सत्ता के वास्ते जाति के रास्ते
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणभूमि बनता जा रहा है, जहां से वह लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करना चाहती है। यदि भाजपा एवं बसपा जैसी पार्टियों के अब तक के उम्मीदवारों के चयन पर नजर डालें, तो साफ है कि 80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश का चुनावी समर काफी दिलचस्प होने वाला है। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों के चयन का प्रमुख पैमाना अब भी जाति ही है। इसके उलट मायावती ने, जिनका मूल जनाधार दलित वोट है, सभी पार्टियों से ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। जबकि भाजपा ने, जिसमें अनिवार्य तौर पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व है, ब्राह्मणों की तुलना में पिछड़े और दलित उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट दिए। जाहिर है, दोनों पार्टियां अपने परंपरागत वोट बैंक से परे अन्य वर्गों का समर्थन भी चाहती हैं। भाजपा को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी के पिछड़े वर्ग से होने की पहचान इस बार उसके जनाधार को बढ़ाने में मदद करेगी। वाराणसी, जहां से मोदी चुनाव लड़ रहे हैं, के मुकाबले ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां जाति एवं समुदाय को इतनी तीव्रता से महत्व दिया जा रहा हो।
राष्ट्रीय स्तर पर अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिए मोदी का वाराणसी से चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है। 2009 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से पार्टी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी मात्र 17 हजार मतों से जीते थे। क्या यह भाजपा के लिए चिंता की बात है? शायद, होनी चाहिए। जहां तक जोशी का मामला है, पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा 30.5 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी स्थानीय रॉबिनहुड माने जाने वाले मुख्तार अंसारी को 28 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन वह भाजपा को डराने में कामयाब रहे थे। 18 फीसदी वोट के साथ समाजवादी पार्टी वहां तीसरे नंबर पर रही थी। सैद्धांतिक रूप से यदि वाराणसी में नंबर दो और नंबर तीन की पार्टियां मिल जातीं, तो उनका कुल वोट भाजपा के 30.5 फीसदी के मुकाबले 46 फीसदी पर जा पहुंचता! वाराणसी में मुस्लिम मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है। मुस्लिम मतदाताओं का वोट कौमी एकता दल के प्रत्याशी मुख्तार अंसारी और समाजवादी पार्टी के बीच बंट गया, इसलिए भाजपा वहां जीत पाई।
इस बार यदि मोदी के खिलाफ विरोधी पार्टियों ने मिलकर मोर्चा खोला और मुस्लिम मतों का बंटवारा नहीं हुआ, तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है। इसका दूसरा पहलू यह है कि अगर मतों का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण हुआ, तो मोदी प्रभावी तरीके से जीत सकते हैं। कौमी एकता दल ने संकेत दिया है कि मुख्तार अंसारी (जिनके बारे में कहा जाता है कि एक लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर उनके प्रभाव में हैं) मोदी को चुनौती देने की घोषणा करने वाले अरविंद केजरीवाल के पक्ष में अपना नामांकन वापस ले सकते हैं। भाजपा चाहेगी कि मुख्तार अंसारी चुनाव लड़ें, ताकि विरोध में पड़ने वाले वोट (मुख्यतः मुस्लिम वोट) बंट जाएं।
एक तरह से उत्तर प्रदेश के ज्यादातर निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी की तरह ही जाति एवं समुदाय के समीकरण का सामना करेंगे। मोदी की प्रधानमंत्री पद पर उम्मीदवारी के चलते पहले की तुलना में ज्यादा तेजी से वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश होगी और मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव भाजपा के खिलाफ चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों की तरफ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक होगा, ताकि उनका वोट खराब न हो।
भाजपा, जिसने 2009 के लोकसभा चुनाव में अस्सी में से मात्र 10 सीटों पर जीत हासिल की थी, यदि करीब 40 सीटें जीतना चाहती है (जैसा कि कुछ चुनावी सर्वेक्षणों में भविष्यवाणी की गई है), तो उसे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में जनाधार बढ़ाना होगा। इस समय उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भाजपा की मौजूदगी बहुत कम है। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद सीएसडीएस के 'लोकनीति' द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 60 ग्रामीण लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से मुश्किल से चार सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। इसका मतलब है कि भाजपा की साठ फीसदी सीटें या तो शहरी या अर्धशहरी क्षेत्रों से आती हैं।
बसपा की बीस में से 15 सीटें ग्रामीण इलाकों से हैं। समाजवादी पार्टी का भी ग्रामीण इलाकों में मजबूत जनाधार है, जहां उसने अपनी 23 में से 20 सीटें जीती हैं। भाजपा को उम्मीद है कि वह समाजवादी पार्टी के जनाधार में सेंध लगाएगी। मौजूदा गणित के अनुसार, समाजवादी पार्टी के मजबूत जनाधार वाले क्षेत्रों से अधिकतम फायदा उठाने की उम्मीद भाजपा कर रही है।
भाजपा का अनुमान है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे अच्छी सीटें मिलेंगी, क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगे के चलते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का उसे अधिकतम लाभ मिलेगा। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश का मामला बिल्कुल अलग है। सीएसडीएस का आंकड़ा बताता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में, जो सर्वाधिक सांसद लोकसभा में भेजता है, सपा और बसपा, दोनों का वोट शेयर 30 फीसदी से अधिक है, जबकि भाजपा का वोट शेयर मात्र 17.5 फीसदी। मोदी एवं उनके समर्थकों को पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसी बड़े अंतर को पाटना होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख क्षेत्र वाराणसी से मोदी के चुनाव लड़ने का कारण संभवतः यह संदेश देना है कि उनकी नजर उस बड़े वोट शेयर की तरफ है, जो अभी सपा और बसपा के पास है। एक तरह से उत्तर प्रदेश की असली लड़ाई पूर्वी इलाके में लड़ी जाएगी, वह भी ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में। और यह लड़ाई जाति एवं संप्रदाय के आधार पर ही होगी।