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विदेश: अर्जेंटीना को मिले स्वदेशी 'ट्रंप', नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के सामने अब वादों पर खरा उतरने की चुनौती

Fri, 24 Nov 2023 07:45 AM IST
Ross Douthat रॉस डॉट
Updated Fri, 24 Nov 2023 07:45 AM IST
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सार
अर्जेंटीना के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जेवियर मिलई के सम्मुख उन वादों पर खरा उतरने की चुनौती है, जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान किए थे।
 
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Donald Trump of Argentina Javier Milei to face challenges to fulfill promises made during election campaign
Javier Milei - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

बिखरे बाल, पांच क्लोन कुत्ते रखने का शगल और अपने मृत कुत्ते से मानसिक संवाद करने की आदत रखने वाले जेवियर मिलई के अर्जेंटीना के राष्ट्रपति चुने जाने से वैश्विक असंतुष्टि के वर्तमान दौर में बढ़ती दक्षिणपंथी लोकप्रियता की वास्तविक प्रकृति पर चर्चा को प्रेरणा मिली है। मिलई और डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति में काफी समानताएं हैं। भ्रष्ट अभिजात वर्ग की आलोचना, वामपंथियों के प्रति नफरती भावना और सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को समर्थन। हालांकि आर्थिक मोर्चे पर वह ट्रंप की लोकलुभावन शैली की तुलना में सिद्धांत आधारित स्वतंत्र विचार रखते हैं। जिस पार्टी को उन्होंने हराया, और जिसने 21वीं सदी के ज्यादातर समय में देश पर शासन भी किया, वह पैरोनिस्ट मूवमेंट आर्थिक तौर पर ज्यादा राष्ट्रवादी है।



2001 के वित्तीय संकट के बाद उभरी पैरोनिस्ट पार्टी वही है, जिसने नव उदारवादी अर्थशास्त्र के साथ अर्जेंटीना के सबसे उल्लेखनीय प्रयोग को खत्म कर दिया था। जाहिर है, ट्रंप और मिलई की राजनीति में फर्क भी देखे जा सकते हैं। वैश्विक संदर्भ में देखें, तो पता चलता है कि दक्षिणपंथी दलों ने कुछ लचीलापन दिखाया है। दरअसल, दक्षिणपंथी राजनीति का सार यह है कि इसमें ऐसे लोग आगे रहते हैं, जो राष्ट्र के नवनिर्माण की बात करें और प्रचलित मानदंडों के खिलाफ विद्रोही रुख रखें। नीति संबंधी बातें इसमें भले ही पीछे छूट जाएं। कमोबेश एक जैसी दिखने वाली विभिन्न देशों की दक्षिणपंथी सरकारों की कार्यशैली आर्थिक संदर्भों और राजनीतिक हवाओं से निर्धारित होती है। जब विकसित विश्व में 1990 और 2000 के दशक में नव उदारवाद कमजोर हो रहा था, तब लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथ कुछ अलग तरह से पनपने की कोशिश कर रहा था।


पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में लड़ाई हमेशा पेशेवर वर्गों की एक मध्य-वामपंथी पार्टी एवं लोकलुभावन दक्षिणपंथ के बीच दिखती है। बिल क्लिंटन और टोनी ब्लेयर की सरकारें आर्थिक मोर्चे पर प्रगतिशील साबित हुईं, पर सांस्कृतिक स्तर पर उनका झुकाव वामपंथ की ओर ही रहा। यह प्रवृत्ति अमेरिका, इंग्लैंड के साथ फ्रांस में भी दिखी। इस दौरान, दक्षिणपंथी सरकारों ने भी अपनी राजनीति में कुछ बदलाव लाया, जिससे वे संरक्षणवाद और पुनर्वितरण का पक्ष लेती दिखीं।

ट्रंप के व्यक्तित्व और उनकी राजनीति ने वैश्विक समुदाय को संकट की स्थिति में डाल दिया था। लेकिन उस भविष्य की कल्पना करके देखें, जब यह व्यवस्था बिल्कुल सामान्य हो जाएगी और किसी दक्षिणपंथी सरकार के आने या किसी स्थापित पार्टी के जीतने पर लोग लोकतंत्र को बचाने की बात करना बंद कर देंगे। लोकलुभावन राजनीति ने अति वाम और अति दक्षिणपंथ के बीच स्पष्ट ध्रुवीकरण किया, जिसमें वामपंथी सांस्कृतिक तौर पर प्रगतिशील, लेकिन बाइडन या मैक्रों की तुलना में ज्यादा समाजवादी और वहीं, दक्षिणपंथ सांस्कृतिक स्तर पर पुरातनवादी लेकिन ट्रंप की तुलना में ज्यादा उदारवादी दिखता है। अर्जेंटीना में ज्यादा स्वतंत्र विचार वाली पार्टी का लोकप्रिय और आर्थिक मोर्चे पर ज्यादा राष्ट्रवादी प्रकृति के वाम दल को हराना इस पैटर्न का एक उदाहरण है। इसका एक अन्य उदाहरण ब्राजील में लूला दि सिल्वा और जायरे बोल्सोनारो के बीच भी दिखा था।

अर्जेंटीना के पैटर्न में एक कमजोर केंद्र और लोकप्रिय राजनीति की धाराओं में एक गहरा ध्रुवीकरण मिलता है। लैटिन अमेरिका के लिए सवाल यह है कि ऐसी ध्रुवीकृत परिस्थितियों में लोकतंत्र कितना स्थिर रह सकेगा। यूरोप और अमेरिका के लिए सवाल है कि क्या चिली और अर्जेंटीना की स्थितियां उनके भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं। शायद तुरंत ऐसा न हो। लेकिन, भविष्य में ऐसा होने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। मिलई की प्रचंड जीत का सबसे स्पष्ट सबक है कि अगर वह अभी भी अर्जेंटीना को स्थिरता नहीं दे सके और वहां की अर्थव्यवस्था को चुनौतियों से नहीं निकाल सके, तो भविष्य के लिए यह खतरे की घंटी होगा। वैसे भी, मिलई के सामने सियासी चुनौतियां भी होंगी, क्योंकि वह राष्ट्रपति बेशक बन गए हों, लेकिन उनकी पार्टी को संसद में बहुमत नहीं मिला है।  उन्हें दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत होगी और जो घोषणाएं उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान की थीं, उन्हें पूरा करने की भी चुनौती का सामना उन्हें करना पड़ेगा।

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