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प्रदूषण के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई
मुकुल श्रीवास्तव
Updated Tue, 22 Aug 2017 07:13 PM IST
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मुकुल श्रीवास्तव
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प्रदूषण एक बड़ी समस्या है और कोई भी समस्या अपने साथ कई अन्य तरह की चुनौतियां भी लाती है। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली ग्रीन पीस संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल वायु प्रदुषण से बारह लाख लोग अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। पिछले दो दशकों से जबसे देश में नई आर्थिक नीतियां और मुक्त व्यापार की नीतियां लागू की गई हैं, उसका असर पर्यावरण पर भी पड़ा है। इसकी वजह से देश की हवा लगातार रोगी होती जा रही है। विकासशील देश, जिनमें भारत भी शामिल है प्रदूषण के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं।
हमारे देश में पेट्रोल, डीजल और कोयला ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं, जिन्हें प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन यह भी सच है कि अगर देश के विकास को गति देनी है, तो आधारभूत अवस्थापना में निवेश करना ही पड़ेगा और इसमें बड़े पैमाने पर निर्माण भी शामिल है। निर्माण के लिए ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेट्रोल, डीजल और कोयला आसान विकल्प है। दूसरी ओर निर्माण कार्य के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है, जिसे लेकर अदालतों में चुनौतियां तक दी गई हैं। आधारभूत संरचना के विकास के लिए पक्का निर्माण जरूरी है, मगर इससे पर्यावरण भी प्रभावित होता है, क्योंकि किसी न किसी रूप में इसके लिए ईंधन की जरूरत पड़ती है और उससे निकलने वाला धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है।
ऊर्जा के गैर परंपरागत विकल्पों में सौर उर्जा और परमाणु ऊर्जा महंगी है और इनके इस्तेमाल में भारत अभी काफी पीछे है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए पचहतर प्रतिशत ग्रामीण परिवार रसोई के ईंधन के लिए लकड़ी पर, दस प्रतिशत गोबर के उपलों पर और लगभग पांच प्रतिशत रसोई गैस पर निर्भर हैं। जबकि इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए बाईस प्रतिशत परिवार लकड़ी पर, अन्य बाईस प्रतिशत केरोसिन पर तथा लगभग चवालीस प्रतिशत परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं। घर में प्रकाश के लिए पचास प्रतिशत ग्रामीण परिवार केरोसिन पर तथा अन्य अड़तालीस प्रतिशत बिजली पर निर्भर हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए नवासी प्रतिशत परिवार बिजली पर तथा अन्य दस प्रतिशत परिवार केरोसिन पर निर्भर हैं।
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ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरत की अस्सी फीसदी ऊर्जा बायोमॉस से उत्पन्न होती है। इससे गांव में पहले से बिगड़ रही वनस्पति की स्थिति पर और दबाव बढ़ता जा रहा है। भारत की हवा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है, पर उन पर भी प्रदूषण का असर पड़ रहा है। एनवायरमेंटल साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी लेटर्स जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के प्रदूषित वायुमंडल के कारण सौर ऊर्जा का सत्रह प्रतिशत नुकसान हो रहा है, जिससे करीब 776 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती थी। भारत के संदर्भ में प्रदूषण से सौर ऊर्जा को होने वाले नुकसान की यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है, जो हमें चेता रही है कि अगर विकास का हमारा मॉडल समावेशी नहीं होगा, तो ऊर्जा के गैर परंपरागत स्रोत भी सफल न हो पाएंगे।
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हमारे देश में पेट्रोल, डीजल और कोयला ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं, जिन्हें प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन यह भी सच है कि अगर देश के विकास को गति देनी है, तो आधारभूत अवस्थापना में निवेश करना ही पड़ेगा और इसमें बड़े पैमाने पर निर्माण भी शामिल है। निर्माण के लिए ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेट्रोल, डीजल और कोयला आसान विकल्प है। दूसरी ओर निर्माण कार्य के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है, जिसे लेकर अदालतों में चुनौतियां तक दी गई हैं। आधारभूत संरचना के विकास के लिए पक्का निर्माण जरूरी है, मगर इससे पर्यावरण भी प्रभावित होता है, क्योंकि किसी न किसी रूप में इसके लिए ईंधन की जरूरत पड़ती है और उससे निकलने वाला धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है।
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ऊर्जा के गैर परंपरागत विकल्पों में सौर उर्जा और परमाणु ऊर्जा महंगी है और इनके इस्तेमाल में भारत अभी काफी पीछे है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए पचहतर प्रतिशत ग्रामीण परिवार रसोई के ईंधन के लिए लकड़ी पर, दस प्रतिशत गोबर के उपलों पर और लगभग पांच प्रतिशत रसोई गैस पर निर्भर हैं। जबकि इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए बाईस प्रतिशत परिवार लकड़ी पर, अन्य बाईस प्रतिशत केरोसिन पर तथा लगभग चवालीस प्रतिशत परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं। घर में प्रकाश के लिए पचास प्रतिशत ग्रामीण परिवार केरोसिन पर तथा अन्य अड़तालीस प्रतिशत बिजली पर निर्भर हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए नवासी प्रतिशत परिवार बिजली पर तथा अन्य दस प्रतिशत परिवार केरोसिन पर निर्भर हैं।
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ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरत की अस्सी फीसदी ऊर्जा बायोमॉस से उत्पन्न होती है। इससे गांव में पहले से बिगड़ रही वनस्पति की स्थिति पर और दबाव बढ़ता जा रहा है। भारत की हवा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है, पर उन पर भी प्रदूषण का असर पड़ रहा है। एनवायरमेंटल साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी लेटर्स जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के प्रदूषित वायुमंडल के कारण सौर ऊर्जा का सत्रह प्रतिशत नुकसान हो रहा है, जिससे करीब 776 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती थी। भारत के संदर्भ में प्रदूषण से सौर ऊर्जा को होने वाले नुकसान की यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है, जो हमें चेता रही है कि अगर विकास का हमारा मॉडल समावेशी नहीं होगा, तो ऊर्जा के गैर परंपरागत स्रोत भी सफल न हो पाएंगे।