मणिपुर: शांति-संवाद की कोशिशें चलती रहें, लेकिन पहले हिंसा रुके; अब तक 200 से ज्यादा लोगों की जा चुकी जान
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विस्तार
देश के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में पिछले एक वर्ष से जारी हिंसा के बावजूद बाकी जगहों की तुलना में अब तक शांत रहे जिरीबाम जिले में हिंसा की आग थमने का नाम ही नहीं ले रही, जो वाकई चिंताजनक है। इसने पूरे क्षेत्र को एक बार फिर भय और अनिश्चितता के माहौल में तो धकेला ही है, शांति और विकास की उम्मीदों को भी झटका दिया है। पिछले हफ्ते महिलाओं और बच्चों के शवों के बराक नदी से बरामद किए जाने और सुरक्षाकर्मियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए उग्रवादियों के शवों का अंतिम संस्कार रोकने के बाद से जिले में तनाव बढ़ा हुआ है। दरअसल, कुकी-जो समुदाय के प्रतिनिधि मृतकों को ग्राम सुरक्षा दल का सदस्य बताते हुए पोस्टमार्टम रिपोर्ट की जिद पकड़े हुए हैं, इसके अलावा इंफाल घाटी में कई विधायकों व मंत्रियों के घरों पर हमलों की वजह से भी तनाव चरम पर है।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष मई में इस विवाद की शुरुआत तो मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के साथ हुई थी, जिसका कुकी और नगा समुदाय विरोध करते रहे हैं। लेकिन पिछले एक वर्ष में जिस तरह से जंगल और जमीन, अवैध प्रवासी और ड्रग्स जैसे मुद्दे उभरे हैं, उससे यही मालूम होता है कि इस गतिरोध के कई आयाम हैं, जिनका जल्द समाधान ढूंढे जाने की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह बेहद गंभीर स्थिति है, क्योंकि नहीं भूलना चाहिए कि बांग्लादेश में हसीना सरकार के पतन के बाद वर्तमान परिस्थितियों में कुकी अलगाववादियों का हौसला बढ़ा है और अब वे म्यांमार की स्थितियों का फायदा उठाकर अपने पृथकतावादी एजेंडे पर काम करके सीमा पर मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।
मणिपुर के हालात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष मई से अब तक दो सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और साठ हजार से भी अधिक लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। नेशनल पीपुल्स पार्टी द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बावजूद राज्य की बहुमत वाली भाजपा सरकार पर बेशक असर न पड़े, लेकिन यह देखते हुए कि पूर्वोत्तर भारत में जातीय संबंध बहुत जटिल हैं और, एक बार हिंसा भड़क जाने पर उसका लंबा दौर चल सकता है, चुनौतियां अभी बाकी हैं। दरअसल, मणिपुर में समुदायों के समायोजन व सह-अस्तित्व के राजनीतिक प्रबंधन के जरिये हिंसा को दीर्घकालिक रूप से खत्म करने के प्रयास जरूरी हैं, लेकिन वर्तमान स्थितियों में सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि किसी भी तरह इस हिंसा को तत्काल रोका जाए।