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राजनीति में युवाओं की राह मुश्किल
अनुराग दीक्षित
Updated Wed, 30 Jan 2013 11:13 PM IST
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जयपुर में बीते दिनों कांग्रेस के चिंतिन शिविर में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई। उनकी इस पदोन्नति को हालांकि औपचारिकता माना जा रहा है, लेकिन जिम्मेदारी संभालते ही राहुल गांधी ने कुछ बातें कही हैं, जो ध्यान खींचती हैं।
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मसलन, उन्होंने राजनीति में भाई-भतीजावाद को कम करते हुए सकारात्मक राजनीति पर बल देने और युवाओं को सक्रिय राजनीति से जोड़ने पर बल दिया है। हर राज्य में 40-50 नेताओं की फौज तैयार करने की बात भी उन्होंने कही है। ये सब कहकर दरअसल उन्होंने खुद के ही सामने कई चुनौतियां खड़ी कर ली हैं। भारतीय राजनीति से जुड़े ऐसे कई अहम सवाल हैं, जिनके जवाब अब उन्हें खोजने होंगे।
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मसलन, आज का युवा क्या वास्तव में सक्रिय राजनीति से जुड़ना चाहता है? रोज सामने आते घोटाले और जेल जाते नेता शायद ही युवा वर्ग को राजनीति में आने को प्रेरित करें। राजनीति का अपराधीकरण एक बड़ी चुनौती है। हाल ही में सामने आई एक गैर सरकारी रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा 4,835 सांसद-विधायकों में 31 फीसदी के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।
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यानी हर तीन में से एक नेता आपराधिक मामलों में फंसा है। इनमें 641 ऐसे ‘माननीय’ हैं, जिनके खिलाफ हत्या, बलात्कार, अपहरण, लूट और फिरौती जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। ऐसे में राहुल गांधी समेत हर राजनीतिक नेतृत्व को राजनीतिक शुचिता पर बल देना होगा।
वैसे संसद के अब तक के सफर पर नजर डालें, तो हालात उलट ही नजर आते हैं। पहली लोकसभा में 35 वर्ष से कम उम्र के सांसदों की संख्या 82 थी, जो 15वीं लोकसभा में घटकर 37 रह गई। 30 वर्ष से कम उम्र के इस बार कुल नौ सांसद चुने गए, जबकि पहली लोकसभा में इनका आंकड़ा 28 था। देश में युवा आबादी लगातार बढ़ रही है, लेकिन लोकसभा में युवा सांसदों की संख्या कम हो रही है।
पिछला लोकसभा चुनाव जीतने वाले अधिकांश युवा सांसद 35 की उम्र पार कर चुके हैं। इस समय 35 वर्ष से कम उम्र के सांसदों की संख्या लोकसभा में नौ और राज्यसभा में महज एक है। यानी दोनों सदनों की कुल 790 सीटों पर केवल 10 युवा सांसद हैं। करीब सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में युवाओं की हिस्सेदारी 65 फीसदी है, लेकिन मौजूदा संसद में उनकी हिस्सेदारी मात्र एक फीसदी है।
दूसरी तरफ, पहली लोकसभा में 61 से 90 वर्ष के 40 सांसद थे, मौजूदा लोकसभा में उनकी संख्या बढ़कर 135 हो गई है। यानी भारत तो युवा हो रहा है, पर लोकसभा में बुजुर्ग सांसदों की संख्या बढ़ रही है। राज्य विधानसभाओं की स्थिति भी ऐसी ही है।
संसद में युवाओं की संख्या तो घट ही रही है, युवा सांसदों में से भी ज्यादातर वही हैं, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है। मौजूदा 10 युवा सांसदों में से आठ की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है। जाहिर है, परिवारवाद राजनीतिक व्यवस्था की बड़ी समस्या है, जिसके दायरे में खुद राहुल गांधी भी आते हैं। इसलिए केवल युवा राजनीति की बात करने से कुछ नहीं होगा।
राजनीतिक दल युवाओं को लेकर अगर सचमुच गंभीर हैं, तो उनके लिए सीटें आरक्षित क्यों नहीं कर देते? आरक्षण न भी दे सकें, तो लोकसभा चुनाव में सौ सीटें 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को देने का प्रावधान तय कर लें। राहुल गांधी अपनी पार्टी से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन न तो पार्टियां ऐसी पहल करना चाहती हैं, न ही युवा राजनीति में आना चाहते हैं। पर यह समस्या का समाधान नहीं है।
राजनीति की तस्वीर युवा ही बदल सकते हैं। हाल के दौर में युवा अलग-अलग मुद्दों के साथ सड़कों पर उतरे हैं। ये सोशल मीडिया में मजबूती से अपना पक्ष रखकर जनमत को प्रभावित करने की भूमिका में हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव का संकेत हो सकता है।
इसी युवा पर अब तक वोट न डालने और इंटरनेट, पिज्जा-बर्गर तक सीमित रहने का आरोप लगता रहा है। पर जब वे समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं, तो राजनीति को बदलने के लिए उन्हें आगे क्यों नहीं आना चाहिए? युवा सिर्फ वोट बैंक बनकर ही क्यों रहे? ऐसे कई सवाल है, जिनके जवाब खोजने होंगे। शायद तभी युवा भी राजनीति को विकल्प के तौर पर स्वीकार कर पाएंगे।