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कठिन समय में चुनाव

Thu, 06 Mar 2014 09:38 PM IST
श्याम बेनेगल/वरिष्ठ फिल्मकार
श्याम बेनेगल/वरिष्ठ फिल्मकार Updated Thu, 06 Mar 2014 09:38 PM IST
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Election in deficult time

हमें संविधान को नई समझ के साथ देखने की जरूरत है। इसका कारण इस सवाल का उत्तर पाना है कि क्या संविधान के कारण हम नाकाम हो रहे हैं या फिर हमारे कारण संविधान नाकाम हो रहा है। गौर करेंगे, तो हकीकत सामने आएगी कि संविधान के कारण हम नाकाम नहीं हो रहे, बल्कि संविधान को हम नाकाम कर रहे हैं।

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हमारी राजनीतिक व्यवस्था संविधान को नाकाम बना रही है। हमारा संविधान इस बात की बेहतरीन नजीर है कि कैसे एक लोकतांत्रिक देश काम करता है। हमारे संविधान में राष्ट्र को दिशा देने वाले आदर्श सिद्धांत दर्ज हैं। जिन लोगों ने इसे दिसंबर, 1946 से नवंबर, 1949 तक तैयार किया, उन्होंने हमारे गणतंत्र की नींव रखी। मैं उन सभी 294 लोगों को लोकतांत्रिक भारत का ‘फाउंडिंग फादर्स’ कहूंगा। उनमें से थोड़े से लोगों को ही हम जानते हैं।
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अगर कभी हमें अपना संविधान नाकाम होता दिखाई देता है, तो इसके पीछे कारण होते हैं। हम एक बेहद जटिल देश में रहते हैं। हमारा सामाजिक ताना-बाना जटिल है। ऐसे जटिल समाज के लिए संविधान का निर्माण करना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन हम इसमें कामयाब रहे। हमने खुद को एक ‘जीवंत संविधान’ दिया। जीवंत इसलिए कि हम इसकी आत्मा या केंद्र में बगैर कोई परिवर्तन किए इसमें संशोधन करने में सफल हैं।
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हमारे संविधान में सौ से भी ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। गौर करें कि ये संशोधन नई-नई पीढ़ियों की आवश्यकता और सुविधा के अनुसार हुए हैं। संविधान को ऐसा होना चाहिए कि वह समय के हिसाब से होने वाले बदलावों को आत्मसात कर ले। हमारा संविधान इसमें सफल है। आप सारी समस्याओं को एक साथ सुलझा नहीं सकते। सच यह भी है कि किसी समस्या को आप पूरी तरह नहीं सुलझा सकते।

उन्हें सापेक्ष रूप से ही सुलझाया जा सकता है। जैसे भाषा की समस्याएं। वर्ष 1956 में हमने भाषा के आधार पर राज्य बनाए। लेकिन आज आंध्र प्रदेश का मामला देखिए। एक ही भाषा है, लेकिन दो राज्य बन गए- सीमांध्र और तेलंगाना। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि किसी एक आधार पर सारी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

इतिहास को देखें, तो ऐसा नहीं है कि हम वक्त के सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। विभाजन का जो समय था, उससे भयानक हमारे इतिहास में कुछ नहीं हुआ। उसके बाद भी कुछ प्रतिकूल दौर आए। जब हमें युद्ध लड़ने पड़े। अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना पड़ा। इन सबके बावजूद हमने तरक्की की तरफ कदम बढ़ाए हैं। हमारी ताकत बढ़ी है। समझ बढ़ी है। लेकिन इन सबके बीच संसद में हमारे माननीयों का व्यवहार जरूर सोचने पर मजबूर करता है।

पिछले दिनों लोकसभा और राज्यसभा में जो घटनाएं हुईं, उससे यही पता चलता है कि संसद की गरिमा कम हुई है। परंतु ऐसा भी नहीं है कि इसे सुधारा नहीं जा सकता। जरूरी यह है कि जनता आज खुद संविधान को समझे। ताकि उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया ज्यादा सुलझी हुई हो। आज इंटरनेट है, मीडिया का विस्तार हो चुका है, सूचनाओं की रफ्तार तेज है, इस कारण युवाओं की प्रतिक्रिया न केवल बहुत सशक्त, बल्कि कई बार जटिल भी होती है।

उन्हें समझना आसान नहीं होता। नई पीढ़ी के युवा खुद के और अपने परिवेश के बारे में मेरी पीढ़ी के युवाओं से कहीं ज्यादा सजग हैं। मैं इसे बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत मानता हूं। एक जमाना था, जब देश की 70 फीसदी आबादी निरक्षर थी। ऐसे में उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखना आसान था, पर आज ऐसा नहीं है। सबको अपने अधिकारों की खबर है। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि हम लोकतंत्र में रह रहे हैं।

हमें संविधान को नई समझ के साथ देखने की जरूरत है। इसका कारण इस सवाल का उत्तर पाना है कि क्या संविधान के कारण हम नाकाम हो रहे हैं या फिर हमारे कारण संविधान नाकाम हो रहा है। इस बदलाव का ही नतीजा है कि चुनाव लगातार कठिन होते जाते हैं। एक वक्त था, जब केवल कांग्रेस और एक या दो राजनीतिक पार्टियां थीं। अब उतना आसान नहीं है। नतीजा यह कि गठबंधन सरकारें अब बनती रहेंगी। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता है, क्योंकि ये गठबंधन हमारी जनसंख्या का ज्यादा सटीक प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुतों को इस विखंडन में खतरा नजर आता है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता।

हमारे इतिहास को देखें, तो उसमें कुछ विशेष कालखंड नजर आते हैं, जहां बड़े नेता की जरूरत थी और वे हुए। लेकिन कई बार उस तरह से बड़े सपनों और दूरदर्शिता की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि मुश्किलें उतनी बड़ी नहीं होतीं। इसे इस तरह भी देखें कि जब भारत आजाद हुआ था, तब हमारे सामने बड़ी समस्याएं थीं। हमें एक देश का निर्माण करना था। परंतु अब हमारे सामने यह समस्या नहीं है।

हमें देश का निर्माण नहीं करना है। आज बड़ा सवाल यह है कि आप देश को कितने अच्छे तरीके से चला सकते हैं! ऐसे में आज आपको उस तरह से बड़े लीडर की जरूरत नहीं है। आज आप अपना लीडर खुद हो सकते हैं। सिर्फ इतना समझने की जरूरत है कि हम एक लोकतंत्र में हैं। ऐसे लोकतंत्र में जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप में जितना बेहतर हो सकता था, उतना बेहतर है।


कभी जरूर लगता है कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था हमारी समस्याओं को सुलझाने में नाकाम है। लेकिन इस व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा लोगों की समस्याएं दूर हो सकती हैं, बनिस्बत ऐसी व्यवस्था के, जिसमें ज्यादातर लोग समस्याओं के ही साथ रह जाएं। तानाशाही समस्याओं का हल नहीं है। यह सच है कि लोकतंत्र में कई समस्याएं होती हैं, लेकिन उन्हें हमेशा सुलझाया जा सकता है। आप जीवन को ऐसे देखिए कि एक सरल रेखा की तरह इसमें कभी भी सब कुछ ठीक नहीं होता।

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