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आर्थिकी: जीएसटी से आगे सोचना होगा, अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता से निकालने के लिए ऐसा करना जरूरी

Sun, 28 Sep 2025 07:37 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 28 Sep 2025 07:37 AM IST
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सार
जीएसटी दरों में कटौती तो बस मूल भूल की सुधारात्मक कार्रवाई है, इससे अधिक कुछ नहीं। अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के समाधान के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है।
 
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Economy: We need to think beyond GST; this is essential to remove economy from uncertainty
जीएसटी सुधार - फोटो : Amar Ujala Print

विस्तार

हर महीने मैं जिस लेख का बेसब्री से इंतजार करता हूं, वह है 'स्टेट ऑफ द इकोनॉमी', जो आरबीआई के मासिक बुलेटिन में प्रकाशित होता है। इसकी शुरुआत में दिया गया अस्वीकरण मुझे हमेशा मनोरंजक लगता है। उसमें लिखा होता है - “डॉ. पूनम गुप्ता, डिप्टी गवर्नर की टिप्पणियों और मार्गदर्शन के लिए आभार... इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं, न कि भारतीय रिजर्व बैंक के।” यह कोई राज नहीं है कि आरबीआई से कोई भी शब्द गवर्नर की स्वीकृति के बिना बाहर नहीं जा सकता। यहां तक कि किसी डिप्टी गवर्नर द्वारा लिखे गए शैक्षणिक लेख या भाषण को भी गवर्नर की मंजूरी चाहिए।



अनिश्चितता और लचीलापन
कोई भी इस अस्वीकरण को गंभीरता से नहीं लेता है और यह लेख व्यापक रूप से पढ़ा और उद्धृत किया जाता है। इस लेख में एक शब्द बार-बार आता है- 'अनिश्चितता'। सरकार और आरबीआई द्वारा किए गए विभिन्न कदमों के बावजूद मुद्रास्फीति, कीमत, रोजगार, वेतन, निवेश, आय, कर और विदेशी व्यापार पर अनिश्चितता बनी रहती है। यह अनिश्चितता गैर-आर्थिक क्षेत्रों तक भी फैलती है, जैसे सार्वजनिक परीक्षाएं, मतदाता सूची और चुनाव, कानून और उनका क्रियान्वयन, विदेश नीति, पड़ोसी देशों की नीति आदि। सही मायनों में अनिश्चितता ही देश की मौजूदा स्थिति को परिभाषित करती है।

अनिश्चित आर्थिक हालात के मद्देनजर आरबीआई का जवाब होता है कि अर्थव्यवस्था लचीली है। सरकार की तरह ही आरबीआई भी तिनकों का सहारा ले रहा है। नवीनतम सहारा है जीएसटी दरों में कटौती। आरबीआई ने इन कटौतियों को 'ऐतिहासिक जीएसटी सुधार' कहा है। लेकिन दरअसल, ऊंची और बहुस्तरीय कर दरों की जो मूल भूल थी, उसे कम करना कैसे सुधार कहलाया? जीएसटी कानूनों का डिजाइन गलत था, कर संरचना गलत थी, नियम-कायदे गलत थे, कर दरें गलत थीं और जीएसटी कानूनों का क्रियान्वयन गलत था। त्रुटिपूर्ण कर दरों को सुधारना मेरे हिसाब से कोई क्रांतिकारी सुधार नहीं है।

अति-उत्साह का प्रदर्शन
फिर भी जीएसटी दरों में कटौती को लेकर ज्यादा उत्साह से बात हो रही है। जीएसटी दरों में कटौती से लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये उपभोक्ताओं के हाथ में आने की उम्मीद है। 2025-26 में नाम मात्र जीडीपी   3,57,00,000 करोड़ रुपये होने के आलोक में यह ‘अतिरिक्त’ राशि 0.56 प्रतिशत है। भारत की वार्षिक रिटेल मार्केट का अनुमान 82,00,000 करोड़ रुपये है और यह ‘अतिरिक्त’ राशि 2.4 प्रतिशत होगी, जबकि अतिरिक्त रिटेल व्यय उपभोग को बढ़ाएगा। इसका अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को बहुत अधिक यानी अतिरंजित कर बताया जा रहा है।

