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विविधता है हमारी पहचान
रस्किन बांड
Updated Thu, 25 Jan 2018 06:57 PM IST
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विविधता
अगर हम अपने आसपास के दक्षिण एशियाई देशों से तुलना करें, तो भारतीय गणतंत्र का 68 साल का सफर बेहद शानदार रहा है। इन 68 साल में भारतीय मध्यवर्ग की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जो हमारी विकास और खुशहाली का सूचक है। भारतीयों के रहन-सहन की स्थिति में काफी सुधार आया है। हालांकि कामगारों की स्थिति सुधारने के लिए और काम किए जाने की जरूरत है। तभी हम कह सकेंगे कि देश में सर्वांगीण विकास हो रहा है।
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एक भारतीय के तौर पर अपने गणतंत्र का यह सफर मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मेरे माता-पिता भले ही अंग्रेज थे, लेकिन मैं भारतीय हूं। मेरा मानना यह है कि हम किसी नस्ल या धर्म की वजह से नहीं जाने जाएंगे, बल्कि हमारा इतिहास क्या है, उससे ही हमारी पहचान होती है। इतिहास ही परिभाषित करता है कि हम अंत में क्या बनते हैं। भारत वह देश है, जिसने अपने कई सौ वर्षों के इतिहास में विभिन्न जाति, धर्म, नस्ल आदि को समायोजित करके रखा और इसी विविधता की वजह से यह देश सांस्कृतिक रूप से धनी हुआ। इसके चलते कई बार आपसी मतभेद की भावनाओं ने भी जन्म लिया, लेकिन हमारी यह विविधता ही हमें एक सूत्र में पिरोती है और देश को महान बनाती है। आज जितने भी देश महान देशों की श्रेणी में आते हैं, उन सभी देशों में विविधता ही उसकी महानता का मुख्य कारण रही है। जैसे, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि देश प्रवासी लोगों के आने से ही समृद्ध हुए हैं। यही विविधता आगे जाकर एकता में तब्दील हो जाती है। विविधता की कमी के कारण कई देश अब भी अपने आप को नहीं बदल पा रहे हैं। यमन, म्यांमार आदि इसके उदाहरण हैं।
मैंने आजादी के पहले के और बाद के भारत को बहुत गहराई से देखा है। आजादी से पहले मैं बहुत छोटा था। उस समय ब्रिटिश हुकूमत इस देश में राज करती थी। अंग्रेज संख्या में भले ही कम थे। लेकिन इस देश में सारे अधिकार या तो राजा-महाराजाओं के पास थे, जिनकी बड़ी-बड़ी रियासतें थीं या फिर अंग्रेज शासकों के पास थे, जिनका पूरे देश में एकछत्र राज था। उस समय काफी भारतीयों ने विदेश जाना भी शुरू कर दिया था। हमारे देश के कई बड़े नेता उस कड़ी में शामिल रहे। कई नेताओं ने कैंब्रिज जाकर पढ़ाई की और वापस हिंदुस्तान आए। बेहतर संभावनाओं के लिए खुद मैं भी ब्रिटेन चला गया था। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मार्च, 1951 में मेरी मां ने मुझे ब्रिटेन भेज दिया था। करियर बनाने की इच्छा मेरे ब्रिटेन जाने की मुख्य वजह थी। लेकिन ब्रिटेन में मेरा मन नहीं लगा और मैं वापस भारत लौटने के बारे में सोचता रहता था। मुझे यहां के अपने दोस्त, रिश्तेदार तथा यहां के पहाड़ों और वादियों से बेहद लगाव था। चार साल ब्रिटेन में रहने के बाद मार्च, 1955 में मैं वापस हिंदुस्तान लौट आया। तब तक मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई थी।
आजादी के बाद से भारत में बहुत बदलाव आया। आजादी से पहले कई ऐसे काम थे, जो भारतीय नहीं कर सकते थे। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद सब कुछ बदल गया। आम आदमी को पूरे अधिकार मिल गए। आज कोई भी भारतीय बगैर किसी डर के खुलकर अपने मन की बात कह सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। हमारा भारत मूलत: लोकतांत्रिक प्रवृति का रहा है। हम कभी तानाशाही की ओर नहीं जा सकते। राष्ट्रवाद के मामले में मेरी अपनी राय है। आज के दौर में वैश्विक स्तर पर हर देश राष्ट्रीयता को अपने-अपने ढंग से परिभाषित कर रहा है, जैसे-डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट या ब्रिटेन में ब्रेग्जिट की बहस और अपने यहां राष्ट्रीयता के मुद्दे पर चल रही बहस। मैं राष्ट्रवाद और राष्ट्र प्रेम को अलग-अलग चीज मानता हूं। राष्ट्रवाद की परिभाषा लोग इस तरह करते हैं कि आपका देश किसी अन्य देश की तुलना में सर्वश्रेष्ठ है, और उसके आगे कोई नहीं टिक सकता। जबकि राष्ट्रप्रेम वह होता है, जहां आप यह एहसास करते हैं कि आपका देश सर्वश्रेष्ठ न होने के बाद भी आपको उससे बेहद प्रेम है। मैं खुद को राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेमी मानता हूं। मेरा मानना है कि अपना देश जैसा भी है, बहुत अच्छा है। पिछले दिनों असहिष्णुता की देश में बहुत चर्चा हुई। पर मैं मानता हूं कि यह देश असहिष्णुता में विश्वास नहीं रखता। मैंने जन्म से आज तक इस देश में कभी भी असहिष्णुता का भाव महसूस नहीं किया।
भारतीय गणतंत्र की बहुत सारी विशेषताएं हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि आप आसानी से किसी से मिल सकते हैं, बात कर सकते हैं और अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। गणतांत्रिक भारत ने खासकर शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, लेकिन अब भी इसके सामने काफी चुनौतियां हैं, जिनसे पार पाने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करना पडे़गा। दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। आणविक खतरा एक बहुत बड़ी चुनौती है। पर्यावरण को भी मैं एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में मानता हूं, जिसे देश को समझना होगा। अब आप यह देखिए कि जनवरी महीने में ही मसूरी में इतनी गर्मी हो रही है। यह पर्यावरण के दुष्परिणाम का ही नतीजा है। इसलिए हमें अपने पर्यावरण को बचाने के लिए पूरी कोशिश करनी होगी।
आप जानते हैं कि एक लेखक के तौर पर मैंने बच्चों पर काफी कुछ लिखा है। मैं भारतीय गणतंत्र को इस तरह देखना पसंद करता हूं कि यहां बच्चों की स्थिति कैसी है। भारत में बच्चों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। ज्यादातर बच्चे आज अच्छे स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं, लेकिन बच्चों की भलाई के लिए अब भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। गरीब तबके के बच्चों के लिए हमें और संभावनाएं तलाशने की जरूरत है। इस क्षेत्र में हमें पूरा जोर लगाकर काम करना चाहिए। हर राजनीतिक दल को अपना यह ध्येय बनाना चाहिए कि देश में कोई बच्चा भूखा न रहे और हर एक को शिक्षा मिले।
-अजय रमोला से बातचीत पर आधारित।