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पड़ताल: पाकिस्तान में कोई उम्मीद नहीं, सेना के रहते स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर संदेह

Sat, 19 Aug 2023 07:22 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Sat, 19 Aug 2023 07:22 AM IST
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सार
पहले से महंगाई और अस्थिर अर्थव्यवस्था से जूझ रहे पाकिस्तान में कार्यवाहक प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा के बावजूद सेना की परछाईं में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो पाएंगे, इस पर संदेह बरकरार है।
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doubts on free and fair elections under shadow of army in Pakistan struggling with inflation unstable economy
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विस्तार

इंतजार के पल खत्म हुए और पाकिस्तान में कार्यवाहक प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा कर दी गई है। बांग्लादेश के समान ही पाकिस्तान के संविधान में कार्यवाहक सरकार का प्रावधान है। लेकिन अब आवाजें उठ रही हैं कि संविधान में संशोधन करते हुए पाकिस्तान के चुनाव आयोग को बड़ी भूमिका दी जाए और उसे ज्यादा मजबूत और आजाद बनाया जाए। कभी-कभी एक पत्रकार खुद को वहां खड़ा पाता है, जहां इतिहास लिखा जा रहा हो और उसके पास इस बदलाव को शब्द देने का मौका होता है।



बीते शनिवार को इस्लामाबाद में आयोजित एक रात्रिभोज कार्यक्रम से बाहर निकलते हुए, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के पूर्व मंत्रियों ने भी शिरकत की थी, पूर्व में विदेश सचिव और भारत में उच्चायुक्त रहे जलील अब्बास जिलानी के घर के पास से गुजरने का मौका मिला। वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पद के लिए शीर्ष दावेदार थे, लेकिन शनिवार की दोपहर को इस पद के लिए सीनेटर अनवार-उल-हक काकड़ के नाम की घोषणा की गई। यह खबर सभी को झटका देने वाली थी। खासकर जलील जिलानी के लिए यह खबर सदमे से कम नहीं थी, क्योंकि उन्हें यह आश्वासन दिया जा रहा था कि उनके नाम की घोषणा तय है। अफसोस की बात है कि 2018 में भी जलील को इसी दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा था, जब उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पद दिए जाने की बात हो रही थी, लेकिन एकाएक उनका नाम हटा दिया गया था। पिछले शनिवार को हमने देखा कि जलील जिलानी के घर के बाहर तैनात पुलिस और सुरक्षा अधिकारियों को हटा लिया गया।


संभावित प्रधानमंत्री को सरकारी सुरक्षा देना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन फिर बुधवार की दोपहर को जिलानी के लिए एक खुशखबरी आई। उन्हें सरकार की ओर से फोन करके यह सूचित किया गया कि उन्हें नए विदेश मंत्री के तौर पर नामित किया गया है। अब वह शपथ ग्रहण कार्यक्रम का इंतजार कर रहे हैं। विदेश मंत्रालय के दफ्तर में एक और बदलाव नए विदेश सचिव सायरस काजी के नाम की घोषणा के तौर पर किया गया है। वह एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो इससे पहले तक तुर्किये में पाकिस्तान के राजदूत थे।

बड़ा सवाल यह है कि आखिर असल वजह क्या थी, कि जलील जिलानी का नाम हटाकर काकड़ को चुना गया। मेरी जानकारी के अनुसार काकड़ के चुनाव में सेना ने काफी गुप्त ढंग से काम किया है। उन्हें जुलाई में ही यह सूचना दे दी गई थी, कि अगस्त में जब पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) सरकार भंग की जाएगी, तो उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पद संभालने के लिए तैयार रहना होगा। भंग की गई संसद में विपक्षी दल के नेता समेत सभी राजनीतिक दलों ने संभावित नामों की अपनी-अपनी सूचियां बनाकर दी थीं।

