{"_id":"67f5c2b4e3159aa73c0504d5","slug":"economy-are-the-golden-days-of-german-cars-over-with-changing-preferences-china-has-also-created-a-crisis-2025-04-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"आर्थिकी : क्या जर्मन कारों के सुनहरे दिन लद गए, बदलती पसंद के साथ चीन ने भी खड़ा किया संकट","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
आर्थिकी : क्या जर्मन कारों के सुनहरे दिन लद गए, बदलती पसंद के साथ चीन ने भी खड़ा किया संकट
Wed, 09 Apr 2025 07:06 AM IST
शिव शुक्ला
पिएट्रो मिशेली
पिएट्रो मिशेली
Published by: शिव शुक्ला
Updated Wed, 09 Apr 2025 07:06 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो :
freepik.com
विस्तार
कार उद्योग टैरिफ, बिक्री में गिरावट, इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की कम मांग और श्रमिकों की हड़ताल के चलते अक्सर सुर्खियों में रहता है। वैसे तो इस उद्योग का संकट सभी वैश्विक ब्रांडों को प्रभावित करता है, लेकिन जर्मन कंपनियों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा है। वोक्सवैगन उत्पादन घटा रही है, मर्सिडीज-बेंज ने लागत में कटौती की घोषणा की है और पिछले एक साल में बीएमडब्ल्यू के मूल्य में काफी गिरावट आई है।
जर्मन कार निर्माताओं की परेशानियों के कई कारण हैं। इनमें विनियमन में बदलाव, नए प्रतिस्पर्धियों का उदय, ऊर्जा की ऊंची कीमतें, बाजार और आपूर्ति शृंखला, दोनों में कोविड व्यवधान और माइक्रोचिप की कमी से पैदा हुई बाधाएं शामिल हैं। हालांकि चीन कई यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी निर्माताओं के लिए एक तेजी से बढ़ता बाजार था, लेकिन हाल के वर्षों में यह एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बन गया है, क्योंकि इसके घरेलू ब्रांड स्थानीय और वैश्विक स्तर पर बाजार पर कब्जा कर रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में ही चीन में जर्मन ब्रांडों की बाजार हिस्सेदारी 25 फीसदी से घटकर 15 फीसदी रह गई है। यह सब न केवल जर्मनी की अर्थव्यवस्था को, बल्कि देश की पहचान को आकार देने में ऑटोमोटिव उद्योग की भूमिका को देखते हुए इसके राष्ट्रीय गौरव को भी नुकसान पहुंचाता है। ये परेशानियां उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं से उपजी हैं।
शोध के दौरान मुझे लगा कि कार निर्माताओं ने उपयोगकर्ताओं की जरूरतों और व्यवहार में हुए महत्वपूर्ण बदलावों को कम करके आंका है। वोक्सवैगन बीटल और पोर्श 911 जैसे प्रतिष्ठित जर्मन मॉडलों ने ऑटोमोबाइल को 20वीं सदी के सबसे परिभाषित उपभोक्ता उत्पादों में से एक बनाने में योगदान दिया। उनकी सफलता का मूल आधार यह था कि वे गति, शक्ति और स्वतंत्रता का वादा करती थीं। उनके ग्राहक महंगे, लेकिन शानदार इंजीनियरिंग का उत्पाद खरीदने के इच्छुक हैं। हालांकि कारें अब भी कुछ उपभोक्ताओं के लिए इच्छा और ब्रांड पहचान की वस्तु हैं, पर कई खरीदारों की पसंद बदल रही है। गति या शक्ति के बजाय, वे इसमें ज्यादा रुचि रखते हैं कि कार ड्राइविंग अनुभव के अलावा और क्या दे सकती है-यानी डिजिटल इंटरफेस और साउंड सिस्टम जैसी सुविधाएं और पिछली सीट पर बच्चों के मनोरंजन की चीजें। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये डिजिटल सुविधाएं विशेषज्ञ फर्मों द्वारा विकसित की जाती हैं और कार निर्माता शायद ही कभी खुद ऐसा करते हैं। इसके अलावा, समग्र रूप से मोटर वाहन उद्योग एक नए प्रतिमान की ओर बढ़ रहा है, जहां वाहन तेजी से स्वायत्त होंगे और जहां हाइब्रिड और ईवी का बोलबाला होगा।
20वीं सदी में कई महत्वपूर्ण आविष्कार जर्मन कंपनियों द्वारा किए गए। मसलन, मर्सिडीज-बेंज 260 डी, डीजल इंजन वाली पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित यात्री कार थी। लेकिन भविष्य नवोन्मेषी चुनौती देने वालों का है। इनमें चीनी कंपनी बीवाईडी शामिल है, जो 2024 में टेस्ला को पछाड़कर सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता बन गई है, साथ ही कैलिफोर्निया स्थित वेमो (गूगल की पूर्व सेल्फ-ड्राइविंग कार परियोजना) जैसी प्रौद्योगिकी कंपनियों के उद्यम भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी सफल रोबोटैक्सिस के साथ काम किया है। बेशक जर्मन कार कंपनियां अब भी प्रतिस्पर्धी हैं, नवाचार के प्रति उनका दृष्टिकोण मुख्य रूप से ग्राहकों को क्रमिक रूप से बेहतर उत्पाद की ओर प्रेरित करना रहा है। ऐसा करते हुए वे अनिवार्य रूप से उन्हें वही उत्पाद प्रदान कर रहे हैं। यह रणनीति स्थिर बाजारों में प्रभावी हो सकती है, लेकिन यह गतिशील बाजारों में कम सफल साबित हो रही है, जहां उपयोगकर्ता अनुभव को केंद्र में होना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि उत्पादों और सेवाओं को विकसित करते समय उपयोगकर्ताओं की जरूरतों और प्राथमिकताओं को तवज्जो देना चाहिए-कुछ ऐसा, जो तकनीकी कंपनियां अपने तेजी से परिष्कृत कार उत्पादों के साथ कर रही हैं।
यह ऐसा दृष्टिकोण है, जो खुलेपन, अस्पष्टता से निपटने की क्षमता, ब्रांडों की रचनात्मकता को दबाने वाले ‘लौह पिंजरों’ को खत्म करने और एक निश्चित हद तक विनम्रता की भी मांग करता है। ये ऐसे गुण हैं, जो पारंपरिक वाहन निर्माताओं में गायब हैं। तो कौन-सी कंपनियां आगे बढ़ने वाली हैं? वे, जो मौजूदा उत्पादों में क्रमिक सुधार करके उन खरीदारों को आकर्षित करती हैं, जो कार खरीदना और चलाना चाहते हैं? या वे, जो ऐसे ग्राहकों को लक्षित करती हैं, जो एक स्वायत्त वाहन का अनुभव करना चाहते हैं, जहां वे गाड़ी चलाने में रुचि नहीं रखते हैं? जर्मन वाहन निर्माताओं को तेज गिरावट का खतरा है-कार उद्योग की अग्रणी कंपनियों से लेकर संघर्षरत पिछड़ी कंपनियों तक। मानसिकता में बुनियादी बदलाव ही आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है। -द कन्वर्सेशन से