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भारतीय पार्टी प्रणाली की मौत, जानिए क्यों ऐसा कह रहे रामचंद्र गुहा
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भारत का लोकतंत्र
- फोटो :
iStock
विस्तार
भारतीय और विदेशी, दोनों तरह के विद्वानों ने तर्क दिया है कि हाल के वर्षों में हमारे लोकतंत्र की सेहत बिगड़ी है। हालांकि भारतीय लोकतंत्र की गिरावट के एक पहलू पर संभवतः वैसा ध्यान नहीं गया है, जैसा कि जाना चाहिए। यह है, पार्टी प्रणाली का पतन। दरअसल, कुछ अर्थों में यह इस बात स्पष्ट संकेत है कि प्रेस की आजादी पर हमला, स्वतंत्र संस्थानों की अधीनता और चुनावी चंदे की अपारदर्शिता इत्यादि की तुलना में इसकी वजह से भारतीय लोकतंत्र कितना नीचे गिर गया है। हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा अपने बेटे को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर गौर कीजिए।
द्रमुक एक लोकप्रिय आंदोलन से उत्पन्न हुआ, जिसने अधिक आबादी वाले, और इसीलिए अधिक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों के आधिपत्य वाले आवेगों के सामने तमिल पहचान पर जोर दिया। तमिल संस्कृति की स्वायत्तता और आत्म सम्मान के लिए खड़े होने की इच्छा जहां इसके पीछे की मुख्य ताकत थी, वहीं द्रमुक ने जाति और लैंगिक मुद्दों पर तब उत्तर में प्रभुत्व वाली कांग्रेस पार्टी की तुलना में अधिक प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाया था। इसके अलावा 1967 में सत्ता में आने के बाद से द्रमुक ने राज्य की पिछली सरकारों की तुलना में कहीं अधिक कल्याणकारी प्रशासन देना चाहा।
द्रमुक ने खुद को सांस्कृतिक स्वाभिमान और सामाजिक सुधार वाली पार्टी के तौर पर प्रस्तुत किया। यह एक पारिवारिक फर्म होने के लिए नहीं थी। और यह संभवतः कभी ऐसी नहीं होती, यदि इसके पहले मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई की असमय मौत न हो गई होती। एम करुणानिधि ने अपने बेटे एमके स्टालिन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में तराशा और तमिल अभिमान की पार्टी को उस दिशा में मोड़ दिया, जिसकी कल्पना उसके संस्थापकों ने नहीं की थी।
कुनबापरस्ती पर चलने वाली द्रमुक अकेली बड़ी क्षेत्रीय पार्टी नहीं है। अकाली दल की विरासत तो द्रमुक से भी पुरानी है। इसकी स्थापना के बाद कई दशकों तक इसका मुख्य उद्देश्य एक मजबूत सिख पहचान के लिए लड़ना और उसकी रक्षा करना था। प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में यह एक पारिवारिक पार्टी में बदल गई। शिवसेना और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसे अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी यही रास्ता अपनाया। यकीनन जब स्टालिन ने अपने बेटे उदयनिधि को मंत्रिमंडल में शामिल किया, तब वह पक्के तौर पर उद्धव ठाकरे और के चंद्रशेखर राव जैसे पूर्ववर्तियों से प्रेरित रहे होंगे, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते अपने बेटों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था।
फिर हमारे पास सपा, राजद और रालोद (राष्ट्रीय लोकदल) जैसी उत्तर भारतीय पार्टियां हैं, जिनमें पार्टी नेतृत्व को पिता से पुत्र को हस्तांतिरत करने से उनकी 'सामाजिक न्याय' के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता को गहरा आघात पहुंचा है। यह मेरा तर्क है कि उपरोक्त में से कुछ भी नहीं हुआ होता, यदि सबसे पुराना और सबसे प्रतिष्ठित भारतीय राजनीतिक दल इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एक पारिवारिक फर्म नहीं बनता। आज की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इसी नाम की पार्टी से बहुत थोड़ी-सी समानता रह गई है। इन दोनों के बीच अतुलनीय अंतर मूल कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता के पारिवारिक इतिहास में (अन्य बातों के अलावा) दर्ज किया गया है। महात्मा गांधी के चार बेटे थे; ब्रिटिश राज का विरोध करते हुए ये सभी कई बार जेल गए; इनमें से कोई भी स्वतंत्र भारत में मंत्री तो छोड़िए, संसद सदस्य तक नहीं बना। गांधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश करने की बाबत पूछा, तो उन्होंने इसके बजाय एक अखबार के संपादक के रूप में अपने काम को पसंद किया।
