फिल्मी सितारों का चुनावी सफर
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पहले कांग्रेस में कथित रूप से शामिल हुई सपना चौधरी के भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हैं। इससे पहले उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह कलाकार हैं, उन्हें राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। दरअसल कलाकार राजनीति को भी अभिनय समझते हैं। अरसे से राजनीति में अभिनेता, अभिनेत्रियों, खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है। चूंकि जनता में इनकी बहुत लोकप्रियता होती है, इसलिए अधिकांश दल इन्हें अपने पाले में खींचने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस ने कोशिश की थी कि वह सपना चौधरी को हेमा मालिनी के खिलाफ चुनाव लड़ाए। बाद में टिकट किसी और को दे दिया गया। हेमा मालिनी जब अपना नामांकन भरने आईं और उनसे पूछा गया कि उन्होंने मथुरा की जनता के लिए क्या किया है, तो उन्होंने जवाब दिया कि काम तो बहुत किए हैं। मगर कौन-कौन से काम किए हैं, यह याद नहीं। हेमा ने मथुरा-वृंदावन में बंदरों के आतंक को देखते हुए बंदर अभयारण्य बनाने की बात कही थी, वह बना, ऐसी कोई खबर नहीं आई।
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आपातकाल के बाद शत्रुघ्न सिन्हा, देव आनंद , विजय आनंद आदि ने जनता पार्टी के लिए काम किया था। उसके बाद अक्सर कई मशहूर अभिनेता, अभिनेत्रियां चुनाव लड़ते रहे हैं। कहते हैं कि राजेश खन्ना जब नई दिल्ली से चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्हीं के कारण लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा था। शत्रुघ्न सिन्हा लंबे समय तक भाजपा के सांसद रहे और अब कांग्रेस से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। सुनील दत्त मुंबई उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से कांग्रेस के सांसद थे। विनोद खन्ना पंजाब के गुरदासपुर से भाजपा के सांसद थे। अभिनेता धर्मेंद्र को भााजपा ने बीकानेर से चुनाव लड़वाया था, पर चार साल बाद इलाके में उनके गायब होने के पोस्टर नजर आए! राज बब्बर पहले सपा में थे, अब कांग्रेस में हैं और फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ रहे हैं।
गोविंदा भी मुंबई से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद बन चुके हैं। राजीव गांधी के परम मित्र अमिताभ बच्चन जब इलाहाबाद से चुनाव लड़े थे, तब उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे बड़े नेता को पराजित किया था। पर बाद में अमिताभ ने कहा कि वह राजनीति के लिए नहीं बने हैं। शबाना आजमी, रेखा और जया भी राज्यसभा में रह चुकी हैं या हैं। नगमा और खुशबू तो कांग्रेस की प्रवक्ता भी हैं। कई बार लोग इनके खिलाफ अपशब्द भी बोलते हैं। महिलाओं के लिए तो बेहद अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
उत्तर भारत में इन अभिनेता-अभिनेत्रियों को देखने, उनसे मिलने आदि के कारण लोग एक बार भले उन्हें चुनाव में जिता दें, पर दूसरी पारी इनके लिए हमेशा मुश्किल होती है। सिर्फ मशहूर होने से ही चुनाव क्षेत्र के लोगों का काम नहीं चलता। वे चाहते हैं कि जिसे उन्होंने अपना प्रतिनिधि चुना है, वे उनकी समस्याओं का हल करें। उनसे मिले-जुलें। पर इनमें से अधिकांश मुंबई में रहते हैं। अब अभिनय करें कि चौबीस घंटे की राजनीति संभालें। इन्हें जानना चाहिए कि जो लोग आपको चुनाव जिताते हैं, उन्हें आपसे बड़ी अपेक्षाएं भी होती हैं। दलों को भी सोचना चाहिए कि वे मात्र इनकी प्रसिद्धि के कारण ऐन चुनाव के मौके पर इन्हें पार्टी में शामिल करने के लिए कतारबद्ध क्यों खड़े रहते हैं।
दक्षिण भारत में ऐसा नहीं है। वहां एम जी आर, करुणानिधि, जयललिता और एनटी रामाराव फिल्म कलाकार थे और मुख्यमंत्री भी बने, जिससे सियासत में उनकी भागीदारी सिर्फ नाम और चेहरे की रही। दक्षिण के इन लोगों से उत्तर भारत के लोग सीख तो सकते ही हैं।