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विवेकशील समाज : कौन बताए क्या है धूल, क्या है फूल!
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सार
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
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अमर उजाला
विस्तार
बहस होना विवेकशील समाज में एक स्वस्थ और सकारात्मक प्रक्रिया है, इतिहास बताता है कि किसी भी समाज में सुधार या तो आंतरिक प्रक्रिया से सफल होता है, या समाज के कुछ प्रबुद्ध प्रभावशाली लोगों को साथ लेकर कानूनी प्रक्रिया से। चलिए, दो सौ साल पहले के भारत की बात करते हैं। आधुनिक भारत में सामाजिक आंदोलन और परिवर्तनों को विशेष रूप से समझने का अवसर तब मिला, जब बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में स्त्रियों को लेकर डॉक्टरल शोध करने का निर्णय लिया। तो पाया कि सामाजिक आंदोलन और कानून कैसे बने।
सामान्य प्रक्रिया यही थी कि सुधारक अपने समाज को प्रोत्साहित करते थे, चेतना जगाते थे, उसके प्रसार का जतन करते थे, अंग्रेजों को सुधार के लिए कानून लाने के आग्रह करते थे, कुछ सुधारवादी अंग्रेज अफसर मदद करते थे। शायद कहीं सुधार का श्रेय लेने की दबी-िछपी आकांक्षा भी उसमें काम करती थी। दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में वे मूल पत्र देखे जा सकते हैं। उन्हें अपनी आंखों से देखने का सुख शब्दातीत है, अवर्णनीय है।
मेजर लुडलो के प्रयासों से कन्यावध को रोकने के लिए कानून बने, पर राजपूताना जहां इसका ज्यादा जोर था, रियासतों के राजा महाराजा अपनी तरह से कोशिशें कर रहे थे, जो बहुत सफल नहीं हो रही थीं। उदाहरण के तौर पर एजीजी कर्नल सदरलैंड ने लुडलो को साथ लेकर उन राजाओं से मिलना शुरू किया, मारवाड़ के महाराजा मान सिंह ने कहा कि उनके पुरखे महाराजा बख्तसिंह 1763 ईसवी में कानून बना चुके हैं। लुडलो और सदरलैंड ने स्थानीय चारण- भाटों और महाराजा के साथ बैठकर एक नए बिल का प्रारूप अक्तबूर,1839 ईसवी में बनाया। (जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह 1731 ईसवी में ही कन्यावध रोकने का कानून बनाने वाले शुरुआती राजपूत शासक थे।)
मध्यकाल की कन्यावध की वह कुप्रथा रूप बदलकर भ्रूण हत्या के रूप में आ गई है। कमाल यह भी है कि शिक्षा और तकनीक के विकास का इस्तेमाल हमने इस तरह से किया है। अंग्रेजों के आने के बाद बंगाल और दूसरे इलाकों में नवजागरण या पुनर्जागरण शुरू हुआ, जो ईसाई मिशनरियों के विरोध स्वरूप भी था, उदार अंग्रेज अफसरों की वजह से भी था, नई शिक्षा प्राप्त भारतीयों की स्वप्रेरणा से भी था। पर उसका खास किरदार यहां बताने, समझने लायक है कि वे गैरसरकारी स्तर पर सब के सब आंतरिक प्रक्रियागत थे, यानी हर किसी को अपना घर साफ रखना था, करना था, दूसरे के घर के लिए निर्णय, टिप्पणी, बहस नहीं हो रही थी।
उदाहरण के लिए बंगाल में नवजागरण की उथल-पुथल, बाहर-भीतर की धड़कन को सुनील गंगोपाध्याय रचित एक बांग्ला उपन्यास प्रथम आलो से समझना चाहिए। सती प्रथा पर प्रतिबंध वाले कानून के मसले पर बंगाल के गर्वनर मैटकाफ ने हिंदू जनसंख्या के नाराज होने की आशंका जताते हुए भारत के गवर्नर विलियम बैंटिक को पत्र भी लिखा था, पर बैंटिक इस सुधार के लिए दृढ़ थे। राजा राममोहन राय को समाज के भीतर तब भी घोर विरोध का सामना करना पड़ा।
तो, यह विडंबना है कि अपने ही घर का कोई जब किसी अमानवीय प्रचलन या कुप्रथा पर सवाल उठाता है, तो हम उसकी जान के दुश्मन हो जाते हैं, घर से बाहर का बोले तो क्या ही लिहाज हो! और यह कट्टरपन कमोबेश, दुनिया के सब धर्मों में पाया जाता है। नतीजा यह है कि सामाजिक- धार्मिक सुधार इस दुनिया के लिए, इस दुनिया में अब और मुश्किल होते जा रहे हैं। यह गोया, ऐसा ही है कि अगर हमारे माथे पर धूल आकर बैठ जाए तो, बाहर वाला टोके तो उसपर यूं चिल्लाएं कि अपना घर देखो, घर के भीतर वाला टोके तो उसे घर का विद्रोही कह दें, घर की इज्जत उछालने वाला कहकर उसे मारने दौड़ें, यानी हम धूल को फूल समझकर माथे पर चिपकाए रखना चाहते हैं।
यहां गौर करने लायक बात है कि भारतीय संवाद परंपरा जीत और हार की नहीं, निरंतर प्रबोधन की परंपरा रही है। कितनी सुंदर बात है कि भारतीय विचार परंपरा में विचार का संघर्ष नहीं है, किसी विचार के विस्थापन के लिए नहीं है, परस्पर प्रबोधन के लिए है। वेदांत के सिद्धांतकार दार्शनिक शंकराचार्य को ही लीजिए। कितने बड़े धार्मिक सुधार की नींव डाली, विरोध तो उनका भी हुआ पर उस विरोध का स्वरूप वह नहीं था, जो आज दिखाई देता है।
तो अपने भीतर, अपने समाज या धर्म मे किसी विचार, परंपरा या प्रथा के विरोध, विमर्श, बहस, सुधारों के लिए हम उत्तरोत्तर असहिष्णु हुए हैं। कई बार यह खयाल आते ही शेक्सपियर के नाटक रोमियो-जूलियट का एक संवाद याद की मुंडेर पर आकर बैठ जाता है- ए प्लेग ऑन बोथ योर होर्सेज, इसका अर्थ है कि तुम दोनों गलती पर हो, मैं तुम दोनों में से किसी का भी पक्ष नहीं लूंगा, मेरा इससे कोई लेना देना नहीं है। (लेखक, स्वतंत्र इतिहासकार और हिंदी सिनेमा के स्क्रिप्ट राइटर-गीतकार हैं)