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आर्थिक स्थिति उतनी भी बुरी नहीं
नई दिल्ली
Updated Fri, 30 Aug 2013 08:38 PM IST
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खाद्य सुरक्षा विधेयक के लोकसभा से पारित होने के साथ ही उद्योग और बाजार जगत के रुख ने देश की सियासत में हलचल मचा दी है। यूपीए सरकार के इस कदम को चुनावी लाभ के लिए देश की अर्थव्यवस्था को दांव पर लगाने वाला कदम भी बताया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर मची इस जबर्दस्त हलचल पर केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रो. के.वी.थॉमस से विजय गुप्ता ने बातचीत की।
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खाद्य सुरक्षा विधेयक को बाजार पचा नहीं पा रहा। लोकसभा से मंजूरी मिलने के दूसरे ही दिन रुपये और शेयर बाजार ने जबर्दस्त गोता लगाया। इसे क्या समझा जाए?
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बाजार के उतार-चढ़ाव का खाद्य सुरक्षा विधेयक से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत की गई साजिश है। इसके पीछे एक खास वर्ग का हाथ है, जो नहीं चाहता कि गरीबों को भोजन दिया जाए। रुपये का पहले से ही अवमूल्यन हो रहा है। शेयर बाजार में भी लंबे समय से उतार-चढ़ाव चल रहा है। यह सब वैश्विक कारणों से है। इस विधेयक के लोकसभा से मंजूरी के दूसरे दिन ही इतनी बड़ी गिरावट आना सोची-समझी साजिश लगती है।
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बढ़ते बजट घाटे के बीच सरकार खाद्य सुरक्षा की सब्सिडी का बोझ कैसे उठाएगी?
सब्सिडी का हौवा खड़ा किया जा रहा है। सरकार मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सालाना लगभग 90,000 करोड़ रुपये पहले से ही खर्च कर रही है। खाद्य सुरक्षा के लिए बजट थोड़ा और बढ़ जाएगा। लेकिन इससे दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिल सकेगा, जो अभी सिर्फ कुल आबादी के दस फीसदी को ही लाभ मिल रहा है। रही बात सब्सिडी बोझ की, तो वह एक दिन में नहीं बढ़ेगा। पैसे का इंतजाम करना सरकार का काम है।
क्या यह समय सवा लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी वाले खाद्य सुरक्षा विधेयक को लाने के लिए उपयुक्त है?
अर्थव्यवस्था की स्थिति इतनी भी खराब नहीं, जितना बताया जा रहा है। बाजार में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। चूंकि हम वैश्विक अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े हैं, इसलिए उसका असर पड़ना तय है। पर इसका यह मतलब नहीं कि अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई, इसलिए सरकार सामाजिक कार्य बंद कर दें। खाद्य सुरक्षा कानून की सोच एक दिन में नहीं बनी है। सरकार पिछले दो वर्षो से इस पर काम कर रही है। पिछले दो बजट में इसके लिए प्रावधान भी किए गए हैं।
पहले खस्ताहाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने की जरूरत थी। तब शायद नए कानून की जरूरत न पड़ती?
नहीं, ऐसा नहीं है। पुराना सिस्टम खराब हो गया है, इसीलिए सरकार नई व्यवस्था के तहत अब लोगों को भोजन का अधिकार देने जा रही है। इसके पहले सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना और काम का अधिकार दे चुकी है।
पिछले दो वर्षों से अनाज उत्पादन बढ़ रहा है। लेकिन फसल चक्र एक जैसा नहीं रहता। ऐसे में उत्पादन घटा, तो सरकार कहां से अनाज लाएगी?
खाद्य सुरक्षा कानून में सरकार ने इसका प्रावधान किया है। यदि सरकार लोगों को अनाज नहीं दे पाती, तो वह उसके बदले कीमत देगी, ताकि लोग खरीदकर अपनी भूख मिटा सकें। लोगों को इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं कि अनाज कहां से आएगा। देश के किसानों की मेहनत से हर साल इतना अनाज पैदा हो रहा है कि सभी का पेट भरा जा सके।
सरकार के एक अहम सहयोगी दल की आशंका है कि इस कानून की वजह से तीन वर्षों तक फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ेंगे, क्या यह सही है?
खाद्य सुरक्षा कानून में तो इसका जिक्र नहीं है। विधेयक में गरीबों को दिए जाने वाले अनाज के दामों को तीन वर्ष तक फिक्स किए जाने का प्रावधान किया गया है।