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पर्यावरण: अरावली के उजड़ने का नतीजा, भविष्य के लिए खतरा हैं राजस्थान में उठने वाले रेत के तूफान

Tue, 20 Jun 2023 06:56 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Tue, 20 Jun 2023 06:56 AM IST
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सार
अरावली की पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है, जो भविष्य के लिए खतरनाक है।
 
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disappearance of hills due to Illegal mining in Aravallis increased sandstorm in Rajasthan
रेतीला तूफान

विस्तार

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका अर्थ साइंस इन्फॉर्मेटिक्स के ताजा अंक में प्रकाशित एक शोध ने चेतावनी दी है कि अरावली पर्वतमाला में पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है। भरतपुर, धौलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे स्थानों को, जहां अरावली पर्वतमाला पर अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और हरियाली उजड़ने की अधिक मार पड़ी है, सामान्य से अधिक रेतीले तूफानों का सामना करना पड़ रहा है।



इस साल अप्रैल और मई में इनमें से कई इलाके बालू के तूफान और बारिश से बह गए थे, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। अकेले 28 -29 मई को ही तेज अंधड़ से प्रदेश भर में 16 लोगों की मौत हो गई। अरावली की पहाड़ियों से घिरे टोंक जिले में सबसे अधिक 12 मौतें हुईं। बृहस्पतिवार एवं शुक्रवार को भी तेज रफ्तार से अंधड़ चला, जिससे कई गांवों और शहरों में बिजली के खंभे गिर गए, जिससे आधे राजस्थान की बिजली गुल हो गई। बहुत से पेड़ उखड़ गए और कई घरों की छतें उड़ गईं। वर्ष 2015 के बाद ऐसे अंधड़ों की संख्या बढ़ती जा रही है। अंधड़ से जान-माल का नुकसान तो होता ही है, सार्वजनिक संपत्तियों को भी जबर्दस्त नुकसान होता है।


सिर्फ राजस्थान ही नहीं, दिल्ली और हरियाणा का अस्तित्व भी अरावली पर ही टिका है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। बहुत कम लोग इस पर ध्यान देते हैं कि रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है। खासकर गर्मी में यह धूल पूरे परिवेश में छा जाती है और इसका कुप्रभाव ठंड में दिखने वाले स्मॉग से अधिक होता है। रेत के बवंडर खेती और हरियाली वाले इलाकों तक न पहुंचंे, इसके लिए अरावली पर्वतमाला सदियों से सुरक्षा-परत का काम करती रही है। विडंबना यह है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की शृंखला की जगह गहरी खाई हो गई। इस वजह से भी अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।

गुजरात के खेड ब्रह्म से शुरू होकर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन रायसीना हिल्स पर होता है, जहां राष्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में गिना जाता है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में न केवल पूरी तरह नदारद हुआ, बल्कि कई शिखरों की जगह गहरी खाई हो गई है। असल में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं, जिससे एक तो मरुभूमि का विस्तार नहीं हुआ, दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही।

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा, ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में कम और मध्य ऊंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गई हैं। लगभग तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बारे में सरकार से पूछा था। वर्ष 1975 से 2019 के दौरान किए गए अध्ययन में यह पता चला कि वन क्षेत्र में सघन बस्तियां बसना पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक था।

अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3,676 वर्ग किमी भूमि बंजर हो गई। इस अवधि में अरावली के वन क्षेत्र में 5,772.7 वर्ग किमी (7.63 प्रतिशत) की कमी आई है। यदि यही हाल रहा, तो अंधड़ की मार का दायरा बढ़ेगा। अरावली पहाड़ के उजड़ने का मतलब है वहां के जंगल और जल निधियों का उजड़ना, दुर्लभ वनस्पतियों का लुप्त होना। इसके दुष्परिणाम  के रूप में वन्यपशु भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं और मानव-जानवर टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसलिए अवैध खनन और भूमि अतिक्रमण को कम करने के साथ लगातार क्षेत्र की निगरानी, वन संरक्षण और समाशोधन किया जाना चाहिए। यदि अरावली को और अधिक नुकसान हुआ, तो तेज अंधड़ की मार से दिल्ली भी नहीं बचेगी।

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