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शास्त्रीय कलाओं का अर्थशास्त्र

Sat, 22 Jun 2013 09:18 PM IST
गीता चंद्रन
गीता चंद्रन Updated Sat, 22 Jun 2013 09:18 PM IST
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economics of classical art

पूरी दुनिया में सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है, जहां ईश्वर की पहचान भी सुर-ताल, संगीत और नृत्य से जुड़ी है। भगवान शिव का तांडव नृत्य हो या कृष्ण की रासलीला या फिर देवी पार्वती का लास्य नृत्य, देवी-देवताओं की दुनिया में भी इन शास्त्रीय कलाओं का खास अस्तित्व रहा है।

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फिर ऐसे देश में रहने वाले लोगों का इन विधाओं से जुड़ा होना लाजिमी है। शायद यही कारण है कि नृत्य विधा में खासतौर पर भारत को दुनिया की सबसे बड़ी रंगभूमि और कर्मभूमि माना जाता है। यहां के हर एक भौगोलिक क्षेत्र में, हर एक ऐतिहासिक काल में नृत्य ने अपने समय के लोगों की भावनाओं, इच्छाओं और यहां तक कि चिंताओं को भी परिभाषित किया है।
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हर काल और हर संदर्भ में नृत्य, भारत की भव्य और अदम्य भावना की संवेदनशील अभिव्यक्ति रहा है। फिर चाहे वह कथक हो या भरतनाट्यम। हां, इतना जरूर कहूंगी कि कुछ संदर्भों में भरतनाट्यम बेहद खास है। मसलन इसमें जति (बोल के चयन) और तीरमानम (तिहाई) बहुत कठिन होते हैं।
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अलग-अलग जति में मृदंगम की थाप इस नृत्य को और भी ज्यादा गुंजायमान और आकर्षक बना देती है। जब मैं उत्तरी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रस्तुति देती हूं तो अक्सर वहां के दर्शक मेरे नृत्य को दक्षिण भारत का कथक कहते हैं। इसके  अलावा भरतनाट्यम की एक और खास बात है, इससे जुड़ी अभिनय कला। इस नृत्य में कदमों की थिरकन का जितना महत्व है उतनी ही बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा भूमिका है अभिनय की।

हाल ही में जब मैंने अभिनय को समर्पित एक आयोजन में प्रस्तुति दी तो मेरे मित्रों ने मुझसे यहां तक कहा कि किसी नृत्य में कदमों के स्पंदन के अलावा वे किसी और चीज की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह नृत्य कलाएं जब दर्शकों को आश्चर्य और स्फूर्ति से भर देती हैं तो कलाकार के लिए यह उसकी तपस्या पूरी होने जैसा होता है।

कुछ लोग अगर ऐसा सोचते हैं कि शास्त्रीय कलाओं के बारे में लोगों की दिलचस्पी कम हुई है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारत में बहुत से युवा शास्त्रीय कलाएं सीख रहे हैं। सिर्फ बड़े महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों और गांवों में भी। बल्कि विदेशों में भी हर जगह। हाल ही में मैं पौलेंड गई थी। वहां के लोगों की भरतनाट्यम में इतनी दिलचस्पी है कि उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। बहुत से लोग वहां इस नृत्य के बारे में जानते हैं, इसे पसंद करते हैं, इसे सीखते हैं और इसकी सराहना भी करते हैं।

अब हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन सीखने वालों को किस तरह शास्त्रीय कला के वचनबद्ध दर्शकों में तब्दील किया जाए। किस तरह प्रस्तुति के अतिरिक्त अवसर प्रदान किए जाएं और शास्त्रीय कला को आजीविका से जोड़ा जाए। कुछ साल पहले एनसीइआरटी शास्त्रीय कलाओं के प्रचार-प्रसार के लिए एक नया सिलेबस बनाने में जुटी थी, लेकिन इतने बड़े स्तर पर इसे पढ़ाने वाले अध्यापक उपलब्ध न होने के कारण यह योजना पूरी नहीं हो सकी।

इस समस्या से निपटने के लिए अच्छे प्रशिक्षक तैयार करने की जरूरत है। इसके अलावा सरकारी और व्यवसायिक स्तर पर भी अगर लोग इसके संरक्षण का महत्व समझेंगे, तो इन शास्त्रीय कलाओं की स्थिति काफी बेहतर हो सकती है। इन्हें शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल करके भी इनका प्रसार किया जा सकता है।  शास्त्रीय नृत्य के अर्थशास्त्र को बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा दर्शकों की जरूरत है।


जरूरत है कि इन कलाओं में काम करने वाले लोगों के लिए भी एक जॉब मार्केट उपलब्ध करवाया जा सके। इसमें मीडिया भी काफी सहयोग कर सकता है, लेकिन शास्त्रीय कलाओं की सबसे ज्यादा अनदेखी मीडिया में ही देखने को मिलती है। इन दिनों बड़े और जाने-माने मीडिया आउटलेट्स में शास्त्रीय कलाओं की जानकारी और उनकी समीक्षा को दी जाने वाली जगह काफी कम हुई है। इस समय में हमारी सभ्यता और संस्कृति की इस अहम पहचान को बचाने के लिए सभी को साथ आने की जरूरत है।

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