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आर्थिक बदहाली पर हावी फुटबॉल का रोमांच

Tue, 10 Jun 2014 08:19 PM IST
संदीप जोशी
संदीप जोशी Updated Tue, 10 Jun 2014 08:19 PM IST
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Economic problems dominent on Romance of Football

अगर चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, तो फुटबॉल का विश्व कप दुनिया का महानतम उत्सव। इस बार फुटबॉल का विश्व कप, अपने मक्का- ब्राजील में खेला जाना है। यह राजनीतिक जद्दोजहद और उसकी विडंबनाओं से निकल कर फुटबॉल के यथार्थवादी कलात्मक सौंदर्य को निहारने का समय है।

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सच पूछें तो विश्व कप फुटबॉल पौराणिक महाभारत की तरह है। चार वर्षों तक 204 देशों के बीच खेली गई विश्व प्रतियोगिता में सफल हुए बत्तीस देशों की टीमें ब्राजील में जुट रही हैं। इस सुंदर खेल की कलात्मकता से संसार सराबोर रहा है। महाभारत अगर धर्मयुद्ध था, तो फुटबॉल विश्व कप दुनिया का पर्व है।
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फुटबॉल ब्रिटिश अनुदारवाद में पैदा हुआ। दक्षिण अमेरिकी कला में फला-फूला, और विश्वभर को रोमांचित करने वाला सबसे लोकप्रिय जुनून बना। हर देश की फुटबॉल शैली में उस देश का खानपान, वहां की प्रवृति, व्यावहारिकता और आबोहवा झलकती है। फुटबॉल के जरिये विभिन्न देशों के लोगों को एक-दूसरे के जितना करीब लाया जा सकता है, उतना किसी और तरह से नहीं।
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इस बार का विश्व कप जिस देश ब्राजील में हो रहा है, वहां संगीत की लय पर थिरकना लोगों का सहज स्वभाव है। संभवतः इसलिए ब्राजीली खिलाड़ियों के खेल में एक तरह की लय दिखती है। अब तक हुए बीस विश्व फुटबॉल में सर्वाधिक पांच बार विश्व कप विजेता ब्राजील ही रहा है। इसीलिए 1950 के बाद ब्राजील में हो रहा विश्व कप एक तरह से जड़ों की ओर लौटने जैसा भी माना जा रहा है। उस फाइनल में ब्राजील उरुग्वे से हार गया था। इसके बावजूद फुटबॉल और ब्राजीली कला का चोली-दामन का रिश्ता माना जाता है।

विश्व कप फुटबॉल का रोमांच जब अपनी पराकाष्ठा पर है, तो ब्राजील अपने आर्थिक पराभव से गुजर रहा है। वहां सरकारी आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। आर्थिक हालात से हताश लोग विश्व कप फुटबॉल को बेवजह धन की बर्बादी मान रहे हैं। उनके फुटबॉल प्रेम पर उनकी रोजी-रोटी का मुद्दा हावी हो गया है। उनका मानना है कि खेल अगर जीवन में आनंद देता है, तो जीवन केवल आनंद से नहीं चलता है। हां, खेल के आनंद से जीवन का बोझ जरूर हल्का होता है। ब्राजील के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वह विश्व कप जीत जाता है, तो उसके आर्थिक हालात भी पटरी पर आ जाएंगे।

 
दरअसल 2007 में ब्राजील को जब विश्व कप की मेजबानी मिली थी, तब उससे उम्मीद की जा रही थी कि उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाएगी। इससे बाजार में गर्मजोशी थी। 2008 की वैश्विक मंदी ने प्रगतिशील देशों के गुब्बारों की हवा निकाल दी। आर्थिक मंदी ने पिछले विश्व कप को नीरस किया था। लगातार गरीबी से उठते, उभरते मध्यवर्ग की आशाओं को संजोए रखना हर देश की राजनीतिक चुनौती है। ब्राजील में भी असंतोष का कारण बढ़ता भ्रष्टाचार है। वहां की राजनीति अपना खेल खेल रही है। फुटबॉल ब्राजील की धरोहर है। महान पेले की धरती पर नेमार का कारामाती खेल देखना अभी बाकी है। यह फुटबॉल ही है, जो ब्राजील की किस्मत बदल सकती है।

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