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संघ का आर्थिक दर्शन

Tue, 11 Sep 2018 07:07 PM IST
गौतम मेहता
गौतम मेहता Updated Tue, 11 Sep 2018 07:07 PM IST
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Economic Philosophy of RSS
मोहन भागवत

दावोस में विश्व आर्थिक मंच, 2018 के मंच पर वैश्विक व्यापार दिग्गजों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां वैश्वीकरण की प्रशंसा की, वहीं संरक्षणवाद की आलोचना की थी। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के 'उग्र उदारीकरण' को देखते हुए 2016 में मोदी ने दावा किया था कि भारत एफडीआई के लिए 'सबसे ज्यादा खुली अर्थव्यवस्था' है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगी संगठन आर्थिक खुलेपन के लिए मोदी के उत्साह से सहमत नहीं थे या वे प्रधानमंत्री की इस बात से भी इत्तेफाक नहीं रखते कि एफडीआई रोजगार निर्माण को बढ़ावा देता है। स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) ने उदारवादी एफडीआई नियमों का जोरदार विरोध किया और कहा कि एफडीआई ने अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाने से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। आरएसएस के श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने मोदी सरकार की एफडीआई नीतियों के पहलुओं पर असहमति जताते हुए आंदोलन करने की धमकी दी। आर्थिक गतिविधियों, खासकर विदेशी निवेश की भूमिका में सरकारी हस्तक्षेप की स्थिति को संघ परिवार के भीतर एक बड़ी दरार के रूप में देखा गया।


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आरएसएस नेतृत्व ने भाजपा और संघ के आर्थिक संगठनों के बीच नीतिगत मतभेदों पर मध्यस्थता के लिए कई बिंदुओं पर सद्भाव बनाने की कोशिश की। इससे आरएसएस की अपनी विचारधारा (जिसे अक्सर 'गाय + साम्यवाद' कहा जाता है) भी विकसित हुई। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रति जहां संघ ने अपने कठोर विरोध को नरम बनाया है, वहीं उसके मौजूदा आर्थिक दर्शन को भारतीय विशेषताओं के साथ लोकप्रियता के रूप में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

उदारीकरण के बाद के युग में भाजपा के भीतर स्वदेशी धड़े का वर्चस्व था। उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विदेशी निवेश का स्वागत करने के बावजूद 1996  के चुनाव घोषणापत्र में भाजपा ने दावा किया कि जब घरेलू बचत अपर्याप्त होती है और विदेशी बचत किन्हीं परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था को सहयोग करती है, तो हम देश के दीर्घकालीन हितों के लिए समझौता करते हैं। बाद में भाजपा के स्वदेशी धड़े को धीरे-धीरे हाशिये पर डाल दिया गया और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में व्यापार-अनुकूल नरेंद्र मोदी के चयन के साथ उसका हाशियाकरण पूरा हो गया। भाजपा की मौजूदा एफडीआई नीति को प्रधानमंत्री के उसी बयान से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने विदेशी निवेशकों के लिए लाल फीताशाही नहीं, लाल कालीन बिछाने की बात की थी।
 
संघ परिवार के आर्थिक राष्ट्रवादियों की नाराजगी के बावजूद मोदी सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई की सीमा को बढ़ाया और विदेशी निवेशकों पर से नियामक बोझ को कम किया।  भाजपा के मुख्यमंत्रियों, यहां तक कि संघ से करीब से जुड़े हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तक ने विदेशी निवेश आकर्षित करने को अपने एजेंडे का मुख्य हिस्सा बनाया। भाजपा सरकारों ने श्रम सुधार सहित व्यवसाय अनुकूल नियामक परिवर्तनों को लागू किया है।

संघ का हालिया विस्तार आभिजात्य गतिशील सामाजिक समूह के सदस्यों के प्रवाह से प्रेरित है। संघ में नया जुड़ने वाला यह समूह एसजेएम और बीएमएस के सांख्यिकी और स्वदेशी झुकाव पर यकीन नहीं करता। संघ की सामाजिक संरचना में बदलाव और भाजपा की चुनावी अनिवार्यताओं ने संघ के आर्थिक दर्शन के विकास को प्रेरित किया है। एफडीआई के प्रति संघ का नरम रुख तभी स्पष्ट हो गया था, जब मोहन भागवत ने 2013 में घोषणा की थी कि 'संघ हठधर्मिता से बंधा नहीं है।' संगठन के कथित प्राचीन विचारों पर आशंकाओं को दूर करते हुए उन्होंने कहा कि संघ यह समझता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलाव का मतलब है कि संगठन भी अपने विचारों में समय के साथ परिवर्तन लाए। अतीत के विपरीत अब संघ नेतृत्व वैश्वीकरण और इसके अहितकर सांस्कृतिक प्रभाव के खिलाफ निर्देश देने से बचता है।

संघ की 2015 की वार्षिक रिपोर्ट ने नवनिर्वाचित भाजपा सरकार को 'भारतीय मूल्यों के प्रकाश में' विकास की अवधारणा देने के लिए प्रोत्साहित किया था। अब संघ के मौजूदा आर्थिक दर्शन को भारतीय विशेषताओं के साथ लोकप्रियता के रूप में अच्छी तरह से समझा जा सकता है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में अप्रैल, 2018 में मुंबई के आभिजात्य व्यवसायी वर्ग को संबोधित करते हुए भागवत ने संघ के आर्थिक दर्शन की स्पष्ट घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि संघ किसी आर्थिक वाद से जुड़ा नहीं है और आर्थिक नीति की जांच करने के लिए कसौटी यह होनी चाहिए कि इसका लाभ गरीबों तक पहुंचेगा या नहीं।

पिछले कुछ वर्षों में संघ परिवार और उसके सहयोगी संगठनों ने भाजपा सरकार की नीति को आर्थिक रूप से लोकप्रिय दिशा में धकेल दिया है। भागवत के 2017 के विजयादशमी भाषण के एक हफ्ते के भीतर केंद्र सरकार ने ईंधन और कुछ आम घरेलू उपयोग की वस्तुओं पर से टैक्स घटाने के साथ-साथ जीएसटी का भुगतान करने वाले छोटे व्यवसायियों के अनुपालन बोझ को कम कर दिया। निश्चित रूप से वित्त मंत्री के बजट भाषण में पिछले दो दशकों में उत्पाद शुल्क घटाने की घोषणा से एसजेएम को प्रसन्नता हुई होगी। संघ परिवार की ओर से बढ़ता दबाव प्रधानमंत्री के अपने चुनावी वायदे को रद्द करने का कारण हो सकता है कि सरकार का व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं है। इसका उदाहरण, हाल ही में हमेशा घाटे में चलने वाली एयर इंडिया को निजीकृत करने की योजना को रद्द करना है। पार्टी के उदारवादी समर्थकों को परेशान करने वाली बात यह है कि भाजपा की राज्य सरकारें लोकप्रिय योजनाओं पर सार्वजनिक खर्च बढ़ा सकती हैं, जैसे कि खरीद मूल्य में बढ़ोतरी और कई भाजपा राज्य सरकारों द्वारा कृषि ऋण में छूट। 2014 में भाजपा का प्रचार ‘अच्छे दिन लाने’ के वायदे पर केंद्रित था, लेकिन अगला चुनाव कल्याणकारी वितरण जैसे आर्थिक रूप से लोकप्रिय विषयों पर केंद्रित हो सकता है।
 
-लेखक जॉन्स हॉपकिन्स स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज के स्नातक हैं और संघ पर शोध कर रहे हैं।

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