उपाय : खान-पान बदलने से बचेगी पृथ्वी, शाकाहार से होगा धरती बचाने का सपना साकार
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विस्तार
वर्ष 1970 में पहला पृथ्वी दिवस (अर्थ डे) मनाया गया था, और उसी साल मैंने मांसाहार छोड़ दिया। वह फैसला मैंने पृथ्वी को बचाने के लिए नहीं किया था, बल्कि इसलिए किया था, क्योंकि मुझे लगा कि इसका कोई औचित्य नहीं है कि हम अपने भोजन के लिए-यानी दूध, अंडे और मांस के लिए-पशुओं पर निर्भर रहें। सिर्फ इसलिए, कि पशु हमारी प्रजाति के नहीं हैं, हमें अपने स्वार्थ के लिए उनका शोषण करने या उनकी भावनाओं के प्रति उपेक्षा बरतने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अमेरिका में और उसके बाहर भी विशाल एग्री-बिजनेस कंपनियां बड़ी संख्या में इस तरह से पशुओं को पालती हैं, जिसमें उनकी बेहतरी की लगातार उपेक्षा होती है। सूअर, मुर्गी और उनके चूजों को कभी दीवारों से बाहर नहीं निकलने दिया जाता। भीड़ के बीच मुर्गियां उन बाड़े के अंदर अंडे देती हैं, जो उन्हें डैने फैलाने से रोकते हैं। चूजे इतनी तेजी से बढ़ने लगते हैं कि उनके पैरों की कोमल हड्डियों को शरीर का बोझ उठाने में परेशानी होती है।
लाखों-करोड़ों पशुओं के साथ होने वाला यह अत्याचार मेरे मांसाहार त्यागने का एक बड़ा कारण था। लेकिन अध्ययनों ने जिस तरह जलवायु परिवर्तन के पीछे मांस और डेयरी उत्पादों का बड़ा हाथ बताया है, वह भी वनस्पति आधारित भोजन पर मेरी निर्भरता का अब उतना ही बड़ा कारण है। हालांकि तमाम पशु उत्पादों (एनिमल प्रोडक्ट्स) के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का निश्चित तौर पर औचित्य नहीं है। लेकिन अगर पूरी आबादी शाकाहार को अपना आधा भोजन बना ले, तो न केवल पशुओं के साथ होने वाले अत्याचार और हिंसा में उल्लेखनीय कमी आएगी, बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन की भीषणता को भी कमोबेश रोका जा सकेगा। जाहिर है, यह बताने की किसी को जरूरत नहीं होनी चाहिए कि दुनिया भर में पसरते सूखे, असमय बारिश और जलप्रलय आदि जलवायु परिवर्तन के ही नतीजे हैं।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मीथेन का बड़ा हाथ है, और मांस व डेयरी उत्पाद मीथेन के प्रमुख स्रोत हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल का आकलन है कि अगर एक सदी के दौरान वातावरण में एक टन मीथेन का उत्सर्जन हो, तो पृथ्वी का तापमान इसी अवधि में कार्बन डाई ऑक्साइड की इतनी ही मात्रा में उत्सर्जन की तुलना में 28 गुना ज्यादा गर्म होगा!
