समाधान: मानसून में डूबते शहर, नगर के साथ-साथ महत्वपूर्ण है पर्यावरण नियोजन
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विस्तार
हर बार ग्रीष्म ऋतु में ज्यादातर भारतीय गर्मी का सामना करते हैं और उन्हें मानसून से ही राहत मिलती है। फसलों के लिए मानसून पर निर्भर रहने वाले किसान यह सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं, कि उनकी फसलों को बारिश से फायदा हो। इसके साथ बहुत-से लोग ऐसे भी होते हैं, जो प्रकृति के प्रकोप से डरते हैं, क्योंकि भयंकर बारिश तबाही मचा देती है। और यह अब सिर्फ शहरी क्षेत्रों की कहानी नहीं है, बल्कि इन दिनों पूरा भारत गंभीर मानसून के प्रकोप का सामना कर रहा है। बड़े से लेकर छोटे शहरों तक का जलमग्न होना और लोगों का इससे प्रभावित होना अब आम बात हो गई है। मूसलाधार बारिश और बाढ़ से उत्तर भारत के सात राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली शामिल हैं।
अभी जुलाई की शुरुआत है और पहले ही देश के कई हिस्से भारी बारिश का सामना कर रहे हैं। विडंबना यह है कि कुछ महीने पहले ही भविष्यवाणी की गई थी कि हमें अल नीनो प्रभाव का सामना करना पड़ेगा, जो मूलतः मानसून को दबा देता है, जिससे मानसून के दिनों में कुल बारिश में कमी हो जाती है। लेकिन हाल के हफ्तों में हुई बारिश को देखें, तो जलमग्न होने के कारण कई शहर ठप पड़ गए हैं और कई स्थानों पर स्कूलों को बंद कर दिया गया है। विभिन्न कार्यालयों को यह सलाह दी गई है कि वे अपने कर्मचारियों से घर से काम करवाने पर विचार करें। बाढ़ जैसी स्थिति से होने वाले नुकसान का आकलन कई हजार करोड़ रुपये का है और फायदे का कोई आंकड़ा नहीं है।
ऐसी कई चीजें हैं, जो अत्यधिक और कभी-कभी अप्रत्याशित बारिश का कारण बन रही हैं, जिनमें जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी की सतह के बढ़ते तापमान का असर भी शामिल है। लेकिन भारी नुकसान के लिए असली दोषी खराब बुनियादी ढांचा और भावी मौसम की स्थितियों, खासकर भारी बारिश को ध्यान में रखते हुए अनियोजित निर्माण है। कृषि योग्य भूमि और झील एवं आर्द्रभूमि जैसे सूख चुके पुराने जल निकायों का उपयोग कंकरीट से बनी संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जा रहा है, जो पानी को सोखने के लिए उपयुक्त नहीं है। आम तौर पर, झीलें और तालाब अतिरिक्त सतही पानी को बनाए रखने के काम आते हैं और यह भारी बारिश एवं बाढ़ के दौरान प्राकृतिक नमी का एक प्रमुख घटक है।
इसी तरह, पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण और प्राकृतिक जल निकायों के प्रवाह में जबरन बदलाव से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। वन भूमि मिट्टी को बनाए रखने और भू-जल को रीचार्ज करने में मदद करती है। विकास और सड़कें बनाने के नाम पर वनों की कटाई के कारण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह का नुकसान चिंता का विषय है। हर साल कोई न कोई पहाड़ी इलाका बारिश और बाढ़ की मार झेलता रहा है। अक्सर इन इलाकों में गांव डूब जाते हैं और जीवन व आजीविका बुरी तरह प्रभावित होती है। यहां तक कि एक-दो दिन की छोटी-सी अभूतपूर्व बारिश भी शहरों और कस्बों को लंबे समय तक जलमग्न कर देती है।
उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नोएडा एवं गुड़गांव में नव विकसित टाउनशिप को लें, तो सड़कों पर कई घंटों तक नदियों की तरह पानी जमा रहना आम बात है, जिससे यातायात और जीवन रुक जाता है। इन शहरों को बाकायदा योजना बनाकर बसाया गया, फिर भी इन्हें प्रकृति के प्रकोप का सामना करना पड़ता है, क्योंकि योजना में मानसून, पानी के प्रवाह व भूजल रिचार्ज करने पर ध्यान नहीं दिया गया।
वास्तव में, इन कस्बों और शहरों के निर्माण में इतना ज्यादा कंकरीट का जंगल बसाया गया है कि पानी सोखने के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं बची है। इन शहरों के योजनाकारों ने वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण पर ध्यान ही नहीं दिया, जो बारिश होने पर पानी की बर्बादी के साथ-साथ तबाही का कारण बनता है। इसके लिए पूरी तरह से नगरपालिकाएं और राज्य सरकारें दोषी हैं, जो आकस्मिक स्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए उचित योजना बनाने और बड़े पैमाने पर शहरीकरण के प्रभाव पर विचार किए बिना निर्माण गतिविधियों में उदारता बरतती हैं।
शहरों और नगर पालिकाओं के मास्टर प्लान जनसंख्या में वृद्धि और उसके प्रबंधन के लिए सीमित संसाधनों के प्रभाव का अध्ययन किए बिना क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे यातायात को आसान और तेज बनाने के लिए फ्लाइओवर और सड़कों का तो निर्माण करते हैं, लेकिन जल निकासी के लिए पर्याप्त नालियां और मानसून में अतिरिक्त पानी को जमा करने के उपाय नहीं करते हैं। जिन जगहों पर ऐसी सुविधाएं बनाई भी गई हैं, वहां रख-रखाव के अभाव में पाइप उन्हीं दिनों जाम (अवरुद्ध) पाए जाते हैं, जब उनकी वास्तव में जरूरत होती है।
शहरी योजना का उद्देश्य शहर के नक्शे और क्षेत्रों को चिह्नित करके गतिशीलता, जल आपूर्ति, बिजली, स्वच्छता और जल निकासी का नेटवर्क तैयार कर शहर को कार्य कुशल बनाना है। कभी-कभी कार्य कुशल शहर बनाने पर ध्यान केंद्रित करने से उसके प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण उपेक्षित हो जाता है। शहर की बढ़ती आबादी को समायोजित करने या रियल एस्टेट संबंधी लालच को पूरा करने के लिए प्राकृतिक जलाशयों की जगह पर भवन, सड़क या परिवहन प्रणालियां बना दी जाती हैं। किसी भी शहर में कुछ वर्षों तक रहने वाले ज्यादातर नागरिक उस शहर में हुए ऐसे बदलाव के साक्षी होते हैं। अब बंगलूरू का ही उदाहरण ले लीजिए, इस शहर ने डिजिटल के बजाय डिग इट ऑल (हर जगह खुदा हुआ) का उपनाम हासिल कर लिया है। यहां हर बार बारिश के मौसम में बाढ़ आ जाती है और कई आवासीय इलाके डूब जाते हैं और कुछ इलाके तो बरसात के दौरान क्षतिग्रस्त भी हो जाते हैं।
भीषण मानसून झेलने के आदी केरल को भी शहरीकरण के चलते चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वहां हरित आवरण घट गया है। भारी मानसून के दौरान शहरों व कस्बों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उसका प्रमुख कारण खराब योजना है, जो धीरे-धीरे पर्यावरणीय संसाधनों को भी नुकसान पहुंचा रही है। जिस प्रकार शहरी नियोजन महत्वपूर्ण है, पर्यावरण नियोजन भी महत्वपूर्ण है।
अब समय आ गया है कि सरकारें और योजना एजेंसियां इन गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करें, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश के लोग मानसून के दौरान सुरक्षित रह सकें और पर्यावरणीय बदलावों का सामना करने के लिए हमारे पास बुनियादी ढांचा मौजूद रहे।