े कहते हैं कि उस समय कम से कम 400 ग्रीक रोज मरते थे। ग्रीस की लगभग 13.5 प्रतिशत आबादी मारी गई। जर्मनी ने ग्रीस की प्राचीन कलाकृतियां लूटीं, भवनों को अपने कब्जे में किया, चांदी और निकेल को लूटा। लूटी संपत्ति की कीमत आज 162 अरब यूरो बिना ब्याज के आंकी जाती है। युद्ध के बाद समझौते के अनुसार जब जर्मनी को तमाम देशों को उनकी चीजें लौटाने के लिए विवश होना पड़ा, तब एक मात्र ग्रीस ही ऐसा देश बचा, जिसे कुछ भी नहीं मिला। आज जब ग्रीस के विरुद्ध जर्मनी सबसे अधिक बोलता है, तब ग्रीस की जनता ग्लैजोस के साथ कहती है, कि उसके ऊपर जर्मनी का कोई कर्जा नहीं, बल्कि जर्मनी को बहुत कुछ ग्रीस का कर्जा लौटाना है।

19वीं शताब्दी में ग्रीस की अमूल्य कलाकृतियां चुराने में ब्रिटेन भी पीछे नहीं रहा। पार्थेनन मंदिर की तमाम मूर्तियां आज ब्रिटिश संग्रहालय में हैं, जिन्हें एथेंस से लार्ड एलगिन चुराकर ले गए थे। यूरोप के देशों ने न केवल ग्रीस की कलाकृतियां लूटीं, बल्कि संपूर्ण ग्रीक संस्कृति को ‘हाईजैक’कर लिया। जो अपना नहीं था, उसे अपना प्राचीन घोषित कर दिया। जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैंड स्वयं को ग्रीक संस्कृति का वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हैं। ग्रीस को नहीं।


ग्रीस की लूट जारी है। ग्लैजोस का कहना है कि कर्ज ग्रीस को नहीं, यूरोप को अदा करना है। ग्रीस के यूरोपीय आकाओं ने कलाकृतियों की जो लूट की है, तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी ने ग्रीस को जो क्षतिपूर्ति नहीं दी, उसका आकलन होना चाहिए। इस आकलन के आधार पर ग्रीस का कर्जा माफ किया जा सकता है। एक लंबे अरसे से एलगिन द्वारा लूटी गई मूर्तियों को इंग्लैंड से ग्रीस वापस मांग रहा है। उन मूर्तियों के रख-रखाव के लिए ग्रीक सरकार ने विशेष संग्रहालय भी बनवाया है। किंतु ब्रिटिश सरकार के वायदों के बावजूद उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। फिर ग्रीस को दोषी क्यों माना जाए?

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