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जानना जरूरी है: जब दुर्वासा ने धर्म को दिए तीन शाप; संस्कृति के पन्नाें से जानें

Sun, 15 Feb 2026 09:23 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 15 Feb 2026 09:23 AM IST
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सार
दुर्वासा को क्रोध आ गया और उन्होंने धर्म को तीन शाप दिए-राजा के रूप में जन्म लेने का शाप, दासीपुत्र बनने का शाप और चांडाल योनि में जन्म लेने का शाप। धर्मदेव ने ये तीनों शाप सहर्ष स्वीकार कर लिए।
 
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durvasa rishi in anger cursed Dharma three times know what
जब दुर्वासा ने धर्म को दिए तीन शाप - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

पूर्वकाल में नर्मदा नदी के तट पर अमरकण्टक नाम का प्रसिद्ध तीर्थ था। उसी तीर्थ क्षेत्र में कौशिक वंश में सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हुए। वह शीलवान और धर्मपरायण थे, परंतु उन्हें कोई पुत्र नहीं था। इसी कारण वह सदा दुखी व चिंतित रहते थे। उनकी पत्नी सुमना धर्मनिष्ठ और बुद्धिमती थी। एक दिन सुमना ने अपने पति को चिंतित देखा, तो कहा, ‘नाथ, चिंता के समान दूसरा कोई दुख नहीं है, वह शरीर और मन, दोनों को सुखा देती है। आपके दुख का कारण क्या है?’ सोमशर्मा बोले, ‘मैं न जाने किस पूर्व जन्म के पाप के कारण पुत्रहीन हूं। यही मेरे दुख का मूल कारण है।’ 


सुमना ने कहा, ‘नाथ! पाप एक वृक्ष के समान है। उसका बीज लोभ है व उसकी जड़ मोह। असत्य उसका तना है और माया उसकी शाखाएं। दंभ तथा कुटिलता उसके पत्ते हैं। कुबुद्धि उसका फूल है एवं अनृत उसकी दुर्गंध। छल, पाखंड, चोरी, ईर्ष्या, क्रूरता और पापाचार में लिप्त प्राणी उस वृक्ष के पक्षी हैं, जो उसकी शाखाओं पर बसे रहते हैं। अज्ञान उसका फल है तथा अधर्म उसका रस। दुर्भाव रूपी जल से वह बढ़ता है और अश्रद्धा उसके फूलने-फलने की ऋतु है। जो मनुष्य उस वृक्ष की छाया में संतुष्ट होकर उसके फलों को खाता रहता है, वह चाहे जितना सुखी दिखे, पर पतन की ओर ही जाता है। इसलिए पुरुष को न केवल चिंता, बल्कि लोभ का भी त्याग कर देना चाहिए। स्त्री, पुत्र और धन की चिंता कभी नहीं करनी चाहिए। हमने पूर्व जन्म में न किसी का ऋण लिया है, न किसी की धरोहर छीनी है और न ही किसी से वैर किया है। इसलिए, आप व्यर्थ की चिंता छोड़ दीजिए।’
  • सोमशर्मा बोले, ‘कल्याणी, तुम्हारा वचन सत्य है। फिर भी सच जानने वाले साधु पुरुष वंश की इच्छा रखते हैं। मुझे पुत्र की चिंता है और मैं चाहता हूं कि किसी उपाय से हमें पुत्र प्राप्ति हो।’

तब सुमना बोली, ‘महाभाग, एक ही गुणवान पुत्र पर्याप्त होता है। बहुत से गुणहीन पुत्र केवल दुख ही देते हैं। फिर उसने कहा, ‘एक पुत्र कुल का उद्धार करता है।’

आगे उसने कहा, ‘पुत्र पुण्य से प्राप्त होता है, उत्तम कुल पुण्य से मिलता है और श्रेष्ठ गर्भ भी पुण्य से ही मिलता है। इसलिए आप पुण्य का आचरण कीजिए। पुण्य करने वाला मनुष्य ही सच्चे सुख का भोग करता है। ब्रह्मचर्य, तपस्या, पंचयज्ञों का अनुष्ठान, दान, नियम, क्षमा, शौच, अहिंसा, उत्तम शक्ति और चोरी का अभाव-ये दस पुण्य के अंग माने जाते हैं। मनुष्य को मन, वाणी और शरीर, तीनों से धर्म का पालन करना चाहिए।’ सोमशर्मा ने जिज्ञासावश पूछा, ‘प्रिये, धर्म का स्वरूप क्या है और उसके अंग कौन-कौन से हैं? मेरे मन में इसे सुनने की बड़ी इच्छा है।’

सुमना बोली, ‘अत्रिवंश में उत्पन्न भगवान दत्तात्रेय ही धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। महर्षि दुर्वासा और दत्तात्रेय ने अत्यंत कठोर तपस्या की। उन्होंने दस हजार वर्षों तक केवल वायु पीकर तप किया, फिर उतने ही समय पंचाग्नि साधना की और फिर जल में खड़े होकर तपस्या की। इससे वे अत्यंत दुर्बल हो गए। उसी समय धर्म स्वयं अपने परिवार सहित वहां प्रकट हुए। धर्म ने महर्षि दुर्वासा से कहा कि क्रोध तपस्या का नाश कर देता है। फिर उन्होंने धर्म के अंगों का परिचय दिया-ब्रह्मचर्य, सत्य, तप, दम, नियम, शौच, क्षमा, शांति, प्रज्ञा, अहिंसा, श्रद्धा, मेधा और दया। ये सभी दिव्य रूप धारण कर वहां उपस्थित थे। अंत में धर्म ने कहा, ‘मैं स्वयं मूर्तिमान धर्म हूं।’

परंतु दुर्वासा ने कहा कि उन्हें अभी तक धर्म की पूर्ण कृपा नहीं मिली। इस कारण उन्हें क्रोध आ गया। क्रोध में उन्होंने धर्म को तीन शाप दिए-राजा के रूप में जन्म लेने का शाप, दासीपुत्र बनने का शाप और चांडाल योनि में जन्म लेने का शाप। धर्मदेव ने ये तीनों शाप सहर्ष स्वीकार कर लिए। वह राजा युधिष्ठिर के रूप में जन्मे, दासीपुत्र होकर विदुर कहलाए और राजा हरिश्चंद्र के समय चांडाल बने। इस प्रकार धर्म ने अपने शापों का भोग किया। यह कथा सुनकर सोमशर्मा का मन शांत हो गया।
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