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मोदी जी, कठिन डगर है पनघट की

Wed, 21 May 2014 02:13 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Wed, 21 May 2014 02:13 AM IST
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Dificult road ahead, modi ji

कहने को तो यह सिर्फ एक आम चुनाव था, पर वास्तव में क्रांति से कम न था। इसलिए कि इस देश की अति समझदार जनता ने एक चायवाले को दिल्ली की गद्दी पर बिठाने का फैसला कर साबित कर दिया है कि शहजादों का जमाना गया। कहने को तो भारत में 1947 के बाद से लोकतंत्र है, लेकिन यह सिर्फ कहने को है, क्योंकि लोकतांत्रिक अधिकार को वही मतदाता समझ सकते हैं, जो थोड़े शिक्षित हों और सच यह है कि आजादी के शुरुआती दशकों के बाद अधिकतर भारतीय न शिक्षित थे और न समझदार। जब हम चुनाव प्रचार देखने जाया करते थे देहातों में, तो मिलते थे हमें ऐसे मतदाता, जो कहा करते थे कि हम इंदिरा जी को वोट देंगे, क्योंकि हमें वह अच्छी लगती हैं।

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हम जब उनसे पूछते थे कि इंदिरा जी के राज में क्या उनके घरों में बिजली आई है, तो जवाब न में मिलता था। फिर हम पूछते कि क्या उन्हें पीने का पानी मिलता है। जवाब फिर न में मिलता। तो क्या गांवों में स्कूल-अस्पताल हैं? फिर जवाब न में मिलता था। तो फिर इंदिरा जी को वोट क्यों दे रहे थे? इसलिए कि हम हमेशा कांग्रेस को ही वोट देते आए हैं। ये होते थे जवाब पुरुषों के। महिलाएं कहती थीं कि वे वोट उन्हें देंगी, जिन्हें उनके पति सही प्रत्याशी समझते हैं। इस चुनाव में इतनी बदल गई जनता कि न नासमझ औरतें मिलीं मुझे और न नासमझ मर्द। एक चायवाले को अगर प्रधानमंत्री बनाकर भेजा है मतदाताओं ने, तो इसलिए कि वे नरेंद्र मोदी की बातों पर विश्वास करते हैं कि वह विकास लाएंगे उनके जीवन में। मोदी ने चुनाव प्रचार में परिवर्तन और विकास की बातें की इस तरह, आपने कांग्रेस को 60 वर्ष दिए, मैं आपसे 60 महीने मांग रहा हूं।
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जिन लोगों को यकीन नहीं था कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकेंगे, आज वे कह रहे हैं कि अगर परिवर्तन लाने का वायदा पूरा कर सकते हैं मोदी, तो संभव है कि उनको 60 महीने के बजाय दस वर्ष मिल जाएं। सवाल अब यह है कि क्या मोदी अपने वायदे पूरे कर सकेंगे। वह भी ऐसे समय, जब अर्थव्यवस्था बेहाल है और नौजवान की उम्मीदें आसमान छू रही हैं।
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अमीर खुसरो ने कहा था, बहुत कठिन है डगर पनघट की। और जो डगर बिछी है मोदी के सामने, वह वाकई बहुत कठिन है। हर महीने दस लाख नौजवान आ जाते हैं बाजार में रोजगार की तलाश में। समस्या गंभीर इसलिए भी है, क्योंकि पिछले दशक में सोनिया-मनमोहन सरकार ने निवेशकों को दूर भगाया अपनी गलत आर्थिक नीतियों के कारण। निजी क्षेत्र में निवेशकों की बहार नहीं आती है वापस, तो रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो सकते हैं, क्योंकि सरकारी दफ्तरों में पहले से एक व्यक्ति की नौकरी कर रहे हैं दस लोग। सो नए प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं में निवेशकों को वापस लाना सबसे ऊपर होगा। मोदी के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं है, क्योंकि गुजरात में निवेशकों के लिए माहौल जितना सुहाना है, उतना किसी अन्य राज्य में नहीं है। निवेशक लालफीताशाही के कम होने के साथ यह भी सोचते हैं कि भारत में आधुनिक सड़कें, बंदरगाह और हवाई अड्डे बनें। यह भी मोदी ने गुजरात में करके दिखाया है, लेकिन देश भर में ऐसा करने के लिए मोदी को मुख्यमंत्रियों के साथ काम करना होगा। इसलिए कई बार कह चुके हैं वह कि उनकी टीम में होंगे देश के सारे मुख्यमंत्री। तो अगर ये सारी चीजें करना मोदी के लिए आसान है, तो मुश्किलें क्या हैं?


मेरी राय में उनकी सबसे बड़ी मुश्किल होगी यह कि लोगों की उम्मीदें इतनी हैं उनसे कि किसी जादूगर के लिए भी कठिन होगा उनको पूरा करना। दूसरी बात यह है कि जनता जान गई है अपनी ताकत, सो जिस तरह एक चायवाले को बिठाने का फैसला किया है भारत की गद्दी पर, उसी तरह उसे सिंहासन से उतार भी सकती है। यानी प्रधानमंत्री जी को फूंक-फूंककर चलना होगा।

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