फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Epidemic of inequality, poor suffered the most

असमानता की महामारी, गरीबों को पहुंचा सबसे ज्यादा नुकसान 

Sat, 30 Jan 2021 03:04 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Published by: पत्रलेखा चटर्जी Updated Sat, 30 Jan 2021 03:04 AM IST
विज्ञापन
Epidemic of inequality, poor suffered the most
Coronavirus - फोटो : PTI

भारत में बढ़ती असमानता हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। अब यह एक 'छाया महामारी' की तरह हो गई है। यों तो कोरोना महामारी ने सबको प्रभावित किया है, लेकिन इसने गरीबों को सर्वाधिक कष्ट पहुंचाया है। देश के गरीबों को पिछले एक साल के दौरान हुई तीव्र पीड़ा को आगामी केंद्रीय बजट में अवश्य संबोधित किया जाना चाहिए, धनी और निर्धनों के बीच खतरनाक विभाजन को अनदेखा करने की कीमत बहुत अधिक होगी, क्योंकि इससे सामाजिक उथल-पुथल बढ़ती है। एक अग्रणी एनजीओ ऑक्सफैम की रिपोर्ट जमीनी हकीकत को सामने लाती है कि लॉकडाउन के दौरान भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 35 फीसदी बढ़ी है और 2009 से इन अरबपतियों की संपत्ति 90 फीसदी बढ़कर 422.9 अरब डॉलर हो गई है, जिसके बाद भारत अरबपतियों की संपत्ति के मामले में विश्व में अमेरिका, चीन, जर्मनी, रूस और फ्रांस के बाद छठे स्थान पर पहुंच गया है। यह ऐसे समय में हुआ है, जब भारत के अधिकांश लोगों को आजीविका का नुकसान उठाना पड़ा और अर्थव्यवस्था पच्चीस वर्ष बाद पहली बार मंदी में डूबी थी। 


loader

क्रेडिट विद्या द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि 60,000 रुपये प्रति माह से अधिक कमाने वालों के बीच आय का नुकसान उनकी महामारी पूर्व आय की तुलना में 10 प्रतिशत था, जबकि महीने में 20,000 रुपये से कम कमाने वालों की महामारी के दौरान आय उनकी पूर्व की कमाई से 37 प्रतिशत तक कम हो गई। ऑक्सफैम के मुताबिक, अप्रैल, 2020 में 84 फीसदी परिवारों को आय में कमी का सामना करना पड़ा। अप्रैल, 2020 के महीने में हर घंटे 1,70,000 लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाईं और लगभग 167 लोगों ने मार्च से जुलाई, 2020 के बीच नौकरी छूटने और आय में कमी से भुखमरी और वित्तीय संकट के कारण खुदकुशी कर ली। सत्ता और संसाधनों की यह घोर विषमता मात्र एक नैतिक तर्क नहीं है। यह रोजमर्रा के जीवन और देश के भविष्य को प्रभावित करने वाला एक व्यावहारिक मुद्दा भी है। 

हम जानते हैं कि पैसा ही पैसा कमाता है। जिनके पास पैसा है, वे और भी ज्यादा समृद्ध होते जा रहे हैं, जबकि जो लोग अधिक अनिश्चितता में डूबे हैं, उनके पास जोखिम उठाने का माद्दा नहीं है, जो उनकी स्थिति बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। सरकार के समर्थन के बिना उनके आगे और डूबने का खतरा है। अगर ज्यादा से ज्यादा लोग कम कमाते हैं, तो उपभोक्ता कौन होगा? इसका क्या मतलब है, जब लाखों गरीब लोगों का जीवन और भी कमजोर हो जाता है? महामारी ने न केवल आय संबंधी असमानताओं को बढ़ाया है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख पैमाने में खाई को भी चौड़ा किया है। विषमता के वायरस और देश में ऑनलाइन शिक्षण कक्षाओं में बदलाव के कारण विशेष रूप से गरीब घरों और हाशिये के सामाजिक समूहों के बच्चों पर गंभीर असर पड़ा है। यह पहले से ही असमान शैक्षिक प्रणाली में लैंगिक और अमीरों व गरीबों के बीच असमानता के जोखिम को भी बढ़ाता है। पांच राज्यों में हुए ऑक्सफैम इंडिया के सर्वेक्षण में बताया गया है कि सरकारी स्कूलों में 40 प्रतिशत के करीब शिक्षकों को डर है कि लंबे समय तक स्कूल बंद रहने से एक तिहाई छात्र स्कूल फिर से खुलने पर वापस नहीं लौटेंगे। स्कूल छोड़ने वाले छात्रों का वास्तविक अनुपात तभी स्पष्ट हो सकेगा, जब स्कूल फिर से खुलेंगे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि स्कूल छोड़ने की दर एक वर्ष में दोगुनी हो सकती है। 

ऑक्सफैम ने बताया कि सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट की दर दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के बीच देखी जाएगी। उनमें से कई बाल श्रम और बाल विवाह के शिकार हो सकते हैं। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भारत सरकार से बच्चों को बाल श्रम में फंसने से बचाने का आग्रह किया है। लड़कियां अधिक संवेदनशील होती हैं, क्योंकि वे जल्दी और जबरन शादी, हिंसा और कम उम्र में गर्भधारण सहित अतिरिक्त जोखिमों में फंस जाती हैं। प्रैक्सिस द्वारा किए गए सर्वे में 52 फीसदी किशोर उम्र की लड़कियों ने (जिनमें से 75 फीसदी अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति से थीं) बताया कि तकनीकी सुविधाओं की कमी, घरेलू झगड़े और घरेलू हिंसा के कारण उनकी पढ़ाई का समय काफी कम हो गया है। स्कूलों के बंद होने के अन्य गंभीर पक्ष भी हैं, जो समान रूप से चिंता का विषय हैं और अमीर व गरीब के बीच विभाजन को गहरा कर चुके हैं। स्कूल न केवल प्रमुख शिक्षा प्रदाता हैं, बल्कि सामाजिक कल्याण योजनाओं के वितरण स्थल भी हैं। ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों को बंद करने से मध्याह्न भोजन (एमडीएम) योजना बाधित हुई है, जिसमें 12.6 लाख स्कूलों में 12 करोड़ बच्चे शामिल हैं। अनुसूचित जनजाति के लगभग 77.8 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 69.4 प्रतिशत बच्चे सरकारी शिक्षण संस्थानों में हैं, जिनमें से कई अपने पोषण के लिए मध्याह्न भोजन पर निर्भर हैं। यह कमजोर आबादी, मुख्य रूप से दलितों और आदिवासियों के बीच कुपोषण के जोखिम को बढ़ाता है। 

ऑक्सफैम इंडिया के सर्वेक्षण में पाया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस योजना को जारी रखने के लिए कहने के बावजूद 35 प्रतिशत बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिला। जिन 65 प्रतिशत छात्रों को मध्याह्न भोजन योजना का लाभ मिला, उनमें से केवल आठ प्रतिशत को पका भोजन मिला, 53 प्रतिशत को सिर्फ सूखा राशन मिला और चार प्रतिशत को मध्याह्न भोजन के बदले धन मिला। जहां आभिजात्य वर्ग के लोग घरों के अंदर रह सकते हैं, कमजोरियों पर काबू पा सकते हैं, वहीं गरीबों के बीच पानी, स्वच्छता और खाना पकाने के लिए ईंधन की कमी से लाखों लोगों को खतरा हो सकता है। आगामी केंद्रीय बजट में इन जमीनी हकीकतों को निश्चित रूप से संबोधित किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत का भविष्य दांव पर है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed