{"_id":"69435cc76c021c7d570a0199","slug":"donation-amount-temple-funds-belong-to-the-deity-implications-of-supreme-court-s-decision-2025-12-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"दान की राशि: मंदिर का धन देवता का, शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
दान की राशि: मंदिर का धन देवता का, शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो :
ANI
विस्तार
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मंदिर का धन देवता का होता है। इस मामले में केरल उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें थिरुनेल्ली मंदिर देवस्वम की जमा राशियों को लौटाने के निर्देश दिए गए थे। खंडपीठ ने पूछा कि उच्च न्यायालय के निर्देश में गलत क्या है? मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा, ‘क्या आप मंदिर का पैसा बैंक को बचाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं? मंदिर की राशि ऐसे सहकारी बैंक में क्यों रखी जाए, जो मुश्किल हालत में है? उसे एक स्वस्थ राष्ट्रीयकृत बैंक में क्यों न रखा जाए, जहां अधिक ब्याज भी मिलेगा?'सहकारी बैंकों की ओर से तर्क दिया गया कि उच्च न्यायालय ने दो महीने में जमा राशि लौटाने का ‘अचानक’ निर्देश दे दिया है, इससे काफी कठिनाई हो रही है। इस पर खंडपीठ ने कहा, ‘आपको जनता में अपनी विश्वसनीयता बढ़ानी चाहिए। यदि आप ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं, तो यह आपकी समस्या है।’
बैंकों की ओर से कहा गया कि वे जमा एफडी बंद करने का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि अचानक राशि लौटाने के निर्देश से कठिनाई होगी। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने सहकारी बैंकों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं, हालांकि, उन्हें उच्च न्यायालय से समय बढ़ाने का अनुरोध करने की स्वतंत्रता दी। याचिकाएं मनंथवाडी को-ऑपरेटिव अर्बन सोसाइटी लिमिटेड और थिरुनेल्ली सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड ने दायर की थीं। थिरुनेल्ली देवस्वम ने हाईकोर्ट का रुख इसलिए किया, क्योंकि बार-बार मांग के बावजूद बैंक एफडी वापस नहीं कर रहे थे। केरल उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि देवस्वम की सभी जमा खातों को बंद कर दो महीने के भीतर रकम लौटाई जाए।
इससे पहले तिरुमाला मंदिर में हुए विवाद से मंदिरों की देखरेख एवं इनके धन को लेकर भी कई विवाद उठे थे। ऐसे में, यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत में पूजा स्थलों का प्रबंधन कैसे किया जाता है? अधिकांश हिंदू मंदिरों का प्रबंधन राज्य के नियमों के तहत किया जाता है। कई राज्य ऐसे कानून बनाते हैं, जो मंदिर प्रशासन को सरकारी अधिकार प्रदान करते हैं। जैसे, तमिलनाडु का हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग मंदिर प्रबंधन की देखरेख करता है, जिसमें वित्त और मंदिर प्रमुखों की नियुक्तियां भी शामिल हैं। आंध्र प्रदेश सरकार तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के प्रमुख की देखरेख और नियुक्ति करती है।
प्रमुख मंदिरों से प्राप्त राजस्व को अक्सर छोटे मंदिरों के रखरखाव और अस्पतालों, अनाथालयों और शैक्षणिक संस्थानों जैसे सामाजिक कल्याण आदि के लिए आवंटित किया जाता है। इन मंदिरों में राज्य को हस्तक्षेप की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 25 (2) से प्राप्त होती है, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक प्रथाओं से संबंधित आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों के विनियमन की अनुमति देता है। जनगणना 2011 के अनुसार देश में लगभग तीस लाख पूजा स्थलों में से अधिकांश हिंदू मंदिर हैं।
मुस्लिम और ईसाई पूजा स्थलों की देखरेख आम तौर पर समुदाय-आधारित बोर्ड या ट्रस्ट द्वारा की जाती है, जो सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। यह विकेंद्रीकृत प्रबंधन दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। सिख, जैन और बौद्ध मंदिरों का प्रबंधन राज्य के आधार पर सरकारी विनियमन के विभिन्न स्तरों के अधीन है, जबकि समुदाय की भागीदारी उनके प्रशासन में भूमिका निभाती है।
धार्मिक दान और संस्थान संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची के तहत सूचीबद्ध हैं, जो केंद्र और राज्यों, दोनों को इस विषय पर कानून बनाने की अनुमति देते हैं। इससे राज्यों में विविध नियामक ढांचे बने हैं। श्रीमाता वैष्णो देवी श्राइन एक्ट, 1988 के साथ जम्मू-कश्मीर जैसे कुछ राज्यों ने अलग-अलग मंदिरों के लिए विशिष्ट कानून बनाए हैं, जो उनके प्रशासन और वित्त पोषण की रूपरेखा तैयार करते हैं।
स्वतंत्रता के बाद 1950 में, भारत के विधि आयोग ने मंदिर निधि के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून की सिफारिश की। इससे तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1951 लागू किया गया। यह मंदिरों और उनकी संपत्तियों के प्रशासन और संरक्षण के लिए हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के निर्माण का प्रावधान करता है। लगभग इसी समय, बिहार में धार्मिक संस्थानों को विनियमित करने के लिए बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950 पारित किया गया था।
अनुच्छेद 25 (1) लोगों को अपने धर्म का पालन करने, मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। अनुच्छेद 25 (2) राज्य को धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने और सामाजिक कल्याण, सुधार और हिंदुओं के सभी वर्गों के लिए हिंदू धार्मिक संस्थानों को खोलने के लिए कानून बनाने की अनुमति देता है। इसलिए, धार्मिक प्रथा के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को विनियमित करने का मुद्दा पूजा तक पहुंच प्रदान करने से अलग है।
धर्म के राज्य प्रबंधन के लिए न्यायिक प्रस्ताव में शिरूर मठ बनाम आयुक्त, हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती, मद्रास मामला, 1954 महत्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि धार्मिक संस्थानों को अनुच्छेद 26 (डी) के तहत स्वतंत्र रूप से अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है, जब तक कि वे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के विपरीत गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं। हालांकि, राज्य धार्मिक या धर्मार्थ संस्थानों के प्रशासन को विनियमित कर सकता है। इस मामले ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण स्थापित किए।
रतिलाल पनाचंद गांधी बनाम बॉम्बे राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धार्मिक प्रथाएं धर्म का एक हिस्सा हैं। लेकिन यह संरक्षण केवल धर्म के आवश्यक और अभिन्न अंगों तक फैला हुआ है तथा राज्य ट्रस्ट संपत्तियों के प्रशासन को विनियमित कर सकता है। पन्नालाल बंसीलाल पिट्टी बनाम आंध्र प्रदेश मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर प्रबंधन पर वंशानुगत अधिकारों को समाप्त करने वाले कानून को बरकरार रखा और मंदिर प्रबंधन पर वंशानुगत अधिकारों को खारिज कर दिया। edit@amarujala.com