एक बात यह भी है कि पूरे 2,00,000 करोड़ रुपये का हिस्सा उपभोग में नहीं जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, घरेलू कर्ज जीडीपी का 40 प्रतिशत पहुंच चुका है और घरेलू बचत जीडीपी का 18.1 प्रतिशत रह गई है। इसलिए लोगों के हाथों में जीएसटी के जो 'पैसे' आएंगे, उनका कुछ हिस्सा कर्ज चुकाने में जाएगा और कुछ हिस्सा बचत बढ़ाने में जाएगा। मैं सहमत हूं कि इससे उपभोग व्यय में बढ़ोतरी होगी, लेकिन क्या इस उपभोग व्यय से उत्पादन और निवेश के चक्र को महत्वपूर्ण गति मिलेगी? इस प्रश्न पर सिवाय सरकारी-आर्थिक विशेषज्ञों के अन्य सभी ने अपने विचार सुरक्षित रखे हैं।

वित्त मंत्रालय और आरबीआई एक ही 'स्तुति-पुस्तक' से पढ़ रहे हैं। 19 जून, 2025 को वित्त मंत्रालय की परामर्श समिति के सामने प्रस्तुत एक पेपर में पहले के तीन पृष्ठों के शीर्षक निम्नलिखित हैं-

  • ग्लोबल अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का स्तर बहुत ऊंचा है।
  • विश्व व्यापार और निवेश बहुत धीमे हो गए हैं।
  • इस पृष्ठभूमि में भारत का आर्थिक प्रदर्शन मजबूत रहा है।

अज्ञात कारणों से मुख्य आर्थिक सलाहकार कठोर सुधारों को आगे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं या फिर सक्षम नहीं हैं। कठोर सुधार प्रधानमंत्री की 'जीवन को आसान बनाने' और 'व्यापार करने में आसानी' की अपील से कहीं आगे जाते हैं।

खुलापन और प्रतिस्पर्धा
भारत को एक खुली और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनना चाहिए। हमारा अनुभव रहा है कि जब एक दरवाजा खुलता है तो कोई खिड़की बंद हो जाती है। एक ‘खुली’ अर्थव्यवस्था को दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के लिए खुला होना चाहिए। प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनने के लिए हमें द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को अपनाना होगा। एक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था सब कुछ नहीं बना सकती, जैसे चिप्स से जहाज तक यानी सभी कुछ, और इसलिए हमें केवल वही सामान (माल और सेवाएं) बनाना चाहिए, जो हम प्रतिस्पर्धात्मक तरीके से बना सकते हैं।

हम शुरुआत दक्षिण एशिया और आसियान से कर सकते हैं। सार्क दुनिया के सबसे कम एकीकृत व्यापारिक ब्लॉकों में से एक है। सार्क देशों के बीच बाहरी व्यापार उनके कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केवल 5-7 प्रतिशत है। भारत का सार्क देशों के साथ बाहरी व्यापार 8 प्रतिशत से भी कम है। आसियान देशों के साथ यह लगभग 11 प्रतिशत है।
एक और कठोर सुधार है विनियमन में कमी। सभी को नियम और विनियम बनाना बहुत पसंद है, चाहे वह कानून प्रवर्तन हो या कर प्रशासन। मंत्रियों को विधेयकों के बारे में तो जानकारी दी जाती है, लेकिन नियमों, विनियमों, प्रपत्रों, अधिसूचनाओं, दिशा-निर्देशों आदि के बारे में अंधेरे में रखा जाता है। यही कारण है कि एक बिल्कुल अच्छा विचार, जैसे जीएसटी 'गब्बर सिंह टैक्स' बन गया।

1991-96 में देश में आई पहली विनियमन-उन्मूलन की लहर के बाद से नियंत्रण और विनियम धीरे-धीरे फिर से लौट आए हैं और हर दिन नए नियम-कायदे बनाए जा रहे हैं। यदि सरकार एक सक्षम प्राधिकरण नियुक्त करे, जिसे सभी अतिरिक्त नियम-कायदों की झाड़ियों को काटने का अधिकार हो तो यह एक बड़ा सुधार होगा। एक ही बड़े कदम में सरकार प्रधानमंत्री की 'जीवन को आसान बनाने' और 'व्यापार करने में आसानी' की मंशा को काफी हद तक पूरा कर देगी। मैं तो कहूंगा कि इससे विकास दर भी बढ़ेगी। जीएसटी दरों में कटौती तो बस मूल भूल की सुधारात्मक कार्रवाई है, इससे अधिक कुछ नहीं। यह अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का समाधान भी नहीं है।

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