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सभी के लिए पुरुषार्थ जरूरी

Mon, 16 Sep 2013 06:44 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 16 Sep 2013 06:44 PM IST
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मिथिला के राजपंडित गणपति के पुत्र विद्यापति अपने पिता की तरह धर्मशास्त्रों के ज्ञाता थे। किशोरावस्था में ही उन्होंने काव्य साधना शुरू कर दी थी। उनकी कविताएं सुनकर मिथिला नरेश शिवसिंह मंत्रमुग्ध हो उठते थे। राजा प्रायः उन्हें अपने महल में आमंत्रित कर उनसे धर्म, संस्कृति और साहित्य संबंधी बातें किया करते थे।

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एक दिन राजा ने कहा, पंडितराज, आपने सभी धर्मशास्त्रों व साहित्य का गहन अध्ययन किया है। शास्त्रों में सच्चे मानव के क्या लक्षण बताए गए हैं? महाकवि विद्यापति ने बताया, सद्गुणों से युक्त व्यक्ति ही सच्चा मानव है। जो विद्यावान, विवेकी, पुरुषार्थी, संयमी और सदाचारी हो, वही सच्चा पुरुष है।
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धर्मशास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति मानव के लिए आवश्यक मानी गई है। विवेकी, बुद्धिमानी, संयमी और कर्तव्यनिष्ठ अर्थात पुरुषार्थी व्यक्ति ही इन चारों कर्तव्यों की पूर्ति करने की क्षमता रखता है। मूढ़, आलसी, असंयमी और दुराचारी तो इनमें से एक की भी प्राप्ति नहीं कर सकता। अतः धर्मशास्त्रों में इन सद्गुणों से रहित पुरुष को पूंछ रहित पशु की संज्ञा दी गई है।
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महाकवि के शब्द सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने विनयपूर्वक प्रार्थना की, पंडितराज, आप पुरुष के कर्तव्य निर्धारण करने वाले ग्रंथ की रचना करें। महाकवि विद्यापति ने मैथिली और संस्कृत में अनेक पुस्तकों की रचना कर ख्याति अर्जित की।

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