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सामाजिक सुरक्षा का दायरा: 12 साल बाद ईपीएफओ में बड़ा बदलाव, वेतन में आंशिक कमी का दूरगामी लाभ

Fri, 18 Sep 2026 06:04 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Fri, 18 Sep 2026 06:04 AM IST
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सार
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की अनिवार्य सदस्यता के लिए वेतन सीमा में बढ़ोतरी से बड़ी संख्या में कामगार सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ सकेंगे। नई सीमा लागू होने के बाद भविष्य निधि, पेंशन और बीमा से संबंधित लाभों का विस्तार होगा। लंबे अंतराल के बाद किए गए इस बदलाव को वेतन और जीवनयापन की बदलती परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है। 
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ईपीएफओ का दायरा बढ़ा - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए मासिक वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये करने का फैसला देश के श्रम बाजार में सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण व दूरगामी कदम है। इस निर्णय से 51 लाख से अधिक नए कर्मचारियों के भविष्य निधि, कर्मचारी पेंशन योजना व जीवन बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में आने का रास्ता साफ होगा। करीब 12 वर्षों बाद वेतन सीमा में यह बढ़ोतरी इसलिए भी जरूरी हो गई थी, क्योंकि इस अवधि में वेतन, न्यूनतम मजदूरी और जीवनयापन की लागत में उल्लेखनीय बदलाव आया है। अब तक 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को ईपीएफओ की अनिवार्य व्यवस्था में शामिल करना नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर था। नई व्यवस्था से इस दायरे का विस्तार होगा और बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी औपचारिक सामाजिक सुरक्षा तंत्र से जुड़ेंगे, जो अब तक इससे बाहर थे। यह बदलाव संगठित रोजगार की सुरक्षा को व्यापक बनाने और कामगारों को भविष्य की आर्थिक अनिश्चितताओं से बचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस फैसले को बृहस्पतिवार (विश्वकर्मा पूजा) के दिन से ही लागू कर दिया गया है। यह कदम देश के कार्यबल की सामाजिक सुरक्षा के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस फैसले के दो पहलू हैं-पहला, कर्मचारियों के हाथों में आने वाले वेतन में आंशिक कमी और दूसरा सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली बड़ी बचत राशि। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली बचत की राशि भले ही वृद्धावस्था में आत्मनिर्भर बनाएगी, पर वर्तमान में जब महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है, तब मासिक आय में कटौती तात्कालिक रूप से घरेलू बजट को बिगाड़ सकती है। यह निर्णय नियोक्ताओं के लिए, अधिक सुरक्षित कार्यबल, कर्मचारियों को बनाए रखने, श्रमबल की स्थिरता और मनोबल में सुधार करने में योगदान दे सकता है, जिससे भविष्य की चुनौतियों के लिए अधिक सक्षम कार्यबल तैयार करने में मदद मिलेगी। हालांकि, इस फैसले से सरकारी खजाने पर सालाना लगभग 11,339 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो फिलहाल करीब 10,250 करोड़ रुपये है। कुल मिलाकर, यह फैसला देश के संगठित क्षेत्र को मजबूत करने, मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों को वृद्धावस्था के लिए वित्तीय सुरक्षा देने और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को अधिक व्यापक एवं समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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