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पारिस्थितिकी: बारिश का पानी संचित करने के लिए स्पंज सिटी की जरूरत, जल-भराव से मिलेगी मुक्ति

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सार
महानगरों में पुरानी जर्जर जल निकासी प्रणाली नाकाम साबित हो रही है, इसलिए बारिश का पानी संचित करने वाले नए मॉडल की जरूरत है।
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drainage system inefficient in most metropolitan cities need to make Sponge Cities for flood management
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मई में अचानक आई आंधी और बारिश के कारण अनेक महानगरों में जल-भराव दिखने लगा, तो हैरत नहीं हुई, क्योंकि ये दृश्य आम हो गए हैं। जलवायु बदलाव का यह एक प्रभाव, तो अब हमारे देश में साफ दिखता ही है कि मानसून के दिन जब न भी हों, तो अतिवृष्टियां होती हैं और हमारे महानगर पानी-पानी हो जाते हैं। पानी न बाहर बहता है, न जमीन में समाता है। सड़कों पर परिवहन ठप हो जाता है। स्कूल बंद करने पड़ते हैं। कार्यालयों की उपस्थितियों पर भी असर पड़ता है।



अक्तूबर, 2020 में पूरे भारत में ही बहुत ज्यादा बारिश हुई थी। तब हैदराबाद में अक्तूबर की बरसातों का 100 सालों का रिकॉर्ड टूट गया था। हफ्तों तक हजारों घर बाढ़ के बाद भी डूबे रहे थे। दिल्ली में भी अक्तूबर, 2022 की भारी बरसात ने 15 साल का रिकॉर्ड तोड़ा था। नवंबर, 2022 में दूसरे सप्ताह तूफान जनित बारिश से उपजी बाढ़ की स्थितियों से चेन्नई व आसपास के जिलों के शहरी क्षेत्रों का जूझना लंबे समय तक जारी रहा था। इसी बीच, यदि जल-भराव हो जाए, तो ऐसे शहरी या ग्रामीण इलाकों में बाद की हल्की बरसातों में भी जल का भीतर रिसना बंद या धीमा हो जाता है।


मानसूनी बरसातों में ऊंचे हुए स्थानीय वाटर टेबल की स्थितियों में जब लगभग तत्काल बाद ही मान लें कि नवंबर में यदि आकस्मिक चक्रवाती तूफानों आदि के कारण अतिवृष्टि हो जाए, तो भी जल-जमाव होने से पानी का जमीन के भीतर जाना ठहर जाएगा। ऐसे में जब भारी आर्थिक लागत के कारण स्थानीय नगर निकाय यदि नए जोड़े गए गांवों आदि के बढ़ते शहरी विस्तारों में न नई निकासी प्रणाली बना पाएं और न ही पुरानी प्रणाली को ठीक कर पाएं, तो अपर्याप्त जल निकासी क्षमता के कारण ज्यादा बारिश होने पर भी जल-जमाव होने लगता है।

ऐसे समय जब देश के अधिकांश महानगरों में जल निकासी प्रणाली अक्षम साबित हो रही है, इन्हें 'स्पंज सिटी' बनाए जाने पर विचार किया जाना चाहिए। स्पंज सिटी बाढ़ प्रबंधन, पारिस्थितिक बुनियादी ढांचे और जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक नया शहरी निर्माण मॉडल है। इसमें पुरानी जर्जर जल निकासी प्रणाली पर और अधिक भार डालने के बजाय अतिरिक्त रूप से धारणीय निकासी प्रणाली की स्थापना में जोर होता है। यों भी शहरीकरण से बाढ़ का जोखिम तीन गुना बढ़ जाता है।

भारी बारिश में पुरानी जल निकासी प्रणाली की नाकामी के बाद सबसे पहले चीन में वर्ष 2000 में स्पंज सिटी का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। तब चीन के आधे से ज्यादा शहर पानी की कमी से भी जूझ रहे थे। शहरों में बाढ़ प्रबंधन योजनाएं भी अस्तित्व में नहीं थीं। चीन चाहता है कि उसके महानगर अपने-अपने यहां होने वाली बारिश के 70 फीसदी पानी का उपयोग करें। इसी क्रम में उसने 2014 से स्पंज सिटी को अपने शहरी नियोजन का हिस्सा बना दिया।

स्पंज सिटी में पेड़, पार्क, झील, तालाब, वेटलैंड्स, रेन गार्डंस, ग्रीन रूफ पार्क आधारित अतिवृष्टि प्रबंधन पर जोर रहता है। स्पंज सिटी वास्तव में अपने पानी को बाहर छोड़ने के बजाय, अपनी सीमाओं के भीतर उपयोग के लिए संभाल कर रखती है। भूजल शहरी भारत में 50 प्रतिशत जल आपूर्ति में काम आता है। ऐसे में बरसात का पानी बेकार जाना अक्षम्य-सा है। स्पंज सिटी का मतलब यह भी है कि जैसे स्पंज से सोखा हुआ पानी बाद में उससे निकाला जा सकता है, वैसे ही स्पंज सिटी में बारिश के अवशोषित पानी का बाद में खेती व घरेलू काम में उपयोग हो सकता है।

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में चेन्नई महानगर विकास प्राधिकरण (सीएमडीए) ने नवंबर, 2021 में आई बाढ़ के बाद भविष्य की मूसलाधार बारिश के पानी को जमीन सोख सके, इसके लिए स्पंज पार्क बनाने का निश्चय किया था। अनौपचारिक रूप से इसको भारत में आदर्श स्पंज सिटी बनाने का शुरुआती प्रयास माना जा सकता है। इसी तरह से वृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) ने भी फरवरी, 2021 में स्पंज सिटी की अवधारणा को लागू करने की बात की थी। भारत के महानगरों और बड़े शहरों में बरसात के सामान्य मौसम के अलावा भी बाढ़ की समस्या जिस तरह से बढ़ रही है, उसमें स्पंज सिटी की अवधारणा को विस्तार देने की जरूरत है।

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