नजरिया: जनसंख्या के बारे में क्या सोचते थे आंबेडकर, आबादी के शिखर पर पहुंचकर याद आते हैं बाबा साहेब
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विस्तार
हाल ही में जारी हुई ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट, 2023‘ के अनुसार, भारत दुनिया में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन गया है। चिंताजनक बात यह है कि भारत में जिन समुदायों में गरीबी अधिक है, स्त्री शिक्षा का स्तर नीचे है, जीवन शैली में अतार्किकता और अवैज्ञानिकता अधिक है, वहां आबादी का ग्राफ ऊपर है। ग्रामीण भारत में आज भी बाल-विवाह प्रचलित है। विवाह की वास्तविक आयु से पहले ही बच्चियां मां बन जाती हैं। हालांकि देश में स्वास्थ्य सुरक्षा बढ़ी है, जिससे मृत्यु दर कम हुई है और आबादी बढ़ी है। हमारे यहां कोरोना के चरम दौर में भी मृत्यु दर चीन की अपेक्षा कम रही है। लेकिन जीवन की गुणवत्ता का सही मूल्यांकन नहीं हो रहा। जनसंख्या का नया आंकड़ा आने के बाद दंभी चीन कह ही रहा है कि हम आबादी में पीछे जरूर हुए हैं, लेकिन नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में आगे हैं।
आजादी के पहले हमारे राष्ट्र-निर्माताओं, चिंतकों और योजनाकारों ने क्या जनसंख्या को लेकर कोई चिंता व्यक्त नहीं की थी? नए भारत के निर्माण के संदर्भ में जनसंख्या नीति को लेकर राष्ट्रीय नेताओं की चिंताएं और योजनाएं क्या थीं? सवाल यह भी कि आबादी से संविधान निर्माता आंबेडकर का क्या संबंध है। भारत में पहली बार जनगणना वर्ष 1872 में गवर्नर जनरल लार्ड मेयो के शासन काल में हुई थी। बाद में अर्थशास्त्र के शोधार्थी के रूप में भीमराव आंबेडकर ने उस जनगणना का विश्लेषण किया था। लेकिन वह संविधान में इस बारे में तत्काल कुछ अधिक जोड़ नहीं पाए थे। 'कुटंब नियोजन अवश्य होना चाहिए', यह विचार भारतीय नेताओं में सर्वप्रथम और सार्वजनिक तौर पर डॉ. आंबेडकर ने व्यक्त किया था। वह 'संतति नियमन यानी परिवार नियोजन' विषयक प्रस्ताव लेकर बंबई विधानसभा में जाने वाले थे, परंतु उस समय वह इतने अस्वस्थ हो गए थे कि डॉक्टर ने उन्हें बेड रेस्ट की सख्त हिदायत दी थी। तो वह प्रस्ताव उन्होंने श्री पीजे रोहन की मार्फत 10 जनवरी, 1938 को बंबई विधानसभा में पेश किया। उनका सुझाव था कि सरकारों को परिवार नियोजन का जोरदार प्रचार करना चाहिए तथा आम नागरिकों को संतति रोधक साधन सहज सुलभ कराने चाहिए।
डॉ. आंबेडकर ने जनसंख्या संतुलन का मुद्दा तब उठाया था, जब भारत की आबादी मात्र 30 करोड़ थी। वह आशावादी थे, परंतु जानते थे कि जिन सामाजिक समुदायों में अशिक्षा और गरीबी अधिक होगी, वहां आबादी भी अधिक होगी। आर्थिक-सामाजिक मुद्दों के गहरे जानकार आंबेडकर जनसंख्या संतुलन के लिए दूरगामी योजना बनाना चाहते थे। वह कार्य करने का अवसर तो उन्हें नहीं दिया गया, पर उनके सुझावों का असर सरकारी योजनाओं पर कमोबेश रहा। उनकी कुटुंब नियोजन की प्रस्तावना के अनुसार, उनके जीवन काल यानी 1952 में ही ‘परिवार नियोजन‘ को राजकीय कार्यक्रमों का हिस्सा बनना पड़ा, अपितु उनके परिनिर्वाण के दो दशक बाद 1976 में 42 वां संविधान संशोधन कर सूची में 'जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन कार्य' जोड़ा गया।
अपने यहां हमेशा ही जनसंख्या के विभिन्न पहलुओं पर बात होती रही है। वर्ष 1968 में पदोन्नति के लिए 'हम दो, हमारे दो‘ की सीमा रेखा तय की गई थी। परंतु उसका पालन नहीं हुआ। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान जनसंख्या नियंत्रण सहित 20 सूत्रीय कार्यक्रम का कार्यान्वयन इतने अव्यावहारिक और अतिवादी गति से किया था कि जबरन ‘नसबंदी‘ आपातकाल के बाद हुए चुनाव में उनकी हार की बड़ी वजह बनी। नरसिंह राव सरकार ने वर्ष 1992 में सांसदों, विधायकों के लिए दो बच्चों की नीति की बात की थी। परंतु उस पर अमल न हो सका। उत्तर प्रदेश में लोक-सेवकों को एक बच्चा रखने का फैसला भी बदल दिया गया था।
आजाद भारत में पहली जनगणना 1951 में हुई थी। तब देश की जितनी आबादी (36 करोड़) थी, उतनी आज अनुसूचित जाति/ जनजाति की हो चुकी है। यह बात किसी की भी समझ में आती है कि बच्चे अधिक होने से ज्यादा जरूरी है कि वे स्वस्थ, सक्रिय और सफल हों। जनसंख्या घनत्व राष्ट्र के समक्ष कई चुनौतियां खड़ी करता है। जैसे, नागरिकों के आयु-काल की उपयोगिता, जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करने हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में अपेक्षित वृद्धि हो पाना, इलाज और दवाएं सर्वसुलभ होना, भूख की समस्या का पूरी तरह हल होना, रोजगारपरक शिक्षा की गुणवत्ता और समावेशी एकरूपता में वृद्धि होना आदि-आदि।
जन्म दर बढ़ती है, तो उसी अनुपात में लोगों के विकास के अवसर भी बढ़ाने अपेक्षित हैं। अगर ऐसा नहीं है, तो अवांछित आबादी का विस्फोट एक प्रकार की आपदा है। जन्म के प्रति अवैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले लोग जनसंख्या घनत्व को समस्या ही नहीं मानते हैं। जाति आधारित मत समीकरण बनाने वाले केवल स्व-जाति संख्या में वृद्धि होते देखना चाहते हैं। इन दिनों कई राज्यों में जाति जनगणना की मांग जोरों पर है। देर-सबेर जातिवार जनगणना यदि होती है, तो वह नए आंकड़े लेकर आएगी। तब यह भी पता चलेगा कि किन जातियों में जन्म दर अधिक है और किन जातियों में कम है। कभी डॉ. आंबेडकर को आबादी से संबंधित उनके वैज्ञानिक विचार के लिए दुस्साहसी ही कहा गया था। आज भी बहुसंख्य भारतीय जनसंख्या असंतुलन को लेकर अपेक्षित फिक्रमंद नहीं हैं। आजादी के 75 साल पूरे होने पर हम अमृतोत्सव मना रहे हैं। उत्सव की यह खुशी और स्थायी होगी, यदि हम जनसंख्या घनत्व के दबाव से आजाद होने को संकल्पबद्ध हों।