इस तरह की हिचकिचाहट सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही नहीं, बल्कि पूरी भारतीय राजनीति से गायब है। इंदिरा गांधी द्वारा अपने बेटों संजय और राजीव का अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में अभिषेक करने से द्रमुक और अकालियों के नेताओं को भी अपने बच्चों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन मिला। एक पीढ़ी बाद सोनिया गांधी द्वारा अपने बेटे राहुल के अलावा किसी और को कांग्रेस के प्रमुख नेता के रूप में मानने से इनकार करने से भारतीय राजनीति में वंशवादी संस्कृति को प्रोत्साहन मिला।
सच है कि भारत में अनेक पेशे पारिवारिक लाइन पर चलते हैं। हालांकि अभिभावक के कारोबार को अपनाने वाले बच्चे को थोड़ा जल्दी अवसर मिल जाता है, लेकिन अंततः उसकी अपनी उपलब्धियां ही मायने रखती हैं। रोहन गावस्कर अपने पिता के कारण क्रिकेटर बने, भले ही वह कम सफल रहे। चेतेश्वर पुजारा भी अपने पिता के कारण क्रिकेटर बने, लेकिन वह अधिक सफल हैं। अभिषेक बच्चन को अपने पिता के नाम के कारण कुछ भूमिकाएं जरूर मिलीं, लेकिन उन्होंने जितनी भी कोशिश की, उनकी प्रसिद्धि कभी भी अमिताभ की बराबरी नहीं कर पाई।
पार्टियों का पारिवारिक फर्मों में रूपांतरण लोकतांत्रिक पतन की एक अभिव्यक्ति है। दूसरा है पार्टियों का एक ही नेता के अधीन होना। निस्संदेह भारतीय जनता पार्टी ऐसा प्रदर्शन कर रही है। पूर्व-मोदी युग की भाजपा कभी भी किसी एक नेता की छवि की बंधक नहीं रही है, जैसा कि वह आज बन गई है। तब इस पार्टी ने 'व्यक्ति पूजा' का कड़ा विरोध किया, यह दावा करते हुए कि इसका सामूहिक नेतृत्व और आंतरिक पार्टी लोकतंत्र इसे अधिनायकवादी इंदिरा गांधी की कांग्रेस से अलग करता है। वाजपेयी अपने मंत्रिमंडल में नरेंद्र मोदी की तरह हावी नहीं थे; भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने कभी भी प्रधानमंत्री के बारे में चापलूसी भरे शब्द बोलने की कोशिश नहीं की, जैसा कि अब करते हैं।
मई, 2014 से केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल के विशाल संसाधन प्रधानमंत्री की छवि को चमकाने के लिए समर्पित हैं, जो उन्हें एक अर्ध-दिव्य व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिनके व्यक्तित्व में भारतीय राष्ट्र और स्वयं भारतीय सभ्यता का अतीत, वर्तमान और भविष्य निहित है। मैंने यहां पहले भी लिखा है कि नरेंद्र मोदी के छवि निर्माण से भारतीय लोकतंत्र को किस तरह से नुकसान पहुंचा है। यह दुखद है कि इसने दूसरी पार्टियों के व्यवहार को भी प्रभावित किया है। आम आदमी पार्टी का जब गठन हुआ था, तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध इसके दृष्टिकोण और विशेषाधिकार से इसकी दूरी ने प्रभावित किया था। हालांकि पिछले वर्षों में यह अरविंद केजरीवाल की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की संवाहक बन गई है। यह विचार, कि एक अकेला व्यक्ति एक पूरी पार्टी, एक पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के छवि निर्माण में भी दिखाई देता है; और यहां तक कि केरल में पिनाराई विजयन के छवि निर्माण में भी।
भारतीय पार्टी प्रणाली का पतन कमोबेश पूर्ण हो चुका है, जिसमें राजनीतिक दलों का एक समूह पारिवारिक फर्म बन गया है, और दूसरा समूह अर्ध-धार्मिक पंथ बन गया है और अपने नेता को एक जीवित देवता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। राजनीतिक दल यकीनन आधुनिक समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है, जिसके स्वस्थ कामकाज पर लोकतंत्र खुद ही निर्भर करता है।
यदि पार्टियां स्वयं सम्मान और फरमाबरदारी की संस्कृति में काम करती हैं, यदि वे परिवार-पूजा या नायक-पूजा को अनिवार्य करती हैं, तो यह व्यापक राजनीतिक संस्कृति के लिए क्या दर्शाता है? यदि कोई नेता पार्टी के सदस्यों से निर्विवाद वफादारी चाहता है, तो वह सत्ता में होने पर नौकरशाही, पुलिस, मीडिया या न्यायपालिका से अपनी नीति के दुर्भावनापूर्ण कार्यों के लिए निर्विवाद समर्थन की मांग क्यों नहीं करेगा?