कारोबार की टूटती कमर
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इन दिनों जब देश में वैश्विक और आंतरिक आर्थिक कारणों से बाजार और कारोबार परिदृश्य पर बढ़ती मुश्किलें संकट की दस्तक देती दिख रही हैं, तब देश की घरेलू अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाकर आसन्न आर्थिक संकट कम करने के रणनीतिक प्रयास आवश्यक दिखाई दे रहे हैं। इसमें कतई दो मत नहीं है कि लोकसभा में खाद्य सुरक्षा बिल के पारित होते ही सरकारी खजाने पर अब 1.25 लाख करोड़ रुपये के सालाना आर्थिक बोझ की आशंका ने निवेशकों को हिला दिया है, वहीं दूसरी ओर सीरिया पर अमेरिका और उसके मित्र देशों की सैनिक कार्रवाई की तैयारी ने भी कच्चे तेल के भाव दो साल की ऊंचाई पर पहुंचा दिए हैं। रुपये में भी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिका में प्रोत्साहन पैकेज के वापस होने की आशंका ने डॉलर की मजबूती के संकेत दिए हैं, जिससे भारतीय बाजार में गिरावट का जोखिम है। इस बीच, चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए सोना गिरवी रखने की आशंकाएं भी विश्लेषकों द्वारा जताई जा रही हैं।
इस पूरे आर्थिक परिदृश्य में यह बात उभरकर सामने आ रही है कि बेशक वैश्विक आर्थिक कारणों पर भारत का नियंत्रण नहीं है, पर आंतरिक अर्थव्यवस्था की गतिशीलता को बढ़ाने के साथ-साथ आंतरिक कारोबार में सुधार करके भारत आर्थिक मुश्किलों को कम कर सकता है। इस परिदृश्य ने जहां कारोबार के लिए भी संकट पैदा किए हैं, वहीं महंगाई ने आम लोगों की कमरतोड़ दी है। इसका असर अर्थव्यवस्था की गतिशीलता पर पड़ रहा है। ऊंची ब्याज दर की वजह से कारोबारी विकास को भारी नुकसान पहुंचा है। वहीं निर्यात घटने से निर्यात कारोबार से जुड़े कारोबारी परेशान हैं। दूसरी ओर आयात बढ़ने और चीनी उत्पादों से भारतीय बाजार के पट जाने से देसी कारोबारी निराश हैं। छोटे कारोबारियों की एक बड़ी चिंता यह भी है कि देश में एफडीआई बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई से जुड़ी तीन मुख्य शर्तों में रियायत भी दी है, जिससे भारतीय कारोबार की चुनौती बढ़ेगी। अब मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई वाले रिटेल स्टोर खोलने के लिए 10 लाख की आबादी की पाबंदी नहीं रह गई है। 10 करोड़ डॉलर के निवेश करने की जो शर्त है, उसमें कुल निवेश की आधी राशि बुनियादी ढांचे पर सिर्फ एक बार निवेश करनी होगी। इसी तरह विदेशी रिटेलरों के लिए सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योगों (एसएमआई) से 30 फीसदी की खरीदारी पहले निवेश के दौरान ही अनिवार्य होगी। इन तीन रियायती शर्तों से छोटे कारोबारियों के समक्ष प्रतिस्पर्धा की नई आशंका बढ़ेगी।
जाहिर है, देश में कारोबारी चिंताओं का कारण बाजार से संबंधित शासकीय नीतियों एवं कार्य की धीमी गति भी है। पिछले दिनों विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय कारोबार रिपोर्ट, 2013 में भी इसकी पुष्टि की गई और कहा गया कि भारत में कारोबारी गतिविधियों में कदम-कदम पर कठिनाइयां हैं। इस रिपोर्ट में कारोबारी प्रतिकूलता के पैमाने पर भारत को 185 देशों में 132वां स्थान दिया गया है। ऊंची ब्याज दर कारोबारी विकास की राह में बड़ा रोड़ा है। विदेशी निवेशक एफडीआई के लिए उत्सुक नहीं हैं, तो भारतीय निवेशक दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं।
ऐसे में भारत के कारोबार क्षेत्र की मुश्किलों को कम करने के लिए कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत है। वैश्विक औद्योगिक सुस्ती के दुष्परिणामों से अपने उद्योग-कारोबार को बचाने के लिए जिस तरह अमेरिकी और यूरोपीय बैंक सस्ती ब्याज दरों की बौछार कर रहे हैं, वैसे ही सस्ते कर्ज की सुविधाएं भारतीय उद्योग जगत को भी क्यों नहीं दी जानी चाहिए? इसके साथ ही जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) को भी शीघ्र लागू किए जाने की जरूरत है। दुनिया के कई विकासशील देशों में भी रिटेल क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति है, लेकिन वहां शर्तों के तहत गुणवत्ता, अनुबंध प्रक्रिया और कीमत से जुड़े मानक इतने कड़े हैं कि कई दिग्गज वैश्विक कंपनियां भी उन देशों के रिटेल कारोबार को चोट नहीं पहुंचा पाई हैं। असल में अच्छा माहौल बनाने की जिम्मेदारी सरकार की है, जिसे कारोबार के रास्ते में बाधा बनने वाली प्रशासकीय बाधाओं और लालफीताशाही को दूर करना चाहिए।