इस उन्माद को रोकना होगा
नगालैंड के दीमापुर ने हमें डराना बदस्तूर जारी रखा है। विगत पांच मार्च को लोगों के एक हुजूम ने, जिसमें स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी भी शामिल थे, नगालैंड की दीमापुर सेंट्रल जेल पर धावा बोल दिया। उस जुनूनी भीड़ ने बलात्कार के एक आरोपी को जेल से जबरन बाहर निकाला और उसकी कमर पर रस्सी बांधकर उसे सात किलोमीटर तक घसीटा। इस दौरान उसे लातों से पीटा गया और इतने पत्थर बरसाए गए, कि उसके प्राण निकल गए। फिर एक घड़ी वाले टावर पर लटका कर उसके मृत शरीर का प्रदर्शन किया गया। फिर क्या था, घटना की वीभत्स तस्वीरें इंटरनेट के जरिये चारों ओर फैल गईं। घटना की गुत्थी अब तक सुलझ नहीं पाई है। दीमापुर में जो कुछ हुआ, उससे मीडिया की मुख्यधारा में एक बार फिर पूर्वोत्तर की हिंसा और निराशा से लबरेज वही घिसी-पिटी तस्वीर अफसोसनाक ढंग से सामने आई है। मगर सबसे ज्यादा भयावह यह तथ्य है कि दीमापुर में हुई बर्बरता किसी मायने में केवल नगालैंड की समस्या नहीं है, और न ही यह देश में भीड़ द्वारा न्याय की पहली घटना है।
दीमापुर में दिखाई गई बेरहमी की भयावहता से हम उबर भी नहीं पाए थे कि आगरा में लड़कियों से छेड़छाड़ के मामले में एक व्यक्ति भीड़ के हत्थे चढ़ गया और मारा गया। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक लोगों ने इस व्यक्ति को घर से खींच कर निकाला और तब तक बुरी तरह पीटते रहे, जब तक कि वह मर नहीं गया। उत्तर प्रदेश में भी भीड़ के न्याय की यह कोई पहली वारदात नहीं थी। 2010 में मुरादाबाद जिले में 26 वर्ष का असलम भी इसी तरह भीड़ का शिकार बना था। उस पर पानी के पाइप चुराने का आरोप था। इसी वजह से जिला अदालत के परिसर में ही उसकी पिटाई, और फिर मौत हुई। हैरानी तो इस बात की है कि यह सब कुछ जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय से महज सौ मीटर की दूरी पर हुआ।
उत्तर प्रदेश की तरह दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पिछले वर्ष राजस्थान के गंगानगर जिले में जनसमूह ने अपने ढंग का न्याय करते हुए एक शख्स को नपुंसक बना दिया। इस व्यक्ति ने एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश की थी। उस व्यक्ति को खींचते हुए कसाई की दुकान पर लाया गया और मांस काटने वाली छुरी से नपुंसक बना दिया गया। एक प्रत्यक्षदर्शी का उस घटना को जायज ठहराते हुए यह तर्क था कि हालिया समय में देश में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध सहनशीलता की सीमा लांघ चुके हैं, और इन्हें रोकने का बस यही एक तरीका था। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जब सार्वजनिक नाराजगी ने न्याय को इस ढंग से हाथ में लिया हो। आलम यह है कि बहुत से लोग भीड़ द्वारा किए जा रहे इस न्याय को जायज ठहरा रहे हैं। इनका मानना है कि अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं, न्याय प्रणाली पहले से ही बोझ से लदी हुई है और समय पर न्याय मिलना तो सपने सरीखा बना हुआ है; इसलिए अब कोई भी विकल्प शेष नहीं बचा है।
आंकड़े जो कहानी बयां कर रहे हैं, वह वाकई भयावह है। 2009 में देश में खासकर महिलाओं के खिलाफ 2,03,804 अपराध्ा हुए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2013 में यह आंकड़ा बढ़कर 3,09,546 पर पहुंच गया। दूसरी ओर, अदालतें पहले ही मुकदमों के भारी बोझ तले दबी हुई हैं। अकेले उच्चतम न्यायालय में तकरीबन 63,800 मुकदमे लंबित हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में यह आंकड़ा 44 लाख पर पहुंचा हुआ है। जिला और निचली अदालतों में लंबित केसों की संख्या तो और ज्यादा है।
यह सोच सुविधाजनक हो सकती है, पर सच नहीं है, कि केवल अशिक्षित और गरीब लोग ही भीड़ के न्याय का हिस्सा बनते हैं। तथ्य कुछ और ही कहानी कहते हैं। दीमापुर में कानून को ताक पर रखते हुए न्याय करने पर तुली उन्मादी भीड़ में स्कूल और कॉलेज के बच्चे भी शामिल थे। ऐसी भीड़ से सहानुभूति रखने वालों में इंदौर से भाजपा की विधायक ऊषा ठाकुर भी शामिल हैं, जो नगालैंड में गुस्साई भीड़ के हाथों बलात्कार के आरोपी के मारे जाने में कुछ भी गलत नहीं मानतीं। निस्संदेह देश भर में बलात्कार और यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं से देश का मध्यवर्ग खासा व्यथित है। मगर यह मानना खतरनाक होगा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध या दूसरे अपराधों को भीड़ के न्याय द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। इससे पहले कि हालात काबू से बाहर हो जाएं, यह ध्यान रखना होगा कि बलात्कार या बिगड़ती कानून-व्यवस्था के खिलाफ चलाए जा रहे किसी भी अभियान को भीड़ के इस उन्माद का भी विरोध करना चाहिए। इसके साथ ही हमें पुलिस के लिए बेहतर प्रशिक्षण और आधुनिक हथियारों की उपलब्धता के अलावा न्यायाधीशों व अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी पर भी ध्यान देना होगा, ताकि कानून के शासन पर लोगों का भरोसा बरकरार रखा जा सके। इसके अलावा, जैसा कि लखनऊ के एक संगठन 'एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी ऐंड लीगल इनीशिएटिव' (एएएलआई) से जुड़ी वकील शुभांगी सिंह लिखती हैं कि समुदायों को अपने अधिकारों, देश के कानून और प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने जैसी सामान्य बातों के प्रति जागरूक बनाना भी एक बड़ी चुनौती है।
दीमापुर से यह भयानक सबक मिलता है कि जब उन्मादी जन-समूह कानूनी प्रक्रियाओं का मखौल उड़ाते हुए अपराधी को सजा देने का काम खुद अपने हाथ में लेता है, तो क्या होता है। देश की पुलिस बेशक बेहतर ढंग से प्रशिक्षित न हो, और उसके पास काम का बोझ भी ज्यादा हो, बहुत से मामलों में हमारा आपराधिक न्यायिक तंत्र न्याय प्रदान करने में नाकामयाब रहा हो, मगर हमें खुद को समझाना होगा कि तमाम हताशा के बावजूद भीड़ का न्याय कभी भी न्यायिक प्रणाली का विकल्प नहीं हो सकता, क्योंकि अगर ऐसा हो गया, तो यह न सिर्फ हमारे लोकतंत्र को खोखला करेगा, बल्कि हमारे संस्थागत ढांचों को भी नुकसान पहुंचाएगा।