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क्या हम अपनी बेटियों से प्यार नहीं करते!
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 11 May 2013 10:50 PM IST
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भारत में सब कुछ परिवार के नाम पर किया जाता है। हालिया समय में देश के राजनीतिक परिदृश्य में छाए हुए भ्रष्टाचार के मामलों की तफ्तीश की जाए तो उनके पीछे भी बहुत से सत्तासीन लोगों का अपने रिश्तेदारों को लेकर अगाध स्नेह देखा जा सकता है। लेकिन भारतीय ढंग के इस पारिवारिक प्रेम का एक नकारात्मक पहलू भी है।
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जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारतीय परिवार अपनी बेटियों से प्यार नहीं करते। भारत में शिशु लिंगानुपात (छह वर्ष तक के आयुवर्ग में प्रति हजार बच्चों में लड़कियां) 1961 के बाद से अपने निम्नतम बिंदु पर पहुंच गया है।
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हाल ही में अधिकारिक तौर पर जारी किए गए 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 2001 से 2011 के दौरान भारत में शिशु लिंगानुपात 927 से गिरकर 919 हो गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी दौरान भारत में दूसरे कई क्षेत्रों में सुधार दिख रहा है। भारत में समग्र लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों में महिलाओं की संख्या) 2001 के 933 से बढ़कर 2011 में 943 हो गया।
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भारत में साक्षरता दर 2001 की 64.8 फीसदी से बढ़कर 2011 में 73 फीसदी हो गई। लेकिन दुख की बात है कि जब बात नवजात बच्चियों और परिवारों को बचाने की आती है, तो यह सारी प्रगति धरी रह जाती है। देश के समृद्ध माने जाने वाले राज्य शिशु लिंगानुपात के मामले में आदर्श नहीं माने जा सकते।
इस संदर्भ में शीर्ष पांच राज्यों में (एक करोड़ और उससे अधिक जनसंख्या के साथ) छत्तीसगढ़ (969), केरल (964), असम (962), पश्चिम बंगाल (956) और झारखंड व कर्नाटक (948) शामिल हैं। इस सूची में सबसे निचली पायदान पर आने वाले पांच प्रमुख राज्य हैं- हरियाणा (834), पंजाब (846), जम्मू- कश्मीर (862), राजस्थान (888) और गुजरात (890)। चिंता की बात है कि उत्तर प्रदेश में शिशु लिंगानुपात 2001 में 916 से घटकर 2011 में 902 तक पहुंच गया। हालांकि इस सूबे में शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु लिंगानुपात कहीं अधिक तेजी से गिर रहा है।
इस स्थिति के लिए बेटे की चाहत ही जिम्मेदार है। आय और साक्षरता के बढ़ने के बावजूद इस सनक में कोई कमी नहीं आई है। बहुत से भारतीय परिवारों में आज भी बेटियों को एक आर्थिक बोझ माना जाता है। बेटियों के प्रति ऐसी अनिच्छा की भावना और तकनीक तक बेहतर पहुंच का सम्मिलित असर बेहद घातक होता है। इसी वजह से देश में महिला भ्रूण हत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
अब तो सुदूर गांवों में भी अल्ट्रासाउंड क्लीनिक खुल गए हैं। हालांकि इस बारे में कानून मौजूद है, लेकिन वह बेअसर साबित हुआ है। ‘प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स एक्ट, 1994’ को 2004 में संशोधित किया गया और इसका नाम ‘प्री-कॉन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिसयूज) (पीसीपीएनडीटी) एक्ट’ किया गया।
इस कानून के मुताबिक अल्ट्रासाउंड तकनीक का उपयोग करने वाले डॉक्टरों के लिए यह जरूरी होगा कि वे सरकारी पंजीकरण करवाएं। इसके अलावा रोगियों और उनके अल्ट्रासाउंड के रिकॉर्ड को दो वर्षों तक सुरक्षित रखा जाएगा। इस संबंध में संबंधित राज्य एजेंसी को एक मासिक रिपोर्ट भी दी जाएगी। कानून के मुताबिक ऐसे डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट जो लिंग निर्धारण परीक्षण करेंगे या लोगों को ऐसा करवाने के लिए उकसाएंगे, पांच वर्ष के कारावास और 50,000 रुपए तक के जुर्माने के पात्र होंगे।
मगर यह कानून प्रभावकारी साबित नहीं हो रहा है। मसलन यूपी को देखें, जहां पिछले वर्ष सितंबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य में महिला भ्रूण हत्या को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों के मद्देनजर प्रदेश सरकार को दो हफ्ते के भीतर एक जवाबी हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया था। एक डिवीजन बेंच ने सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया था।
कानून के मुताबिक ऐसे मामलों पर नजर रखने के लिए एक राज्य पर्यवेक्षक समिति होगी, जो हर चार महीने में एक बार बैठक करेगी। लेकिन उत्तर प्रदेश में पिछले सात वर्षों में समिति की केवल छह बैठकें ही हुई हैं। इसके अलावा प्रदेश के कुल 75 में से केवल 15 जिलों में ही जिला सलाहकारी समितियों का गठन हुआ है। तमाम अन्य राज्यों की तरह यूपी में भी कई गैर-कानूनी अल्ट्रासाउंड क्लीनिक चल रहे हैं।
पारंपरिक रूप से ग्रामीण परिवारों में अनचाही बेटियों से छुटकारा पाने के लिए भ्रूण हत्या की घटनाएं सामने आती रही हैं। मगर कन्याभ्रूण हत्या की घटनाएं शहरों में ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां कहीं अधिक पैसा है, अधिक डॉक्टर हैं और अल्ट्रासाउंड क्लीनिक जैसी सुविधाएं हैं। हालांकि अब अल्ट्रासाउंड तकनीक ग्रामीण इलाकों तक पहुंच गई है, जिसका इस्तेमाल गैरकानूनी तरीके से लिंगनिर्धारण में किया जा रहा है।
यह शर्मनाक स्थिति है और अगर कानून को ठीक ढंग से लागू करने की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो हालात के बद से बदतर होने में देर नहीं लगेगी। पीसीपीएनडीटी कानून के तहत दोषी ठहराए गए लोगों की संख्या बेहद कम है। दरअसल, राजनीतिक और सामाजिक इच्छाशक्ति के बगैर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता।