फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Economy: How foreign exchange reserves are growing

अर्थव्यवस्था को गति: कैसे बढ़ रहा है विदेशी मुद्रा भंडार

Sat, 24 Jul 2021 06:31 AM IST
Ashwani Mahajan अश्विनी महाजन
Updated Sat, 24 Jul 2021 06:31 AM IST
विज्ञापन
Economy: How foreign exchange reserves are growing
भारतीय अर्थव्यवस्था - फोटो : pixabay

नीति निर्माता हों अथवा गुलाबी (आर्थिक) समाचार पत्र या विदेशी निवेश समर्थक अर्थशास्त्री, सभी भारत में बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार से अभिभूत हैं। इस बाबत, सरकार अपनी पीठ थपथपाती दिखती है कि देश में निवेश वातावरण बेहतर हुआ है। गुलाबी समाचार पत्र बढ़ते विदेशी निवेशों के कारण उफनते विदेशी मुद्रा भंडार को अर्थव्यवस्था की उत्तम स्थिति का बैरोमीटर मानते दिखाई देते हैं। हालांकि पिछले तीन दशकों से लगातार हमारा विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता रहा है, लेकिन पिछले 18 माह में यह वृद्धि पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई है। तीन जनवरी, 2020 में 431 अरब डॉलर से बढ़ते हुए तीन जुलाई, 2021 तक विदेशी मुद्रा भंडार 611 अरब डॉलर तक पहुंच गया। तीन दशक पहले 1991 में भारत ने एक ऐसी स्थिति का सामना किया था, जब हमारे पास मात्र सात दिनों के आयातों के भुगतान के लिए भी पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी। वहीं आज स्थिति यह है कि हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 15 महीने के आयातों के भुगतान के लिए भी सक्षम है।


loader

देश में बढ़ता विदेशी मुद्रा भंडार एक संतुष्टि का भाव अवश्य देता है और यह सही भी है कि यदि देश में विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त मात्रा में न हो, तो विदेशी ऋणों के ब्याज और मूल के पुनर्भुगतान में कोताही का खतरा बना रहता है। वर्ष 1991 में हमने इस खतरे को महसूस भी किया था, जब हमें बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास अपना सोना गिरवी रखने की नौबत भी आ गई थी। उसी इतिहास का हवाला देते हुए कुछ अर्थशास्त्री वर्तमान में बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार को मंगलकारी मानते हैं। उनका कहना है कि विदेशी मुद्रा भंडार, देश के लिए एक बीमा का काम करते हैं, ताकि कभी ऐसी स्थिति न आने पाए कि देश को किसी के सामने हाथ पसारने की नौबत आए। वे चीन के विदेशी मुद्रा भंडारों के साथ भी भारत की तुलना भी करते हैं। गौरतलब है कि चीन का विदेशी मुद्रा भंडार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से पांच गुणा ज्यादा है। हमें यह समझना होगा कि चीन का विदेशी मुद्रा भंडार अधिकांशतः वस्तुओं और सेवाओं के भारी निर्यात और अत्यंत कम आयात और उसके कारण भुगतान शेष में अतिरेक के कारण बढ़ा है। कुछ हद तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी इसके लिए जिम्मेदार है।

वहीं भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि मुख्यतः प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश के कारण है, क्योंकि सामान्यतः हमारा भुगतान शेष तो भारी घाटे में ही रहता है। ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार की मात्रा से ज्यादा हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इसके बढ़ने के स्रोत क्या हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि इन स्रोतों से प्राप्त विदेशी मुद्रा के दूरगामी परिणाम क्या होंगे? अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात पर मतैक्य है कि विदेशी मुद्रा के स्रोत के नाते सबसे बेहतर विकल्प भुगतान शेष का अतिरेक है। यदि हमारे निर्यात आयातों से ज्यादा हों, तो इस प्रकार से अर्जित विदेशी मुद्रा सबसे बेहतर विकल्प है। ऐसा चीन में भी हुआ है। लेकिन यदि यह विदेशी मुद्रा उधार लेकर प्राप्त की गई हो, तो वह सबसे निष्कृष्ट विकल्प है।

लेकिन यदि विदेशी मुद्रा शेयर बाजारों में निवेश के माध्यम से प्राप्त हुई हो, तो उसके भी कई दुष्परिणाम होते हैं। सबसे पहला दुष्परिणाम तो यह है कि इससे शेयर बाजारों में ही नहीं, विनिमय दर में भी उथल-पुथल होती है। इसका परिणाम देश के लिए अमंगलकारी होता है। इसका दूसरा दुष्परिणाम यह है कि विदेशी मुद्रा की इस आवक की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि ये निवेशक भारी मात्रा में लाभ अर्जित कर अपने देशों में ले जाते हैं और साथ ही साथ उनकी परिसंपत्तियों का मूल्य बढ़ता जाता है। 

गौरतलब है कि जहां विदेशी संस्थागत निवेशकों ने कुल 281 अरब डॉलर का भारत में निवेश किया है, 31 मार्च 2021 तक उनकी परिसंपत्तियों का कुल मूल्यांकन 607 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इसके अलावा वे 64.28 अरब डॉलर के डिविडेंड (लाभांश) भी कमा चुके हैं। वे 607 अरब डॉलर के अपने शेयर और बांड किसी भी क्षण बेचकर वापस जा सकते हैं और हमारा सारा विदेशी मुद्रा भंडार क्षण भर में उड़नछू हो सकता है। इसीलिए पोर्टफोलियो निवेश को ‘हॉट मनी’ भी कहा जाता है। 

हालांकि विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने में विदेशी निवेश, निजी कंपनियों द्वारा लिए गए विदेशी कर्ज और भारतीयों द्वारा स्वदेश भेजी गई राशियां, सभी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन स्रोतों में सभी का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। जहां भारतीयों द्वारा भेजी गई राशियों में बहुत कम ऐसी राशियां होती हैं, जिनकी आय का बर्हिगमन होता है, ये सभी राशियां सदैव के लिए भारत में ही रहती हैं। लेकिन विदेशी निवेशक, चाहे वे प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक हों अथवा पोर्टफोलियो निवेशक, सभी भारी मात्रा में पैसा बाहर ले जाते हैं। पिछले दस वर्षों (2010-11 से 2019-20) का अगर लेखा-जोखा देखें, तो ये विदेशी निवेशक 390 अरब डॉलर वापस अपने देशों में ले जा चुके हैं, और यह राशि हर साल बढ़ती जा रही है। 

आज जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार काफी हद तक बढ़ चुका है, तो निश्चित रूप से हमें विचार करना होगा कि देश को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। इतिहास गवाह है कि जब-जब इन विदेशी निवेशकों पर कर लगाने के प्रयास हुए हैं, इन्होंने सरकार और देश को ‘ब्लैकमेल’ कर इन प्रयासों को धक्का पहुंचाया है। विदेशी निवेशकों पर एक ‘लॉक इन पीरियड’ का प्रावधान रखा जा सकता है। साथ ही साथ यदि ये अपना धन वापिस ले जाना चाहें, तो उन पर कर लगाने का भी प्रावधान भी रखा जा सकता है। टोबिन नाम के अर्थशास्त्री ने इस कर का सुझाव दिया था, इसलिए इसे टोबिन टैक्स भी कहा जाता है। आज चूंकि हमारा विदेशी मुद्रा भंडार सुविधापूर्ण स्थिति में है, यह सही समय है कि इन उपायों का उपयोग कर विदेशी संस्थागत निवेशकों को अनुशासित किया जाए। 

-लेखक स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed