टाइम मशीन : इनके नहीं, उनके नहीं... सबके राम; लेकिन क्या समाज उनके सार्वभौमिक मूल्यों को अपनाना चाहता है?
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विस्तार
ऐसे तो राम का पूरा व्यक्तित्व ही महाकाव्य जैसा है, लेकिन मैं सोचता हूं कि अगर हम राम से सिर्फ एक जीवन मूल्य और एक कुशलता सीखेंगे, तो वह क्या होगा? आज हम जिस संसार में रह रहे हैं, वहां व्यक्ति का आकलन सिर्फ और सिर्फ उसकी कुशलता से होता है और जीवन मूल्यों को यूटोपियन स्टेट में छोड़ दिया जाता है। ऐतिहासिकता का समाजशास्त्रीय विमर्श हमें राम के उन मूल्यों की निश्चित जानकारी देता है, जो मौखिक और लिखित संस्कृति का हिस्सा रहे। लेकिन वर्तमानता का विमर्श क्या समाज के उन मूल्यों और कौशल को गढ़ रहा है, जो राम होने या बनने के प्रतीक रहे? यह किसी भी तत्कालीन समाज की नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह उन मूल्यों को जगह दे, जिनमें सामूहिकता, मानवीय गरिमा के लिए जगह हो और सेवइयां, गुजिया, रंग या ताज से ज्यादा राम की मर्यादा के मानवीय पक्ष को संजीदगी से सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए। राम ने तो यही चाहा होगा कि उनकी कुशलता और मूल्यों को समाज कंठस्थ कर ले। ऐसा नहीं कि अगर रावण को हराया, तो उसी जीत का ढिंढोरा पीटते नजर आएं। शायद राम जीत को विनम्रता से जोड़ना चाहते थे।
आज के माहौल में तो एक छोटी-सी जीत पूरे जीवन के दंभ की कहानी बन जाती है। और जब प्रजातंत्र हमेशा एक चुनावी माहौल से परिभाषित हो और हर महीने कोई न कोई किसी को हराता नजर आए तथा बस अपनी जीत का बिगुल बजाता नजर आए, तो राम की कहानी से भला कौन सीखेगा? धर्म से राजनीति या राजनीति से धर्म निर्देशित हो, तो समाज के जीवन मूल्यों को कौन तय करेगा? राम के लिए क्या पशु-पक्षी, क्या इन्सान! क्या पक्ष, क्या विपक्ष! सभी राम के साथ, और सभी के साथ राम! राम के मूल्य तो सार्वभौमिक रहे। राम ने तो लक्ष्मण तक को यह आदेश दिया था कि वह रावण से जाकर कुछ ज्ञान की बातें सीखें। क्या कोई आज पक्ष या विपक्ष से, अपने या परायों से सीखने की दृष्टि या ख्वाहिश रखता है या क्या घर में ही कोई पिता को सुनना और मां को समझना चाहता है? राम यानी सुनना और सहानुभूतिपूर्ण श्रोता बने रहना। यह उनका मूल्य भी रहा और उनकी दक्षता भी। क्या यह समाज इस मूल्य और कौशल को अपनाना चाहता है?
चुनावी समाज हो या परिवार, कौन किससे सीखना चाहता है? यहां परिवार में अगर कोई जीतता है, तो पूरा परिवार उसके घमंड को सौ गुना करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। लेकिन राम को अपनी जीत इतनी बड़ी नहीं लगी कि वह जीत उन्हें मर्यादा से तनिक भी दूर कर दे। घमंड तो दूर की बात, राम तो कभी जीत का हुंकार भी भरते नजर नहीं आए और चाहे वाल्मीकि का रामायण हो या गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस, राम तो उन्हीं मूल्यों और कुशलता के सान्निध्य में सभी जनों के प्राण बने रहे। और लक्ष्मण को हर परिस्थिति में राम सिर्फ बड़े भाई ही नजर आए। राम ने समाज को यह बताना चाहा कि व्यक्ति के किसी गलत आचरण को कभी भी अपनाना, नकल करना या दोहराना नहीं चाहिए। लेकिन अगर कोई प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन असाधारण क्षमता वाला या ज्ञानी हो, तो हमें उससे भी कुछ सीखने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए और यहीं राम हमें बहुत बड़ी सीख देते हैं। और इस सीखने के भाव से फिर घृणा की कोई जगह ही नहीं बनती। राम से यह भी सीख मिलती है कि कोई जीत घृणा और अहंकार को सुनिश्चित नहीं करती।
आज कई बार यह देखा गया कि लोग अपने ही परिवार के बड़े-बुजुर्गों से या किसी सदस्य से कुछ भी सीखने का उत्साह ही नहीं रखते। और तो और, सगे-संबंधियों के बीच में ही तमाम तरह के मतभेद पाल लेते हैं। दुश्मन से सीखना तो दूर की बात है, अब तो अपनों से भी नहीं सीखते। घर के सदस्य से तो और भी कोई नहीं सीखना चाहता। बस यही सुनने को मिलता है कि ‘ज्ञान न बांटा जाए।' मानो पूरा समाज अज्ञानता को ही सुनने और देखने के लिए तैयार बैठा है। एक अजीब तरह की हीनता, जलन और अहंकार में सभी फंसे नजर आ रहे हैं। अगर ऑफिस में पास भी बैठे हैं, तो फोन से बात करेंगे या मेल कर देंगे। मानो ऑफिस के केबिन भी घरों के कमरों की तरह सिमटते जा रहे हों। हर कोई कटाक्ष करना, सिखाना या कमियां निकालना चाहता है। और राम ने तो कभी रावण पर भी कटाक्ष नहीं किया। राम ने रावण पर जीत हासिल करके सिर्फ अच्छाई को स्थापित किया, न कि घृणा और दंभ को।
राम ने हमें यह सिखाया कि जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच भी बेहतर व्यवहार करते रहना कितना जरूरी है। वह इसलिए कि हम एक ऐसे संसार में रह रहे हैं, जहां आचरण का स्तर गिरता जा रहा है। नफरत या घृणा ने मनुष्य के अंदर की आदमियत को नजर लगा दी है। अब तो लोग विमानों में भी लड़ते नजर आते हैं। ऐसा लगता है, जैसे पूरी दुनिया ही गुस्से में है और सभी बस, सभी को हराना चाहते हैं।
इन्सान बनकर रहना ही राम के प्रति सच्चा आदर, प्रेम और श्रद्धा है। चलिए, किसी को हराने से अच्छा है कि खुद के दुर्गुणों से जीतें। अपनी कुशलता या योग्यता को मूल्यों के बिल्कुल करीब रखें, जिससे कोई जीत हमें घमंड से न भर दे और किसी के पराजित होने से घृणा का भाव न आए। राम की वह मूर्ति, जिसकी अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा हुई, वह हमसे यह चाह रही है कि हम सभी अपने मन में भी उस राम को प्रतिष्ठित करें, जिन्होंने सभी को मनुष्य ही बनकर रहना सिखाया। राम तो अयोध्या लौट आए। उन्हीं जीवन मूल्यों और कौशल के साथ, जिसने राम को राम बनाया। हम भी लौटें इन्सानियत की ओर, क्योंकि राम इनके या उनके कभी नहीं थे, बल्कि वह पूरे जगत के रहे। राम ने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ व्यवहार को ही परिष्कृत नहीं किया, बल्कि मर्यादा रूपी सीमा भी तय की। जिस जीवन में जय और पराजय का संबंध शक्ति से नहीं, बल्कि नीति से निर्धारित हो, जहां मर्यादा व्यक्ति का पर्याय बन जाए, वहीं राम हैं और ऐसा होने और बनने की आकांक्षा करना ही, पूर्णता में जय सियाराम है।