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आर्थिकी: अमेरिका-चीन की चुनौतियां बाकी हैं... आधुनिक मानकों के हिसाब से शेष टैरिफ अब भी ऊंचे
Sat, 24 May 2025 08:48 AM IST
ज्योति भास्कर
पीटर ड्रेपर (साथ में नाथन हॉवर्ड ग्रे)
पीटर ड्रेपर (साथ में नाथन हॉवर्ड ग्रे)
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 24 May 2025 08:48 AM IST
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अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध, भारत पर भी असर। (सांकेतिक)
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अमर उजाला
विस्तार
सारी अटकलों को धता बताते हुए अमेरिका और चीन ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में वार्ता के बाद द्विपक्षीय व्यापार तनाव को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते की घोषणा की है। अच्छी खबर यह है कि अमेरिका द्वारा हाल ही में चीन पर थोपे गए टैरिफ वृद्धि में कटौती की है। अमेरिका ने चीनी आयात पर टैरिफ को 145 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दिया है, जबकि चीन ने अमेरिकी आयात पर शुल्क को 125 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया है। इससे द्विपक्षीय व्यापार तनाव में काफी कमी आई है और इसी वजह से वित्तीय बाजारों में तेजी आई।
बुरी खबर दोतरफा है। सबसे पहले, आधुनिक मानकों के हिसाब से शेष टैरिफ अब भी ऊंचे हैं। कुल मिलाकर, बहुत संभव है कि यह एक नई आधार रेखा तय हो गई है। द्विपक्षीय टैरिफ-मुक्त व्यापार बीते युग की बात हो गई है। दूसरी बात, ये टैरिफ कटौतियां 90 दिनों तक लागू रहेंगी, जबकि बातचीत जारी रहेगी। बातचीत में संभवतः कई ऐसे मुद्दे शामिल होंगे, जिनका समाधान मुश्किल होगा। चीन की मुद्रा प्रबंधन नीति और राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों द्वारा संचालित औद्योगिक सब्सिडी प्रणाली पर चर्चा होगी। साथ ही, कई गैर-टैरिफ अवरोध भी होंगे, जिन्हें बीजिंग नल की तरह चालू और बंद कर सकता है। चीन अनिर्धारित मात्रा में अमेरिकी सामान खरीदने की पेशकश कर रहा है-यह ट्रंप के प्रथम राष्ट्रपति काल के अमेरिका-चीन ‘पहले चरण के समझौते’ की पुनरावृत्ति है, जिसे लागू नहीं किया गया था। जब तक अमेरिका बीजिंग की जवाबी कार्रवाइयों के आगे झुकने का निर्णय नहीं ले लेता, तब तक अमेरिका को दोबारा धोखा मिलते देखना कठिन है। इन बिंदुओं पर सहमति न बनने से यह बदसूरत सच्चाई उजागर हो जाएगी कि दोनों देश संवेदनशील माने जाने वाले सामान पर द्विपक्षीय निर्यात नियंत्रण लागू किए हुए हैं, जैसे सेमीकंडक्टर (अमेरिका से चीन) और प्रसंस्कृत महत्वपूर्ण खनिज (चीन से अमेरिका)।
इसके अलावा, अन्य देशों के साथ अपनी तथाकथित ‘पारस्परिक’ वार्ता में, अमेरिका अपने व्यापारिक साझेदारों पर दबाव डाल रहा है कि वे अमेरिकी बाजारों में भेजे जाने वाले अपने निर्यात से चीन से आयातित कुछ संवेदनशील वस्तुओं को हटा दें। चीन इन अमेरिकी मांगों से बेहद नाखुश है और उसने इन मांगों को अपनाने वाले व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी है। कुल मिलाकर, इस घोषणा को एक संघर्ष विराम समझौते के रूप में देखा जा सकता है, जो इस अंतर्निहित संरचनात्मक वास्तविकता को नहीं बदलता है कि अमेरिका और चीन बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के एक दीर्घकालिक चक्र में फंसे हुए हैं। इस चक्र में उतार-चढ़ाव (नवीनतम घोषणा और पूर्व के टैरिफ युद्ध) होंगे। फिलहाल, दोनों पक्ष जीत की घोषणा करने और अन्य मामलों पर ध्यान केंद्रित करने पर सहमत हुए हैं।
अमेरिका के लिए इसका मतलब यह सुनिश्चित करना है कि हैलोवीन और क्रिसमस तक उपभोक्ता सामान दुकानों में उपलब्ध हो जाएं, भले ही कीमतें बढ़ी हुई हों। चीन के लिए इसका मतलब है अपनी बढ़ती हुई बीमार अर्थव्यवस्था पर दबाव कम करने के लिए निर्यात बाजार में कुछ पहुंच बहाल करना। चूंकि कोई भी पक्ष दूसरे को परास्त नहीं कर सकता, इसलिए संभावित दीर्घकालिक परिणाम एक स्थिर संघर्ष होगा। इसे 'बढ़ते प्रभुत्व' को पाने के प्रयासों से बाधित किया जाएगा, क्योंकि इससे यह निर्धारित होगा कि कौन बेहतर शर्तों के साथ उभरता है। वर्तमान में संतुलन कहां है, इस पर पर्यवेक्षकों की राय विभाजित है।
(-द कन्वर्सेशन से)