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ट्रंप और वैश्वीकरण की सांसें: दशकों तक हावी रही अमेरिकी चकाचौंध... अब घी-चुपड़ी रोटी से बेहतर घर की सूखी रोटी

Fri, 07 Feb 2025 04:24 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Fri, 07 Feb 2025 04:24 AM IST
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सार
एक वक्त था, जब अमेरिका वैश्वीकरण का सबसे बड़ा प्रचारक बनकर दुनिया के विभिन्न देशों और बाजारों को नियंत्रित कर रहा था, लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां इस ओर संकेत कर रही हैं कि कहीं वैश्वीकरण अपने अंतिम दौर में तो नहीं पहुंच गया।
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Donald Trump regime and globalization US dazzle prevailed for decades Now time to realize homemade bread peace
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गत बुधवार (5 फरवरी) अमेरिका से 104 अवैध प्रवासी भारतीय बेइज्जत होकर अमेरिकी सैन्य विमान से स्वदेश लौटे। इन सबकी चालीस घंटे की यात्रा कितनी अपमानजनक रही होगी कि उन्हें हथकड़ी और बेड़ियों से बांधा गया था। ये दुर्भाग्यशाली लोग बेईमान ट्रैवल एजेंटों, अपने लालच और रातोंरात अमीर बनने की चाह के शिकार थे। यह ध्यान रहे कि इनमें से कोई भी बदहाल गरीब नहीं था। अमेरिका जाने हेतु उन्होंने जिस गैर-कानूनी मार्ग को अपनाया, उसके लिए उन्होंने 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक खर्च किए थे।



यह कोई पहली बार नहीं है कि जब अमेरिका से अवैध प्रवासी भारतीय स्वदेश लौटे हों। गत वर्ष अक्तूबर में एक अमेरिकी चार्टर्ड विमान से 100 लोग पंजाब वापस भेजे गए थे। कुल मिलाकर अक्तूबर 2023 से लेकर सितंबर 2024 के बीच 1100 अवैध प्रवासी भारतीयों को अमेरिका ने चुपचाप स्वदेश भेजा था। इस बार अंतर केवल इतना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रक्रिया को अत्यधिक नाटकीय बनाते हुए महंगे सैन्य विमानों का उपयोग किया है। निस्संदेह, यह घटनाक्रम भारत के लिए शर्मिंदगी का विषय है। यह सब अमेरिका में वैध रूप से जीवनयापन कर रहे 50 लाख भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों को भी असहज करता है, जो अपनी प्रतिभा, शिक्षा, योग्यता और संस्कृति से जुड़ाव के कारण सफल हैं। इस भारतीय समूह की औसत घरेलू आय 1,45,000 डॉलर है, जो अमेरिका की राष्ट्रीय औसत आय 80,610 डॉलर से कहीं अधिक है।


आखिर क्यों विकासशील देशों के लोग बड़ी संख्या में अमेरिका जाना चाहते हैं? जिस अमेरिका को हम जानते हैं, उसे वर्ष 1492-93 में यूरोपीय ईसाई प्रचारक क्रिस्टोफर कोलंबस ने भारत समझकर अनजाने में खोजा था। जहां यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने विस्तारवाद और मजहबी दमनचक्र चलाकर अमेरिका के मूल ध्वजवाहकों और उनकी संस्कृति को संग्रहालय की शोभा बढ़ाने तक सीमित कर दिया, तो इसी अवधि में वे यूरोप से अमेरिका में आर्थिक-बौद्धिक पूंजी का निवेश करते रहे। अमेरिकी जनगणना के अनुसार, वर्ष 1610 में गैर-मूलनिवासी ‘उपनिवेशवादियों’ की आबादी केवल 500 थी, जो 1780 में बढ़कर लगभग 28 लाख हो गई। इसके आठ साल बाद नए राष्ट्र ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ का संविधान अस्तित्व में आया।

