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जानना जरूरी है: अश्वत्थामा ने कृष्ण से मांगा सुदर्शन चक्र, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

Sun, 29 Sep 2024 05:54 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 29 Sep 2024 05:54 AM IST
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सार
सुदर्शन चक्र इतना भारी था कि अश्वत्थामा से हिला तक नहीं। अश्वत्थामा के माथे से पसीना टपकने लगा, चेहरा लाल हो गया, किंतु सुदर्शन चक्र टस से मस नहीं हुआ। अश्वत्थामा लज्जित महसूस कर रहा था।
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During his stay in Dwarka Ashvasthama asked for divine Sudarshan Chakra from Shri Krishna
श्रीकृष्ण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यह घटना उस समय की है, जब पांडव वनवास काट रहे थे। उस बीच अश्वत्थामा कुछ समय के लिए द्वारिका में वृष्णिवंशियों से मिलने गया था। उसी प्रवास के दौरान एक दिन अश्वत्थामा के मन में यह विचार उठा कि संसार में श्रीकृष्ण ही एकमात्र व्यक्ति हैं, जिन्हें सही अर्थों में अजेय माना जाता है। कृष्ण की अजेयता का एक मुख्य कारण उनका दिव्य सुदर्शन चक्र था, जिसे वह आवश्यकतानुसार अपनी तर्जनी पर धारण कर लिया करते थे। यह सोचकर अश्वत्थामा को लगा यदि किसी तरह श्रीकृष्ण का चक्र उसे मिल जाए, तो वह भी अजेय हो सकता है। यही सोचकर अश्वत्थामा सुदर्शन चक्र को प्राप्त करने की इच्छा लिए श्रीकृष्ण के पास पहुंच गया।



अश्वत्थामा ने मधुर वाणी में श्रीकृष्ण से कहा, ‘हे गोविंद! मेरे पिता द्रोणाचार्य ने कठोर तपस्या करके महामुनि अगस्त्य से ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था। वह अस्त्र अब मेरे पास है और मेरे पिता ने उसे चलाने की विद्या भी मुझे सिखाई है, किंतु सामान्य स्थिति में उसका प्रयोग न करने की चेतावनी भी दी है। इस कारण मैं चाहकर भी उस दिव्यास्त्र का प्रयोग नहीं कर पाता। मेरे लिए उस ब्रह्मास्त्र का कोई लाभ नहीं है।’


श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले, ‘अश्वत्थामा, तुम भाग्यशाली हो कि वह महान अस्त्र तुम्हारे पास है। परंतु तुम यह मुझे क्यों बता रहे हो?’

अश्वत्थामा ने श्रीकृष्ण से अपने मन की बात कह दी, ‘माधव! आपके पास अनेक दिव्यास्त्र हैं, जिनकी सहायता से आप शत्रु को सरलता से पराजित कर सकते हैं। मेरी इच्छा है कि आप उन अस्त्रों में से अपना सुदर्शन चक्र मुझे दे दीजिए और उसके बदले में आप चाहें, तो मैं आपको ब्रह्मास्त्र दे सकता हूं।’

यह सुनकर श्रीकृष्ण के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, लेकिन अगले ही पल फिर मुस्कराए। श्रीकृष्ण ने कहा, ‘अश्वत्थामा, तुम दुर्योधन के पक्ष में हो और तुम जानते हो कि मुझे पांडव अधिक प्रिय हैं, इसलिए वैसे तो मुझे तुम्हारी प्रार्थना तुरंत ही अस्वीकार कर देनी चाहिए, क्योंकि यदि मैंने तुम्हें अपना सुदर्शन चक्र दिया, तो पांडवों के लिए संकट पैदा हो सकता है, किंतु मेरी दुर्बलता है कि मैं समर्पण भाव से अपने पास आए किसी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाता।’ श्रीकृष्ण ने अपने चक्र की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘यह रहा मेरा चक्र! आज से यह तुम्हारा हुआ। इसे उठा लो और ले जाओ।’

अश्वत्थामा प्रसन्न हो गया। वह चक्र को उठाने लगा, परंतु चक्र इतना भारी था कि अश्वत्थामा से हिला तक नहीं। अश्वत्थामा ने अपना पूरा जोर लगा दिया। उसके माथे से पसीना टपकने लगा, चेहरा लाल हो गया, किंतु सुदर्शन चक्र टस से मस नहीं हुआ। अश्वत्थामा लज्जित महसूस कर रहा था। वह निराश होकर पीछे हट गया और दृष्टि झुकाए श्रीकृष्ण के सामने खड़ा रहा।

तब श्रीकृष्ण बोले, ‘अश्वत्थामा, मैंने बारह वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने के उपरांत इस चक्र को प्राप्त किया है और यही कारण है कि यह तुमसे हिला तक नहीं है। परंतु मैं तुमसे यह पूछना चाहता हूं कि गांडीवधारी अर्जुन की ध्वजा पर वानर का चिह्न सुशोभित है और उसने द्वंद्व में उमापति भगवान शंकर को भी संतुष्ट कर दिया था, परंतु फिर भी अर्जुन ने चक्र पाने की इच्छा नहीं की। यहां तक कि मेरी पत्नी रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न प्रद्युम्न ने भी मुझसे यह चक्र कभी नहीं मांगा। तुम भरतवंशी आचार्य द्रोण के पुत्र हो। तुम्हारे पास ब्रह्मास्त्र के साथ उसे चलाने का ज्ञान भी है, तो फिर तुम्हारे मन में इस चक्र को पाने की इच्छा क्यों जागृत हुई? तुम यह चक्र लेकर किसे पराजित करना चाहते थे?’

अश्वत्थामा अपनी असमर्थता पर लज्जित था। उसने श्रीकृष्ण के सामने आंखें झुकाते हुए उनसे सच कह दिया, ‘माधव! मैं जानता हूं कि आप अजेय हैं और इसका एक मुख्य कारण आपका सुदर्शन चक्र है। इसलिए मैंने निर्णय किया था कि मैं आपका यह चक्र प्राप्त करके आप ही से युद्ध करूंगा और आपको परास्त करके अजेय हो जाऊंगा। मुझे क्षमा कर दीजिए।’ यह कहकर अश्वत्थामा ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और हस्तिनापुर लौट आया।

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