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समाज और शोध से जुड़े शिक्षा : पिछली शिक्षा नीति लगभग तीन दशक पहले आई थी

Wed, 31 Jul 2019 03:49 AM IST
Raman Singh सृजन पाल सिंह
सृजन पाल सिंह Published by: Raman Singh Updated Wed, 31 Jul 2019 03:49 AM IST
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Education must relate to society and research
सांकेतिक तस्वीर

मई 2019 में नई सरकार का गठन होते ही नई शिक्षा नीति का मसौदा पेश किया गया था। पिछली शिक्षा नीति लगभग तीन दशक पहले आई थी। इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की काफी आवश्यकता है। इसी वर्ष प्रकाशित टाइम्स ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में हमारे देश का भारतीय विज्ञान संस्थान भी शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों की सूची में अपना स्थान नहीं बना सका। भारतीय संस्थानों की सबसे कमजोर कड़ी 'अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण' रहा। यानी भारतीय शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय धारा से जोड़ने की आवश्यकता है।


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मई 2019 में नई सरकार का गठन होते ही नई शिक्षा नीति का मसौदा पेश किया गया था। पिछली शिक्षा नीति लगभग तीन दशक पहले आई थी। इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की काफी आवश्यकता है। इसी वर्ष प्रकाशित टाइम्स ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग में हमारे देश का भारतीय विज्ञान संस्थान भी शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों की सूची में अपना स्थान नहीं बना सका। भारतीय संस्थानों की सबसे कमजोर कड़ी 'अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण' रहा। यानी भारतीय शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय धारा से जोड़ने की आवश्यकता है।

नई शिक्षा नीति-2019 के मसौदे में निम्न स्तर के सभी कॉलेजों को बंद करने और अच्छे कॉलेजों को विश्वविद्यालयों का दर्जा देने पर जोर दिया गया है। इसका नतीजा यह होगा कि कई छोटे कॉलेज, खासकर छोटे शहरों के बंद हो जाएंगे और उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या घट जाएगी। बेशक शिक्षा में सुधार के लिए यह आवश्यक होगा, पर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को भी उच्च शिक्षा के अवसर मिलते रहें।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाते हुए तीन प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है शिक्षकों की गुणवत्ता। अधिकतर कॉलेज में शिक्षकों का मनोबल और उनके प्रशिक्षण में कमी है। निजी कॉलेजों में शिक्षकों का आकलन उनकी अध्यापन क्षमता की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि वे कितने छात्रों का दाखिला करवा पाते हैं, इससे किया जाता है।

शिक्षा प्रणाली की औद्योगिक जरूरतों से दूरी एक चिंताजनक विषय है। एक सर्वे के मुताबिक, देश के 82 फीसदी इंजीनियर डिग्री पाने के बाद तकनीकी व्यवसाय के योग्य नहीं होते। विश्व के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों में उद्योग के विशेषज्ञों को अल्प अवधि के लिए शिक्षक बनने का अवसर दिया जाता है, जिससे उद्योग जगत का नवीनतम ज्ञान युवाओं तक पहुंचता है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था करने की जरूरत है।

दूसरा पहलू है शिक्षा को समाज निर्माण से जोड़ने का। नई शिक्षा नीति के मसौदे में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन बनाने की बात कही गई है, जो शोध के लिए विभिन्न संस्थानों को अनुदान देगा। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि शोध स्थानीय समस्याओं और चुनौतियों का समाधान करने में कारगर हो। शोध की गुणवत्ता परखने का पैमाना पेटेंट है।

वर्ष 2017 में भारत में 46,000 पेटेंट के लिए आवेदन किया गया, जिसमें से मात्र 14,000 भारतीय लोगों या संस्थाओं के थे, बाकी अन्य देशों के। इसी अवधि में चीन में 12.5 लाख पेटेंटों का आवेदन हुआ, जिनमें से 11 लाख से अधिक खुद चीनियों के थे। इसलिए शोध में ज्यादा निवेश के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि पेटेंट/आईपीआर कैसे बढ़ाया जाए। इससे शोध संस्थानों की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने में मदद मिलेगी।

कुछ वर्ष पूर्व मैंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के साथ कार्य करते हुए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग विभाग में कुछ दिन गुजारे। वहां कई विख्यात प्रोफेसरों ने हमें अपनी प्रयोगशालाएं दिखाईं। वहां हर प्रयोगशाला में दो-तीन प्रमुख प्रोजेक्ट चल रहे थे। हर प्रोजेक्ट पर आठ-दस छात्रों की टीम लगी थी, जिसमें सिर्फ विज्ञान या तकनीक के नहीं, बल्कि कला और समाज विज्ञान के छात्र भी हिस्सा ले रहे थे।

उन प्रोफेसरों का मानना था कि किसी भी परियोजना को तकनीकी रूप से सटीक होने के साथ उसे सामाजिक परिदृश्य में सुचारू रूप से ढालना भी आवश्यक है। ऐसी ही शिक्षा और शोध प्रणाली की भारत को आवश्यकता है।

-लेखक एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर के सीईओ हैं। 
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