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DICCI: दलित उद्यमिता की दिशा, डिक्की ने की अहम पहल

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 22 Jan 2023 06:24 AM IST
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सार
भारत में डायवर्सिटी की बात साहित्य, कला, संस्कृति जैसे क्षेत्रों में तो दबे स्वर में की जाती रही है, पर डिक्की ने औद्योगिक क्षेत्र में पहल की और युवा पीढ़ी को उद्यमता की कमान सौंपी।
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Direction of Dalit Entrepreneurship, DICCI took important initiative
कारोबार - फोटो : ANI

विस्तार

वा उद्यमियों को नेतृत्व सौंपकर दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री यानी डिक्की ने स्वावलंबन को बढ़ावा दिया है। इसकी स्थापना वर्ष 2005 में तब हुई थी, जब निजीकरण के चलते अनुसूचित जातियों/जनजातियों के उद्यमियों के समक्ष जीविका का संकट उपस्थित हो रहा था। तब डिक्की की पहल पर इन उद्यमियों के प्रति सरकार व निजी क्षेत्र भी एफरमेटिव ऐक्शन (सकारात्मक कार्रवाई) के तहत सामाजिक जिम्मेदारी को अंजाम देने लगे थे। डिक्की के संस्थापक मिलिंद कांबले को यह दृष्टि अर्थशास्त्री बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की आर्थिक शिक्षाओं से मिली। एससी/एसटी न तो व्यवसायी वर्ग था, न कृषि-वर्ग, पर सेवादाता वह निश्चित ही था।



चूंकि सरकारी सेवाओं में अवसर सीमित हो रहे थे, ऐसे में डिक्की ने युवाओं में उम्मीद उत्पन्न की, केंद्र सरकार ने भी डिक्की तथा उसके सहयोगी युवाओं को स्टार्ट अप में मदद के लिए हाथ बढ़ाया और बैंकों को निर्देश दिया कि युवा-उद्यमियों को रियायती दर पर कर्जा दें। डिक्की ने भी ऐसा उद्यमी वर्ग पैदा करने का सपना देखा, जो सरकार को कर देने में समर्थ हो। स्थापित उद्योगपतियों ने भी उनके साथ सकारात्मक रिश्ता बनाया। टाटा जैसे बड़े उद्योगपतियों के साथ भी डिक्की अपने स्वरोजगार अभियान को आगे बढ़ा रहा है।  


डिक्की के सदस्यों ने इसका अध्ययन किया कि कैसे अमेरिका में डायवर्सिटी के तहत आर्थिक क्षेत्रों में अवसर देकर स्वयं श्वेत-उद्यम समूहों ने अश्वेतों की लघु-उद्यमिता को मौका देते हुए उनकी ऊर्जा कौशल का रचनात्मक उपयोग किया और अमेरिका तथा अफ्रीका में औद्योगिक क्रांति संपन्न हुई।

भारत में डायवर्सिटी की बात साहित्य, कला, संस्कृति जैसे क्षेत्रों में तो दबे स्वर में की जाती रही है, पर डिक्की ने औद्योगिक क्षेत्र में पहल की और युवा पीढ़ी को उद्यमता की कमान सौंपी। इनमें आदिवासी समुदाय से आए दीपक जैसे युवाओं की संघर्ष कथाएं प्रेरक हैं, जो कई तरह के शहद उत्पाद निर्मित करते हैं। पुणे स्थित अपनी स्टार्ट अप कंपनी स्वरा के माध्यम से मैत्रेयी कांबले ने स्वच्छता के कार्यों को घृणित कार्यों की श्रेणी से बाहर निकाला है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बीबीए की पढ़ाई कर चुकी मैत्रेयी कहती हैं, 'हम यंत्रों-मशीनों की मदद से सफाई के पेशे को इतना आधुनिक और आकर्षक बना रहे हैं, जिसे करते हुए कोई अपने को उपेक्षित नहीं समझेगा। और एक दिन यह पेशा वंशानुगत भी नहीं रहेगा।' इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा सहायता प्राप्त डिक्की के सैकड़ों लघु-उद्योग-धंधे देश और विदेशों में चल रहे हैं तथा यहां तैयार अनेक उत्पाद कनाडा, अमेरिका और इंग्लैंड तक जा रहे हैं।

मैत्रेयी कांबले की भांति संतोष युवा उद्यमियों का निर्देशन कर रहे हैं। युवतियां भी उद्यमिता की चुनौती का सामना कर कुशल नेतृत्व कर रही हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और जापान से पढ़कर आ रहे एससी/एसटी केंद्र सरकार के प्रोत्साहन पर डिक्की की ओर आकर्षित हो अपने स्टार्ट अप शुरू कर रहे हैं। एससी/एसटी युगों-युगों से सेवा देने वाले समुदाय रहे हैं, इसलिए सेवा क्षेत्र विकसित करना डिक्की परिवार का स्वभाविक गुण है। दीपक, संतोष और मैत्रेयी जैसे युवाओं के नक्शे कदम पर चल रहे आयूष सिंह पुरानी गाड़ियों को उपयोगी ‘मैपल पोड‘ में बदलने का कार्य कर रहे हैं।

डिक्की की स्थापना के सात वर्षों की सफलता का मूल्यांकन करते हुए वर्ष 2012 में पत्रकार मिलिंद खांडेकर ने दलित करोड़पतियों की 15 प्रेरणादायक कहानियां शीर्षक से एक किताब लिखी थी। उन उद्यमियों में कल्पना सरोज नामक महिला उद्यमी शिखर पर उभरी थीं, तो सविता बेन कोलसावाला कोयले का कारोबार कर गुजरात में प्रसिद्ध हुई थीं। उन 15 करोड़पतियों की उद्यमिता से 15,000 हाथों को काम मिला था।

इन उद्यमियों के मार्ग में जातिभेद आड़े आता है। बैंकों से कर्ज मिलने, कच्चा माल मिलने में दलितों को दिक्कतें पेश आती हैं। गैर दलित गरीब कामगार न मिलने का अनुभव भी उनके हिस्से आया है। लेकिन डिक्की 2005 से 2012 की अवधि में सरकार को 17 करोड़ रुपये का आयकर चुकाने लगा था और पांच हजार लोगों को रोजगार देने लगा था।

हाल ही में विगत चार जनवरी को दिल्ली स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में डिक्की ने अपने प्रशिक्षण शिविर में उद्यम क्षेत्र की जानी-मानी हस्तियों के साथ विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्री के समक्ष उद्यमियों ने अपने विचार पेश किए।

दलित उद्यमियों ने बाजार की कई नकारात्मक धारणाएं और कई आशंकाएं उलट कर रख दी हैं। मसलन, हम पूंजी-बाजार के खुलेपन की सकारात्मकता को ले सकते हैं। इससे उत्पादन को सामाजिक गैर बराबरी के जाल से बाहर निकाला गया है। कहा जा सकता है सत्रह साल का यह किशोर संगठन आर्थिक आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलता-चलता अपनी प्रौढावस्था को प्राप्त कर रहा है और विदेशों के उच्च संस्थाओं से पढ़कर आ रहे उद्यमियों को आकर्षित कर रहा है। ये उद्यमी अपनी प्रतिभा, ज्ञान और ऊर्जा का निवेश अपने देश के विकास में भी कर रहे हैं।­


(श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, हिंदी विभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय) 
 
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