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पर्यावरण बचाने की चुनौती
Sun, 12 Jan 2020 06:35 PM IST
Raman Singh
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी
Published by: Raman Singh
Updated Sun, 12 Jan 2020 06:35 PM IST
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अनिल प्रकाश जोशी
- फोटो : a
नए साल की कितनी भी चुनौतियां हों, पर सबसे बड़ी चुनौती पारिस्थितिकी संरक्षण ही है। बदलते हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि अब साल के किसी भी मौसम में राहत नहीं मिलने वाली। पिछले एक दशक में ऐसा हुआ भी है। पर्यावरण संरक्षण की तीन बातें हमें समझनी चाहिए। पहला, हम इस परिवर्तन को समझें। दूसरा, इसके कारणों में अपनी कमियां भी तलाशें कि पर्यावरण को बिगाड़ने में हमारी भागीदारी कितनी रही। और तीसरी बात यह कि हमारे पास ऐसा कौन-सा रास्ता है, जो हमें लगातार बताए कि पर्यावरणीय दृष्टि से हम देश-दुनिया में कहां खड़े हैं।
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हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हमारी सुविधाएं ही हैं, जिन्हें हम जुटाने में लगे हैं और यही सबसे घातक सिद्ध हुआ है। जब से स्कूटर, मोटर साइकिल आम हुई है, साइकिल प्रतीकात्मक रह गई। पहले साइकिल यातायात का साधन थी, आज इसकी जगह सिकुड़ गई और कारों ने सड़क घेरनी शुरू की। आज करोड़ों की संख्या में सड़कों पर उतरी गाड़ियां ही प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बनी हैं। एक गाड़ी एक लीटर से दोगुना कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा कर देती है। ट्रेन, मेट्रो और बस जैसे परिवहन के सार्वजनिक साधनों को सिर्फ बढ़ावा देने की कोशिश ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग को इनके इस्तेमाल के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए।
ऊर्जा की बढ़ती खपत से भी स्थितियां बिगड़ी हैं। जब सर्दी पड़ती है, तब हम बिना हीटर के नहीं रह सकते और जब गर्मी आती हैं, तब बिना एसी के हमारा जीना दूभर हो जाता है। इन्हें अब हमारी हैसियत के रूप में भी देखा जाने लगा है। दुनिया में सबसे ज्यादा एयरकंडीशनर भारत में हैं। अगर हम अपने उद्योगों पर नजर डालें, तो साफ है कि ज्यादातर उद्योग आवश्यकताओं से ज्यादा विलासिताएं परोसने में जुटे हैं। आज के हालात को देखते हुए यही एक संकल्प लेना चाहिए कि ऊर्जा खपत के संयत्रों पर निर्भरता घटाकर हम अपने जीवन को नई दिशा दें।
जल, जंगल और जमीन कभी भी हमारी लिए बड़ी प्राथमिकता नहीं बने। हालांकि प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण का बड़ा अभियान शुरू किया है, पर यह दायित्व जब तक सबका नहीं होगा, तब तक जल संरक्षण की पहल को कोई गति नहीं नहीं मिलेगी। ऐसे ही हवा-मिट्टी से जुड़े हुए प्रश्न हैं, जो अब तक अनुत्तरित हैं। वनों को ही देखिए। वनों की नई परिभाषा जब तक नहीं गढ़ी जाएगी कि वन वे हैं, जो किसी जलवायु विशेष में पनप सकते हों और जो वहां की पारिस्थितिकी का हिस्सा हों, तब तक हम वनों का सही तरह से लाभ नहीं उठा पाएंगे। हमें मिट्टी को लेकर भी गंभीर होना चाहिए। मिट्टी जितनी विषैली होगी, हमारा जीवन उतना ही दूभर होगा। रासायनिक खादों के अति उपयोग से हमने उन सबको भी खत्म कर दिया, जिनका योगदान पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर करने में या बेहतर फसल देने में था। इन संसाधनों के सही हालात का लेखा-जोखा रखना भी देशों की जिम्मेदारी बनती है, खासतौर से तब, जब बढ़ती-घटती जीडीपी आर्थिक मोर्चे पर देश को उठाती-गिराती हो। गिरते रुपये के मूल्य से व्यथित न होकर सरकार को बढ़ते, बचते संसाधनों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
वर्ष 2020 की सबसे बड़ी चुनौती इन्हीं के चारों ओर घूमती है, क्योंकि हमें यह जान लेना चाहिए कि अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है और जिस तरह हम अपनी पृथ्वी को नर्क बनाने में जुटे हैं, उसमें आने वाले समय में पाताल की परिभाषा बदल जाएगी, क्योंकि पृथ्वी की सतह ही पाताल बन जाएगी और इसका दोष हमारा ही होगा।