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नेत्र ज्योति के साथ विवेक दृष्टि

Tue, 17 Sep 2013 07:48 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 17 Sep 2013 07:48 PM IST
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Discretion with vision

ईसा मसीह किसी को भी दुखी देखते, तो उसका दुख दूर करने के लिए तत्पर हो उठते थे। वह सदैव दुर्व्यसनों का त्याग कर सदाचार का जीवन जीने का उपदेश लोगों को दिया करते थे।

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एक दिन वह नगर की सड़क से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति नशे में धुत्त होकर किसी युवती के आलिंगन का प्रयास कर रहा है। रास्ते पर ऐसा अश्लील प्रदर्शन देखकर वह ठिठक गए। वह व्यक्ति भी ईसा को देखकर घबराकर सामने खड़ा हो गया।
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ईसा ने उसके चेहरे पर दृष्टि डाली, तो उसे पहचान लिया। वह बोले, अरे, तू तो वही है, जिसने कुछ वर्ष पूर्व अपने अंधेपन से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना मुझसे की थी। मैंने तुझ पर दया की और परमात्मा से याचना कर तुझे नेत्र ज्योति दिलवाई थी।
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ये शब्द सुनकर वह कुछ देर मौन खड़ा रहा, फिर बोला, आपने ठीक पहचाना, मैं वही हूं। ईसा बोले, मूर्ख, क्या ईश्वर की कृपा से मिली आंखों की ज्योति का ऐसे घिनौने काम में उपयोग करना तुझे शर्मनाक नहीं लगता? इससे तो अच्छा है कि तू अंधा ही रहता।


ईसा के शब्द सुनते ही इसकी आंखें खुल गईं। वह रो पड़ा। उसने ईसा के चरणों में गिरकर कहा, आपने यदि नेत्र ज्योति के साथ-साथ मुझे विवेक दृष्टि भी दिलाई होती, तो मैं ऐसे कुमार्ग पर क्यों चलता? अब मैं सदा सद्मार्ग पर ही चलूंगा। और यह कहते-कहते वह ईसा मसीह के चरणों में लोट गया।

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