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जन्म-मृत्यु के पार एक गहरा रहस्य जानिए ओशो और बुद्ध से

Mon, 19 Jan 2015 12:49 PM IST
स्वामी चैतन्य कीर्ति
स्वामी चैतन्य कीर्ति Updated Mon, 19 Jan 2015 12:49 PM IST
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enlightened vital across life

बुद्धत्व के जगत में ओशो के साथ एक नए अध्याय का शुभारंभ हुआ था। एक ऐसा अध्याय, जो अतीत की किसी धार्मिक परंपरा या शृंखला की कड़ी नहीं था, बल्कि उसने एक नए मनुष्य का, एक नए जगत का सूत्रपात किया। ओशो सदा कहते थे कि वह कुछ नया नहीं कह रहे हैं, वह तो सिर्फ सत्य के ऊपर चढ़ी धूल हटा रहे हैं, ताकि उसका प्रत्यक्ष दर्शन हो सके। उनका कहना था, इसी सत्य को बुद्ध ने कहा, महावीर ने कहा, कृष्ण ने कहा, ईसा मसीह ने कहा, मगर युग-दर-युग उस सत्य पर धूल की कई परतें चढ़ चुकी हैं। इसलिए इन परतों को हटाना जरूरी है।

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अपनी 35 वर्षों की आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने मानव चेतना के विकास के हर पहलू को उजागर किया। पूर्व के अध्यात्म-आकाश के नक्षत्रों जैसे शिव, नारद, पतंजलि, कृष्ण, कबीर, नानक, गोरख आदि शंकराचार्य, फरीद, मीरा, अष्टावक्र आदि के साथ पश्चिम के मनीषियों जैसे गुरचिएफ, जरथ्रुस्त्र, ईसा मसीह, खलील जिब्रान, पायथोगोरस पर उनके अनेक प्रवचन उपलब्ध हैं।
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जीवन का ऐसा कोई भी आयाम नहीं है, जो उनके प्रवचनों से अनछुआ रहा हो। जीवन, मृत्यु, अहंकार, प्रेम, ध्यान, संन्यास, संगीत, विवाह, कला, मनोविज्ञान, शिक्षा, राजनीति, समाज, जनसंख्या-विस्फोट, नारी जैसे अनेक विषयों पर उनकी क्रांतिकारी जीवन-दृष्टि उपलब्ध है। योग, तंत्र, ताओ, जेन, हसीद, सूफी जैसी विभिन्न साधना-परंपराओं के गूढ़ रहस्यों पर उन्होंने सविस्तार से प्रकाश डाला है।
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वह कहते थे, मेरा संदेश कोई सिद्धांत, कोई चिंतन नहीं है। मेरा संदेश तो रूपांतरण का एक विज्ञान है। आज उनकी पच्चीसवीं पुण्यतिथि उनके इन्हीं संदेशों को आत्मसात करने का दिन है।

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