जलील जिलानी का नाम पीपीपी नेता आसिफ अली जरदारी की तरफ से आया था, जिस पर सभी राजी थे। लेकिन जब एकाएक सैन्य प्रतिष्ठान की तरफ से काकड़ का नाम भेजा गया, तो सभी को हैरत जरूर हुई, लेकिन फिर सभी ने अपनी रजामंदी दे दी। इसके बाद ही काकड़ के नाम की औपचारिक घोषणा की गई। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किसी भी राजनीतिक दल ने काकड़ को मुबारकबाद नहीं भेजी है। न तो नवाज शरीफ ने, न मौलाना फजलुर रहमान, न आसिफ अली जरदारी ने और न बिलावट भुट्टो ने, जो सभी पीडीएम सरकार के अंग थे। अब विदेश मंत्री के तौर पर जलील जिलानी का नाम सामने आया है। उम्मीद है कि काकड़ बलूचिस्तान से अपने दो राजनीतिक मित्रों को संघीय कैबिनेट में जरूर लाएंगे।

पाकिस्तान के इस कार्यवाहक प्रधानमंत्री के बारे में जानना जरूरी है, जिसके कंधों पर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की जिम्मेदारी है। काकड़ दरअसल बलूचिस्तान के पश्तून हैं। लेकिन उनका ज्यादातर समय सीनेटर के तौर पर इस्लामाबाद के कैफे और रेस्तराओं में बीता है। वह एक छोटे शहर के आम आदमी जैसे रहे हैं। वर्ष 2018 में सुरक्षा प्रतिष्ठान ने बलूचिस्तान में किंग्स पार्टी बनाई, जिसे बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) कहा गया। उसी वर्ष काकड़ को उस पार्टी से सीनेटर के रूप में नामित किया गया था।

राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'मजबूत साख वाले कई बलूच नेता हैं, जिन्हें इस पद के लिए चुना जा सकता था। सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा 'प्रोजेक्ट काकड़' की लॉन्चिंग पर तटस्थता का दिखावा तक नहीं किया गया है। इससे समय पर चुनाव होने पर भी सवाल खड़े होते हैं। इससे एक व्यापक अंतरिम व्यवस्था के तहत चुनावों की निष्पक्षता संदेह में रहेगी। सेना की विकराल होती छाया ने लोकतांत्रिक बदलावों की संभावनाओं को अनिश्चित बना दिया है।' खैर, असल मुद्दा यह है कि क्या पाकिस्तान में चुनाव समय पर हो सकेंगे। हालांकि, मार्च 2024 की तारीख बताई जा रही है। संविधान के अनुसार, संसद भंग होने के 90 दिनों के भीतर चुनाव कराना होता है।

अंग्रेजी दैनिक, द न्यूज इंटरनेशनल  ने चेतावनी भरे लहजे में लिखा है, 'काकड़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती समय पर आम चुनाव कराना होगा। देश के वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए इसमें काफी मुश्किलें आ सकती हैं। ये मुश्किलें, काकड़ की फिलहाल जो अच्छी छवि बनी हुई है, उसे एक झटके में मटियामेट कर सकती हैं।' हालांकि, अगर ये उम्मीदें की जा रही हैं कि नई सरकार आम उपभोक्ता के लिए राहत ला सकती है, तो यह गलत होगा। इसी हफ्ते लोग पेट्रोल के झटके से आहत थे।

फिर, आईएमएफ की शर्तों के तहत डीजल की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं। डॉलर की कीमत 300 रुपये तक पहुंच गई। आने वाले वित्तमंत्री के फैसले महत्वपूर्ण होंगे, जिनके लिए पहली चुनौती अर्थव्यवस्था को स्थिर करने की होगी। इस बीच, पीटीआई नेता इमरान खान बेशक जेल में हैं और उनकी पार्टी को कमजोर करने की हर कोशिश भी की जा रही है, लेकिन सेना अब तक यह सबक नहीं सीख सकी है कि किसी नेता को राजनीतिक क्षेत्र से बाहर का रास्ता केवल जनता ही दिखा सकती है। उन्होंने पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) नेता नवाज शरीफ के साथ भी यही करने की कोशिश की थी, लेकिन निर्वासन में होने के बावजूद उनकी पार्टी ने एक साल पहले ही सरकार बनाई। जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी देने और बेनजीर भुट्टो की हत्या करने से सच्चाई नहीं बदल सकती। पीपीपी अब भी सबसे बड़े राजनीतिक दलों में से एक है।

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