वैसे भी जलवायु परिवर्तन को रोकने में बहुत देर हो चुकी है, नतीजतन हमारी पारिस्थितिकी में भारी बदलाव आ चुका है। जैव विविधता को बहुत नुकसान पहुंचा है। दुनिया भर में तटीय निचले इलाके डूबने के कगार पर हैं और स्थिर वर्षा पर निर्भर असंख्य लोगों की जीविका खत्म हो चुकी है।
जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को कम करने के लिए ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। हम अपने भोजन में बदलाव के जरिये भी पृथ्वी को बचाने में योगदान कर सकते हैं। अमेरिका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले बड़े देशों में है। अमेरिकी अगर अपने पशु आधारित भोजन के आधे हिस्से को वनस्पति आधारित भोजन में बदल दें, तो वह भी वर्ष 2030 तक पेरिस समझौते के जलवायु लक्ष्य तक पहुंचने में 25 फीसदी योगदान करेगा। सरकारें अगर पशु उत्पादों पर जलवायु को नुकसान पहुंचाने के अनुपात में टैक्स लगाएं, तो जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी करना आसान हो जाएगा। लेकिन जब तक इन पर टैक्स नहीं लगाया जाता, तब तक इनका सेवन करने वाले लोगों पर यह नैतिक जिम्मेदारी तो आयद होती ही है कि वे इनका सेवन सीमित कर दें।
जलवायु परिवर्तन के भीषण स्वरूप के लिए सिर्फ पशु उत्पाद जिम्मेदार नहीं हैं। ब्राजील के अमेजन क्षेत्र में खेतों और पशुओं के चरागाहों के लिए करीब 40 फीसदी उष्णकटिबंधीय जंगलों के विनाश से भी स्थिति बिगड़ी है। सिर्फ यही नहीं कि वनों के इतने व्यापक पैमाने पर विनाश से कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है, बल्कि जो जमीन साफ की गई है, वहां सोयाबीन उगाया जा रहा है, जिसका बड़ा हिस्सा उन पशुओं के लिए है, जिनके उत्पाद जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाते हैं। मानो यह स्थिति ही कम चिंताजनक न हो, पशु उत्पाद खासकर मांस तैयार करने वाली फैक्टरियां वातावरण को प्रदूषित करती हैं, जिससे मक्खियां बड़ी संख्या में इकट्ठा होती हैं, नतीजतन स्थानीय नदियां और दूसरे जलस्रोत प्रदूषित हो जाते हैं। इससे जन स्वास्थ्य को खतरा होता है, नए वायरस और बैक्टीरिया पैदा होते हैं, और संक्रमण से लड़ने में मनुष्य कमजोर होता जाता है।
वर्ष 1975 में मैंने एनिमल लिबरेशन लिखी थी, और उसके बाद से पश्चिम में खान-पान में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह है वेगन डायट का बढ़ता चलन, जिसमें शाकाहार के अलावा डेयरी उत्पादों से भी परहेज किया जाता है। वर्ष 1975 में पश्चिमी समाजों में हिंदुओं और कुछ दूसरे लोगों के अलावा शाकाहारी से टकराना आश्चर्यजनक था। लेकिन आज ब्रिटेन में 13 लाख लोग वेगन डायट लेते हैं, जो वहां की आबादी का करीब दो प्रतिशत है। ऐसे ही, अमेरिका में वेगन डायट अपनाने वाले कुल आबादी का पांच से छह प्रतिशत हैं। अनेक सुपर बाजारों में आज वेगन उत्पाद मिलते हैं, तो रेस्टोरेंट्स के मेन्यू में वेगन लिखा होता है। लेकिन वेगन आबादी अगर आज के आंकड़े से 10 गुना बढ़ जाए, तो भी न मांस और डेयरी उत्पाद बनने रुकेंगे, न ही पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन की विभीषिका से बचाया जा सकेगा। लेकिन पृथ्वी का समृद्ध समाज अगर अपने आधे भोजन में मांस और डेयरी उत्पाद से परहेज करे, तो उसका बड़ा लाभ होगा।
लेकिन क्या मेरी यह सोच वास्तविक है? क्या ऐसा हो सकता है? मैं एक उदाहरण देता हूं। कम उम्र में जब मैं पार्टियों में जाता था, तो वहां सिगरेट का धुआं इतना ज्यादा होता कि अगले दिन तक मेरे कपड़ों में उसकी गंध होती थी। उस उम्र में मैंने सोचा नहीं था कि सिगरेट पीना कम होगा। लेकिन आज धूम्रपान का चलन बहुत कम रह गया है। आज से 20 साल पहले अमेरिका के अनेक राज्यों में समलैंगिक विवाहों की अनुमति नहीं थी। लेकिन आज ऐसी स्थिति नहीं है। चीजें बदल चुकी हैं। ऐसे में, यह मानने का कारण है कि एक न एक दिन मांस और डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल कम होगा। पृथ्वी को बचाने के लिए मानवता को यह कदम उठाना ही चाहिए।
-प्रोफेसर और शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक-एनिमल लिबरेशन नाउ के लेखक।