अमेरिका की आबादी 34 करोड़ है, जो भारत की कुल जनसंख्या का केवल एक चौथाई हिस्सा है। अमेरिका का भू-भाग भारत से तीन गुना बड़ा है। इसके पास 95,000 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा है, तो 256 अरब बैरल कच्चे तेल के भंडार हैं, जो सऊदी अरब से भी अधिक है। अमेरिका वैश्विक 45 प्रतिशत पानी, 22 प्रतिशत कोयला, छह प्रतिशत जमीन, दस प्रतिशत कृषि योग्य भूमि और मात्र चार प्रतिशत जनसंख्या के साथ दुनिया का संपन्न देश है। उसकी सीमाएं भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन, भारत-बांग्लादेश या फिर यूरोप-रूस जैसी जटिल और तनावग्रस्त नहीं हैं। ईरान, चीन और रूस जैसे ‘शत्रु राष्ट्र’ अमेरिका से हजारों किलोमीटर दूर हैं। अमेरिका की यही विशेषता विकासशील देशों के कई लोगों को आकर्षित करती है। मौजूदा स्थिति को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बदलना चाहते हैं। उनकी नीति अपने देश को उन मूल्यों से अंगीकृत करना है, जिसमें केवल अमेरिका और उसके मूल नागरिकों के लिए स्थान हो। इसी शृंखला में ट्रंप ने अपने कार्यकारी आदेशों से विश्व में ‘शुल्क युद्ध’ भी प्रारंभ कर दिया। जैसे ही एक फरवरी को अमेरिका ने मेक्सिको और कनाडा से आयातित वस्तुओं पर 25 प्रतिशत व चीन पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लागू किया, वैसे ही कनाडा-मेक्सिको ने पलटवार करते हुए अमेरिकी आयातित वस्तुओं पर भी अतिरिक्त शुल्क लगा दिया। हालांकि, ट्रंप ने बाद में एक समझौते के तहत कनाडा-मेक्सिको को इससे राहत दे दी। ट्रंप ब्रिक्स समूह (भारत सहित) को भी व्यापारिक लेन-देन में अमेरिकी डॉलर का विकल्प ढूंढने पर चेतावनी जारी कर चुके हैं। इसी पृष्ठभूमि में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वैश्वीकरण, जिसका जन्म द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45) के बाद हुआ था-उसके ताबूत में ट्रंप अपनी नीतियों से अंतिम कील ठोक रहे हैं।  

विचारों के संसार में वैश्वीकरण की आयु अब तक सबसे कम है, जिसका दशकों तक अमेरिका पर्याय और संरक्षक रहा है। भारत की सनातन परंपरा छोड़ दें, तो मजहब के रूप में यहूदी तीन हजार से अधिक, ईसाइयत दो हजार, तो इस्लाम 1400 वर्षों से है। वामपंथ ने 74 वर्षों (1917-91) में दम तोड़ दिया। वर्तमान समय में चीन का वैचारिक-राजनीतिक अधिष्ठान वामपंथी, तो आर्थिकी पूंजीवादी है। उत्तर कोरिया, लाओस, वियतनाम, क्यूबा भी साम्यवादी देश हैं और इनमें से कोई भी दुनिया में पूरी तरह खुशहाल और आदर्श समाज की परिकल्पना साकार नहीं कर पाया है। दुनिया में ‘आदर्श समाज’ कैसा हो और आर्थिकी के मानक कैसे हों, इस पर भी ‘व्हाइट मेन बर्डन’ चिंतन से प्रेरित अमेरिका और पश्चिमी देशों का एकतरफा नियंत्रण रहा है। जब अमेरिका और यूरोपीय देशों के समर्थन से वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ, तब उसके सामाजिक-आर्थिक विभाग ने वर्ष 1951 में ‘वन मॉडल, फिट्स ऑल’ शेष विश्व पर थोपते हुए कहा, ‘ऐसा अनुभव होता है कि तीव्र आर्थिक प्रगति बिना दर्दनाक समायोजन के संभव नहीं। इसमें प्राचीन दर्शनों को छोड़ना; पुरानी सामाजिक संस्थाओं को विघटित करना; जाति, मजहब और पंथ के बंधनों से बाहर निकलना...होगा।’ इसका मर्म यह था कि मानव केंद्रित प्रगति-उत्थान के लिए प्राचीन संस्कृति-सभ्यता और परंपराओं को ध्वस्त करना होगा, चाहे उसका समृद्ध इतिहास ही क्यों न हो। कार्ल मार्क्स (1818-83) का भी भारत के प्रति यही चिंतन था।

वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी के बाद अमेरिका सहित यूरोपीय देशों को अपनी गलती का बोध हुआ और वर्ष 2015 में किसी भी देश में विकास के लिए उसकी संस्कृति को आधार बताया। बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने शासनकाल (2016-20 और 2025 से अबतक) में ट्रंप ने जो निर्णय लिए, वह संभवत: इसी परिवर्तन का मूर्त रूप हैं। इसलिए अमेरिका, जो स्वयं को वैश्वीकरण का झंडाबरदार समझता था-उसने इस वहम को त्याग दिया। विकासशील देशों के हजारों-लाखों लोग दशकों से अमेरिकी चकाचौंध से प्रभावित होते रहे हैं और लालच में  वहां पहुंचने हेतु अवैध मार्ग भी अपना लेते हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में देश से बाहर घी-चुपड़ी रोटी से कहीं गुना बेहतर घर में मिलने वाली संतोषप्रद और आरामदायक सूखी रोटी है। शायद 40 घंटे की लज्जित यात्रा करके और अपना सब कुछ गंवाकर स्वदेश लौटे 104 भारतीय यही सोच रहे होंगे।

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