नाजुक मोड़ पर अर्थव्यवस्था
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देश की राजनीतिक स्थिति आज जितनी डावांडोल है, उससे भी ज्यादा खराब स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था पहुंच चुकी है। देश की आर्थिक विकास दर लगातार गिर रही है। गिरती विकास दर ने केंद्र और राज्य सरकारों के खजाने को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। विकास दर में गिरावट का मतलब होता है कम कर राजस्व वसूली, जिस कारण राजकोष का घाटा बढ़ने लगता है। घाटे पर अंकुश लगाने के लिए सरकार पर अपना खर्च कम करने का दबाव पड़ता है और खर्च कम करने के चक्कर में विकास की योजनाएं प्रभावित हो जाती हैं, जिस कारण भविष्य में भी विकास दर बढ़ने की संभावना धुंधली हो जाती है। हमारी अर्थव्यवस्था आज इसी दुश्चक्र में फंस गई है।
गौरतलब है कि दुनिया में चल रही आर्थिक मंदी के बावजूद यूपीए के पहले कार्यकाल में भारत की विकास दर अच्छी थी। दुनिया को आर्थिक मंदी से निकालने में भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था का भी योगदान रहा था। पर मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में विकास दर में गिरावट शुरू हो गई। एक समय हम 10 फीसदी विकास दर हासिल करने का सपना देख रहे थे, पर आज यह पांच फीसदी तक आ चुकी है। भविष्य में क्या होगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतना कह सकते हैं कि आने वाली सरकार के लिए स्थिति को संभालना बहुत ही मुश्किल होगा।
यूपीए का दूसरा कार्यकाल अर्थव्यवस्था के लिए अभिशाप बनकर क्यों आया? इसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं है। इसके पहले कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार के अनेक मामले दूसरे कार्यकाल के दौरान खुलकर सामने आए। उस कारण देश का राजनीतिक तापमान इतना बढ़ा कि उसने केंद्र सरकार की निर्णय करने की शक्ति को ही लकवा मार दिया। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार न तो राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर सकी और न ही देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली अपनी पूर्व नियोजित नीतियों को आगे बढ़ा पाई। अल्पमत सरकार को अपनी सीमाओं को समझकर ही अपनी आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए आगे आना चाहिए था, पर उसने इस पक्ष की अनदेखी कर दी। भ्रष्टाचार और काले धन की अर्थव्यवस्था के प्रभाव के कारण वैसे भी किसी भी सरकार के लिए अर्थव्यवस्था के प्रबंधन का काम मुश्किल हो जाता है।
काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था के कारण जहां सरकार की नीतियां विफल होने लगती हैं, वहीं भ्रष्टाचार भारतीय अर्थव्यवस्था को एक उच्च लागत की अर्थव्यवस्था बना चुका है। भ्रष्टाचार के कारण उत्पादन लागत ज्यादा होगी, तो बाजार में कीमत भी बढ़ जाएगी। महंगाई पर लगाम नहीं लग पाने का एक बड़ा कारण यह भ्रष्टाचार भी रहा है। अर्थशास्त्र के छात्रों को बताया जाता है कि मांग बढ़ने और आपूर्ति घटने के कारण महंगाई बढ़ती है, लेकिन अपने यहां बढ़ती मूल्यवृद्धि के पीछे इनका हाथ उतना नहीं है, जितना भ्रष्टाचार का है, जिसके कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है। जब तेल और गैस क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार हो और उसकी अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी बढ़ती जाएं, तो फिर महंगाई पर नियंत्रण कैसे हो सकता है?
सब्सिडी की व्यवस्था से उनकी कीमतों पर नियंत्रण रखने की भी सीमा है। इसके कारण केंद्र सरकार का खजाना ही खाली होने लगता है। जब कम विकास दर के कारण राजस्व की वसूली कम हो रही हो, तब सब्सिडी भी कम करनी पड़ती है और इसके कम करने से महंगाई की नई तरंगें पैदा होती हैं। भारत में यह सब कुछ हुआ है और सरकार चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाई है।
यूपीए सरकार आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर भटकाव का भी शिकार हो गई है। हम भारत को एक मिश्रित अर्थव्यवस्था मानते हैं, जिसमें बाजार भी है और सरकार का हस्तक्षेप भी। हमारे प्रधानमंत्री सरकार को खुला खेल खेलने देना चाहते हैं। उसमें सरकारी दखल वह कम करना चाहते हैं। अपनी जगह यह नीति सही हो सकती है, पर दूसरी तरफ सरकार का रिमोट अपने हाथ में रखने वाली सोनिया गांधी केंद्र के हस्तक्षेप से उन लोगों को राहत पहुंचाना चाहती हैं, जो बाजार के खुले खेल का शिकार हो रहे हैं। उनके दबाव में ही मनरेगा जैसी योजना चल रही है और खाद्य सुरक्षा कानून बना है। लेकिन सरकार योजनाओं की सफलता हमारी नौकरशाही की क्षमता पर निर्भर करती है और हमारी नौकरशाही अपनी अक्षमता और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात है। इसलिए उन पर आश्रित योजनाओं का बुरा हश्र होना तय है। लेकिन इस क्रम में देश के खजाने की भारी पैमाने पर लूट होती है और लोगों को फायदा पहुंचाने का लक्ष्य अधूरा रह जाता है।
यानी एक तरफ तो बाजार के कारण लोगों का एक वर्ग, जिनके पास क्रयशक्ति का अभाव है, मारे जा रहे हैं और दूसरी तरफ सरकारी भ्रष्टाचार के कारण उन पर खर्च की जा रही राशि की लूट हो रही है। आज एक आम आदमी बाजार और सरकार, दोनों की लूट की शिकार है।
सोनिया गांधी का कथित समाजवाद मनमोहन सिंह के कथित बाजारवाद की विफलताओं की कहानी को और भी गमगीन बना रहा है। इसके चक्कर में देश का आर्थिक प्रबंधन बहुत कमजोर हो गया है। आर्थिक नीतियां भी दिशाहीन होती दिखाई दे रही है। कुछ काम मनमोहन सिंह अपने बाजारवादी दर्शन को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं, तो कुछ काम वह सोनिया गांधी के समाजवाद को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। ऐसा करते करते वह न तो बाजारवादी रह जाते हैं और न समाजवादी बन पाते हैं। इसके कारण आज हमारे देश में एक अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है, जिसका निदान करना लोकसभा चुनाव के बाद बनी सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।